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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

1888 - 1969 | पबना, अन्य

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र के उद्धरण

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अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

जिस काम में तुम्हें विरक्ति और क्रोध रहे हैं, निश्चय जानो वह व्यर्थ होने को है।

  • संबंधित विषय : सच

किसी के द्वारा प्रतिहत होने पर, जो अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है—वही है अहं।

हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।

भक्ति ला देती है ज्ञान; ज्ञान से होता है सर्वभूतों में आत्मबोध, सर्वभूतों में आत्मबोध होने से ही आती है अहिंसा और अहिंसा से ही आता है प्रेम। तुम जितना भर इनमें से जिस किसी एक का अधिकारी होगे, उतना ही भर इन सभी के अधिकारी होगे।

मेरे काम-क्रोधादि नहीं गए, चिल्लाने से वे कभी नहीं जाते। नहीं गए कहकर ऐसा कर्म, ऐसी चिंता का अभ्यास कर लेना चाहिए, जिसमें काम-क्रोधादि की गंध भी नहीं रहे—मन जिससे उन सबको भूल जाए।

संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।

जभी अपने कुकर्म के लिए तुम अनुतप्त होगे, तभी परमपिता तुम्हें क्षमा करेंगे और क्षमा मिलने पर ही समझोगे, तुम्हारे हृदय में पवित्र सांत्वना रही है और तभी तुम विनीत, शांत और आनंदित होगे।

जितने दिनों तक तुम्हारे शरीर और मन में व्यथा लगती है, उतने दिनों तक तुम एक चींटी की भी व्यथा के निराकरण की ओर चेष्टा रखो। और ऐसा यदि नहीं करते हो, तो तुमसे बढ़कर हीन और कौन है?

अपना दोष जानकर भी यदि तुम उसे त्याग नहीं सकते, तो किसी भी तरह उसका समर्थन कर दूसरे का सर्वनाश करो।

प्रकृत सत्य-प्रचारक ही जगत् के प्रकृत मंगलाकांक्षी हैं। उनकी दया से कितने जीवों का जो आत्मोन्नयन होता है, उसकी इयत्ता नहीं।

जैसा करने से जिसकी प्राप्ति होती है, वैसा नहीं करते हो तो उसके लिए दुःखित रहो। करने के पहले दुःख करना, अप्राप्ति को ही बुलाता है।

तुम्हारे मन से जिस परिमाण में विश्वास हटेगा; जगत् तुम पर उसी परिमाण में संदेह करेगा या अविश्वास करेगा, एवं दुर्दशा भी तुम पर उसी परिमाण में आक्रमण करेगी, यह निश्चित है। अविश्वास-क्षेत्र दुर्दशा या दुर्गति का राजत्व है।

आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो। ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।

नकली-भक्ति-युक्त मनुष्य उपदेश नहीं ले सकता, उपदेष्टा के रूप में उपदेश दे सकता है। इसीलिए कोई उसे उपदेश देता है; तो उसके चेहरे पर कोष के लक्षण, विरक्ति के लक्षण, संग छोड़ने की चेष्टा इत्यादि लक्षण प्रायः स्पष्ट प्रकाश पाते हैं।

तुम विषय में जितना आसक्त होते हो, विषय-संबंध में तुम्हारा ज्ञान भी उतना ही होता है। जीवन का उद्देश्य है, अभाव को एकदम भगा देना और यह केवल कारण को जानने से ही हो सकता है।

जैसे ही किसी के प्रणाम करते ही; साथ-साथ स्वयं दीनता से तुम्हारा सिर झुक जाता है, सेवा लेने के लिए मन एकदम राजी नहीं है, वरन् सेवा करने के लिए मन सब समय व्यस्त रहता है, आदर्श की बात कहते ही प्राण में आनंद होता है—तुम्हें भय नहीं, तुम मंगल की गोद में हो और नित्य और भी अधिक ऐसे ही रहने की चेष्टा करो।

मन-मुख एक होने पर भीतर मलिनता नहीं जम सकती, गुप्त मैल भाषा के ज़रिए निकल पड़ते हैं। पाप उसके अंदर जाकर घर नहीं बना सकता।

किसी मूर्त आदर्श में; जिनकी कर्ममय अटूट आसक्ति ने समय या सीमा को अतिक्रम कर, उन्हें सहज भाव से भगवान बना दिया है, जिनके काव्य, दर्शन एवं विज्ञान मन के भले-बुरे विच्छिन्न संस्कारों को भेद कर; उस आदर्श में ही सार्थक हो उठे हैं—वे ही हैं सद्‌गुरु।

तुम्हारे चरित्र के किसी भी उदाहरण से यदि किसी का मंगल हो, तो उससे उसको गुप्त मत रखो। तुम्हारा सत्स्वभाव कर्म में प्रस्फ़ुटित हो, किंतु अपनी भाषा में व्यक्त हो, नज़र रखो।

धर्म को जानने का अर्थ है, विषय के मूल कारण को जानना और वही जानना ज्ञान है। उस मूल के प्रति अनुरक्ति ही है भक्ति, और भक्ति के तारतम्यानुसार ही ज्ञान का भी तारतम्य होता है। जितनी अनुरक्ति से जितना जाना जाता है, भक्ति और ज्ञान भी उतना ही होता है।

अपने पर गर्व जितना किया जाए, उतना ही मंगल और आदर्श पर गर्व जितना किया जाए, उतना ही मंगल।

भक्त का अर्थ क्या अहमक (बेवकूफ़) है? बल्कि विनीत, अहंयुक्त ज्ञानी है।

चाह की अप्राप्ति ही है दुःख। कुछ भी चाहो। सभी अवस्थाओं में राजी रहो, दुःख तुम्हारा क्या करेगा?

