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परमहंस योगानंद

परमहंस योगानंद के उद्धरण

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माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।

यदि आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा नहीं; तो विज्ञान द्वारा ही सही, मनुष्य को यह दार्शनिक सत्य समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत् नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उसका ताना-बाना भी केवल भ्रम है, माया है।

चित्त की मग्नता श्वास की धीमी गति पर निर्भर करती है। भय, काम, क्रोध आदि हानिकारक भावावेगों की अवस्थाओं में, श्वास अनिवार्य रूप से तेज़ या असमान गति से चलता है।

विश्वबंधुत्व द्वारा शांति की स्थापना संसार का सर्वोच्च आदर्श है।

जिस प्रकार सिनेमा के चित्र वास्तविक प्रतीत होते हैं; परंतु होते हैं मात्र प्रकाश और छाया के मिले-जुले चित्र, उसी प्रकार सृष्टि की विविधता भी एक भ्रम मात्र है।

अज्ञानी मनुष्य मृत्यु की केवल दुर्लंघ्य दीवार को ही देख पाता है, जो उसके प्रियजनों को सदा के लिए छिपा देती प्रतीत होती है। परंतु दूसरों को ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ मानकर; उनसे प्रेम करने वाला अनासक्त मनुष्य जानता है कि उसके प्रियजन केवल थोड़े-से समय के लिए ही, ईश्वर के आनंद का उपभोग करने के लिए मृत्यु के अधीन हुए हैं।

जो योगी अखंड ध्यान द्वारा अपनी चेतना को परम चैतन्य में विलीन कर देता है, वह प्रकाश (प्राणशक्ति स्पंदन) को सृष्टि के आधार तत्त्व के रूप में देखता है। उसके लिए फिर पानी बन कर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में, और ज़मीन बनकर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में कोई अंतर नहीं होता।

जो महान संत विश्वमाया के स्वप्न से जाग जाते हैं; और इस सत्य को पहचान लेते हैं कि यह विश्व तो ईश्वर के मन की केवल एक कल्पना है, वे शरीर के साथ जो चाहे कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज्ञान हो जाता है शरीर ऊर्जा का केवल एक ऐसा घनीभूत या संघनित रूप है जिसमें जैसा चाहे परिवर्तन किया जा सकता है।

देह-भूमि पर ईश्वर-साक्षात्कार की फ़सल काट लेने के बाद, सिद्ध पुरुष अपने शरीर की चिंता नहीं करता। फिर वह दूसरों के कष्ट कम करने के लिए अपने शरीर को रोगग्रस्त होने भी देता है, तो भी उसके कभी दूषित हो सकने वाले मन पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता।

माया या अविद्या को बौद्धिक विश्वास या विश्लेषण के द्वारा कभी नष्ट नहीं किया जा सकता, केवल निर्विकल्प समाधि की आंतरिक स्थिति की प्राप्ति से ही उसे नष्ट किया जा सकता है।

विचार किसी व्यक्ति में नहीं, बल्कि सृष्टि में अवस्थित है। किसी सत्य का सृजन नहीं किया जा सकता, केवल उसे जाना जा सकता है।

इंद्रियातीय सत्य की खोज केवल वही लोग कर पाते हैं, जो अपनी स्वाभाविक संसारजन्य शंकाकुशंकाओं से ऊपर उठते हैं और केवल वही इसके अधिकारी भी हैं।

एक गुरु का संसार में कार्य है—मानवजाति के दुःख कम करना। चाहे वह आध्यात्मिक उपायों से हो या बौद्धिक उपदेशों से, या इच्छाशक्ति के द्वारा हो या उनके रोगों को अपने ऊपर लेने के द्वारा हो।

जिस प्रकार किसी रेडियो-प्रसारण केंद्र की शक्ति—वह कितनी विद्युतशक्ति को काम में ला सकता है—उस पर निर्भर करती है, उसी प्रकार मनुष्यरूपी रेडियो की परिणामकारिता, हर व्यक्ति में विद्यमान इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।

आत्मचिंतन या ‘एकांतवास’ प्राणशक्ति से बँधे मन और इंद्रियों को विलग करने का अवैज्ञानिक प्रयास है।

