जब तक मनुष्य प्रकृति की जिन द्वंदात्मक भ्रांतियों में उलझा रहता है, तब तक छल-कपटी माया ही उसकी आराध्य देवी होती है और वह एकमात्र सच्चे ईश्वर को नहीं जान सकता।
जब तक इस संसार से पाप बिल्कुल ही मिटा न दिया जाएगा, जब तक मनुष्य का मन पत्थर न बन जाएगा, तब तक इस पृथ्वी में अन्याय-मूल भ्रांति होती ही रहेगी और उसे क्षमा करके प्रश्रय भी देना ही पड़ेगा।