जो भाव विरुद्ध भाव द्वारा आहत या अभिभूत नहीं होता, वही है विश्वास। विश्वास नहीं रहने पर दर्शन कैसे होगा?

संदेह को प्रश्रय देने से यह घूण की तरह मन पर आक्रमण करता है, अंत में अविश्वासरूपी जीर्णला की चरम मलिन दशा को प्राप्त होता है।

स्मरण करो तुम साहसी हो, स्मरण करो तुम शक्ति के तनय हो, स्मरण करो तुम परमपिता की संतान हो। पहले साहसी बनो; अकपट बनो, तभी समझा जाएगा धर्मराज्य में प्रवेश करने का तुम्हारा अधिकार हुआ है।

जो अनुतप्त होकर भी पुनः उसी प्रकार के दुष्कर्म में रत होता है, समझना कि वह शीघ्र ही अत्यंत दुर्गति में पतित होगा।

तुम जितने लोगों की सेवा करोगे, उतने लोगों के यथासर्वस्व के अधीश्वर बनोगे।

ऊपर-ऊपर देखकर ही किसी चीज़ को छोड़ो या किसी प्रकार का अभिमत प्रकाश करो। किसी चीज़ का शेष देखे बिना उसके संबंध में ज्ञान ही नहीं होता है, और बिना जाने तुम उसके विषय में क्या अभिमत प्रकाश करोगे?

जिसका विश्वास जितना कम है; वह उतना undeveloped (अविकसित) है, बुद्धि उतनी कम तीक्ष्ण हैं।

जिसकी अनुभूति जितनी है, उसका दर्शन, ज्ञान भी उतना है और ज्ञान में ही है विश्वास की दृढ़ता।

तुम पंडित हो सकते हो; किंतु यदि अविश्वासी हो, तब तुम निश्चय ग्रामोफ़ोन के रेकार्ड अथवा भाषावाही बैल की तरह हो।

तुम लाख़ गप करो; किंतु प्रकृत-उन्नति नहीं होने पर, तुम प्रकृत-आनंद कभी भी लाभ नहीं कर सकते।

किसी भी मत के साथ किसी मत का प्रकृत रूप में कोई विरोध नहीं, भाव की विभिन्नता, प्रकारभेद है। एक का ही नानाप्रकार से एक ही तरह का अनुभव है।

अहंकारी धनी मलिनता का दास होता है, इसीलिए ज्ञान की उपेक्षा करता है।

भक्ति एक के लिए बहुत से प्रेम करती है; और आसक्ति बहुत के लिए एक से प्रेम करती है।

जो तुम नहीं जानते हो, ऐसे विषय में लोगों को उपदेश देने मत जाओ।

संकोच ही दुःख है, और प्रसारण ही है सुख। जिससे हृदय में दुर्बलता आती है, भय आता है—उसमें ही आनंद की कमी है और वही है दुःख।

तुम यदि सत्-चिंता में संयुक्त रहने की चेष्टा करते हो, तुम्हारी चिंता, आचार, व्यवहार इत्यादि उदार एवं सत्य होते रहेंगे और वे सब भक्त के लक्षण हैं।

तुम्हारी भाषा यदि कुत्सा-कलंक जड़ित ही हो; दूसरे की सुख्याति नहीं कर सके, तो किसी के प्रति कोई भी अभिमत प्रकाश करो। मन ही मन तुम अपने स्वभाव से घृणा करने की चेष्टा करो, एवं भविष्य में कुत्सा-नरक त्यागने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ बनो।

यदि स्वयं संतुष्ट या निर्भावना हुए हो, तो दूसरे के लिए चेष्टा करो।

दुःख भी एक प्रकार का भाव है, सुख भी एक प्रकार का भाव है। अभाव का या चाह का भाव ही है दुःख।

सभी मत ही हैं साधना विस्तार के लिए, पर वे नानाप्रकार के हो सकते है और जितने विस्तार में जो होता है—वही है अनुभूति, ज्ञान। इसीलिए धर्म है अनुभूति पर।

सत् में निरवच्छिन्न संलग्न रहने की चेष्टा को ही भक्ति कहते हैं। भक्त ही प्रकृत ज्ञानी है, भक्तिविहीन ज्ञान वाचकज्ञान मात्र है।

आज उपकृत हुआ हूँ; इसलिए कल फिर स्वार्थांध होकर अपकृत होने का बहाना कर, अकृतज्ञता को मत्त बुला लो। इससे बढ़कर इतरता और क्या है? जिस किसी से पूछ लो।

आदर्श जितना उच्च या उदार हो, उतना ही अच्छा है। कारण, जितनी उच्चता या उदारता का आश्रय लोगे, तुम भी उतना ही उच्च या उदार बनोगे।

तुम्हें मन का सन्यास हो, सन्यासी का वेष बनाकर झूठ-मूठ बहुरूपिया मत बन बैठो।

अज्ञानता मनुष्य को उद्विग्न करती है, ज्ञान मनुष्य को शांत करता है। अज्ञानता ही दुःख का कारण है और ज्ञान ही आनंद है।

तुम्हारा 'मै' पन जाते ही अदृष्ट ख़त्म हुआ। दर्शन भी नहीं, अदृष्ट भी नहीं।

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