मानव शरीर या मन में; रोग या अविवेक के रूप में प्रकट होने वाला स्पष्टतः ही सम्राट् आत्मा के विरुद्ध किया गया राजद्रोह, विनम्र प्रजा की राजभक्तिहीनता का परिणाम नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा अतीत या वर्तमान में अपने व्यक्तित्व या स्वतंत्र इच्छा—जो उसे आत्मा के साथ ही प्रदान की गई है और कभी वापस नहीं ली जा सकती—के दुरुपयोग का परिणाम है।

दैनिक जीवन की छोटी-मोटी आवश्यकताओं की पूर्ति में व्यस्त रहने से ही; हमारी गहनतम आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो जाती, क्योंकि मनुष्य में ज्ञान की भी स्वाभाविक तृष्णा होती है।

मनुष्य के सुख-स्वास्थ्य और राष्ट्र के दीर्घ जीवन के लिए योग का ज्ञान—जो ईश-प्राप्ति का विज्ञान है—अत्यावश्यक है।

प्रत्येक मनुष्य की बौद्धिक प्रतिक्रियाएँ, भावनाएँ, मनोभाव एवं आदतें केवल गत कर्मों के विपाक हैं—चाहे वे कर्म इस जन्म के हों या पिछले किसी जन्म के।

जो योगी कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति से पहले ही दिवंगत हो जाता है, उसके साथ क्रिया प्रयास के अच्छे कर्म संलग्न रहते हैं। अपने नए जन्म में वह अपने चरम लक्ष्य की ओर स्वाभाविक रूप से प्रेरित होता है।

सभी मनुष्य एक आंतरिक और एक बाह्य विश्व से प्रभावित होते हैं।

सृष्टि का आधार क्रूरता नहीं, सद्भावना है।

सृष्टि के द्वैत से ऊपर उठकर, उसके पीछे विद्यमान स्त्रष्टा की अखंड एकता को पहचानना ही मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया।

हिंदू संगीत स्वानुभूतिपरक, आध्यात्मिक तथा व्यक्ति कला है, जिसका लक्ष्य वाद्यवृंद की प्रतिभा प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि परम-आत्मा के साथ अपना मेल बिठाना है।

अंतर्ज्ञान आत्मा का मार्गदर्शन है, जो मनुष्य के मन में तब स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है—जब वह शांत होता है।

सत्य सच्चे साधकों के लिए है, व्यर्थ कुतूहल वालों के लिए नहीं।

किसी भी विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि यह सत्य है या नहीं।

आध्यात्मिक नियम यह अनिवार्य नहीं बनाता कि कोई गुरु या सिद्ध पुरुष; जब-जब दूसरे किसी मनुष्य को रोगमुक्त करें, तो वह स्वयं बीमार हो जाएँ।

संत की पहचान शारीरिक अवस्था पर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अवस्था पर आधारित होती है।

योग-विज्ञान का लक्ष्य मन को शांत करना है, ताकि विकार रहित होकर वह अंतर्वासी परमात्मा की अमोघ मंत्रणा सुन सके।

देहासक्त मनुष्य कदाचित् ही या कभी नहीं समझ पाता कि उसकी देह एक साम्राज्य है, जिस पर मस्तिष्क के सिंहासन पर विराजमान सम्राट, आत्मा का शासन चलता है।

ईश्वरीय संरक्षण में पूर्ण विश्वास और मनुष्य की ईश्वर-प्रदत्त इच्छाशक्ति, ये दोनों ऐसी प्रचंड शक्तियाँ हैं कि इन के सामने ग्रह-नक्षत्रों से प्रवाहित होने वाली शक्तियाँ ठहर नहीं सकतीं।

जब तक मनुष्य प्रकृति की जिन द्वंदात्मक भ्रांतियों में उलझा रहता है, तब तक छल-कपटी माया ही उसकी आराध्य देवी होती है और वह एकमात्र सच्चे ईश्वर को नहीं जान सकता।

शांति-सद्भावना में जीने वाली मानवजाति ही विजयश्री के अनंत फलों का रसास्वादन कर सकेगी, जो स्वाद में रक्तसिंचित भूमि में उत्पन्न—किसी भी फल से कहीं अधिक मधुर होंगे।

जो अपने को सर्वव्यापी परमतत्त्व के रूप में जान जाता है, वह फिर काल और देश की सीमा में आबद्ध नहीं रहता। आबद्ध कर रखने वाली सीमाओं के सारे घेरे, अहं ब्रह्मास्मि के तेज़ में विलुप्त हो जाते हैं।

ईश-तादात्म्य की आरंभिक अवस्थाओं (सविकल्प समाधि) में साधक की चेतना परमतत्त्व में विलीन हो जाती है, उसकी प्राणशक्ति शरीर से खिंच जाती है और शरीर निश्चल और कड़ा या ‘मृत’ प्रतीत होता है।

भौतिक विज्ञान माया के बाहर के किसी नियम का सूत्र नहीं बना सकता। सृष्टि का मूल ताना-बाना ही माया है, उसकी मूल रचना ही माया है।

मनुष्य पर यदि रक्त-मांस के शरीर में; ईश्वरत्व की झलक दिखाने की कृपा कभी की जाए, तो वह हमेशा माया के इसी भारी भ्रम में रहेगा कि वह अपनी मरणाधीनता पर कभी विजय नहीं पा सकता।

उन्नत क्रिया योगी का जीवन अतीत के कर्मों से नहीं, बल्कि केवल उसकी आत्मा के निर्देशों से प्रभावित होता है।

जो अपनी आत्मा के साथ तो क्या, प्रकृति के साथ भी सामंजस्य में नहीं जीते और इस के विपरीत निसर्गविरुद्ध जटिलताओं में उलझते हुए; शरीर और मन में प्रकृति द्वारा प्रदत्त मधुर स्वस्थताओं को आघात पहुँचाते जाते हैं, ऐसे लोगों के लिए दस लाख़ वर्षों की दुगुनी अवधि भी मुक्ति के लिए अपर्याप्त है।

ईश्वर में सायुज्य मोक्ष प्राप्त करने में ही; मानव-देह का उद्देश्य संपूर्ण रूप से पूरा होना अंतर्निहित है। यह हो जाने के बाद सिद्ध पुरुष उसकी जैसी इच्छा हो, वैसा अपने देह का उपयोग करता है।

संसार में रहकर भी जो योगी व्यक्तिगत स्वार्थ और आसक्तियों को त्याग कर; पूर्ण निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है, वह ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के सुनिश्चित मार्ग पर ही चल रहा होता है।

इच्छा के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं है। अतः गति प्रदान करने वाली इस मुख्य शक्ति, इच्छा-शक्ति को ही मनुष्य अन्य किसी भारभूत यंत्रसामग्री या यांत्रिक व्यायामों की सहायता के बिना, अपने शरीर में नवशक्ति का संचार करने के लिए प्रयुक्त कर सकता है।

आत्मा सदैव मुक्त है, वह अमर है क्योंकि वह अजन्मा है। उस पर ग्रह-नक्षत्र कभी शासन नहीं कर सकते।

पत्थरों और धातुओं में निहित शक्तियों से कहीं अधिक महान् शक्तियों को, मानवी मन अपने अंदर उन्मुक्त कर सकता है और उसे करना चाहिए, ताकि कहीं; अभी-अभी बंधनमुक्त हुआ पदार्थ—आण्विक राक्षस पलटकर जगत् का विवेकहीन विनाश कर दे।

सामान्य जीवन जीने में जो परवशता है, वह अत्यंत अपमानजनक गति में निबद्ध है।

सीधे प्राणशक्ति के ही द्वारा मन को नियंत्रित करने वाला क्रिया योग, अनंत परमतत्त्व की ओर जाने का सबसे सरल, सबसे प्रभावी और सबसे वैज्ञानिक मार्ग है।

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भारत की प्रत्येक पीढ़ी में योगसाधना ने ऐसे लोग पैदा किए हैं, जो सच्चे अर्थ में मुक्त ईसा-सदृश योगी हुए।

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मनुष्य निद्राधीन होकर उस महाप्राणशक्ति से पुनरावेशित हो जाता है, जो समस्त जीव-जगत का प्राणाधार है।

ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को आत्मा के रूप में बनाया है, उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व दिया है। इसलिए वह विश्व रचना का एक अनिवार्य अंश है, फिर अपनी अल्पकालिक भूमिका में चाहे वह आधार स्तंभ हो, चाहे एक परजीवी।

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