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मैक्सिम गोर्की

1868 - 1936 | निज़हनी नोवगोरोड

समादृत सोवियत लेखक, नाटककार और राजनीतिक विचारक। समाजवादी यथार्थवाद के प्रवर्तक।

समादृत सोवियत लेखक, नाटककार और राजनीतिक विचारक। समाजवादी यथार्थवाद के प्रवर्तक।

मैक्सिम गोर्की के उद्धरण

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पृथ्वी स्वयं इस नए जीवन को जन्म दे रही है और सारे प्राणी इस आनेवाले जीवन की विजय चाह रहे हैं। अब चाहे रक्त की नदियाँ बहें या रक्त के सागर भर जाएँ, परंतु इस नई ज्योति को कोई बुझा नहीं सकता।

मनुष्य को अपने आप में विश्वास होना चाहिए—कानूनों पर नहीं। मनुष्य की आत्मा में ईश्वर का अस्तित्व होता है। यह मनुष्य पृथ्वी पर पुलिस कप्तान अथवा गुलाम के स्वरूप में नहीं आता है। क़ानून मनुष्य से नीचा होता है।

नवयुग की ज्योति को जो एक बार देख लेता है, उसी को वह पवित्र बनाती हुई जलाने लगती हैं।

धन में बल है सत्य नहीं।

  • संबंधित विषय : धन
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जहाँ तक मेरा सवाल है, मेरा विचार है कि वास्तविक सभ्यता के साथ-साथ संस्कृति का तीव्र विकास तभी संभव है, जब राजनैतिक सत्ता पूरी तरह से कामगारों के हाथ हो—न कि दूसरों की मेहनत पर पल रहे परजीवियों के।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

रोशनी एक मुक्त तत्व है—सूर्य की गर्वीली संतान। जब वह अपने निखार पर आती है; वह दुनिया के किसी भी फूल से सुंदर होती है और सारी थकी हुई, मर चुकी और ग़लत चीज़ों का विनाश कर सकती है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

परंतु जब से मुझे मालूम हुआ है कि लोगों में सत्य है, और जीवन की गंदगी और बुराई के लिए बहुसंख्या दोषी नहीं है, तब से मेरा हृदय कोमल बन गया है। मेरे दिल में लोगों के लिए एक दर्द गया है।

एक सी सूझ वाले लोग प्रत्येक वस्तु को समान उपहासजनक, सौंदर्यपूर्ण अथवा घृणोत्पादक दृष्टिकोण से देखते हैं। सूझ की इस एकता को सुगम बनाने के लिए किसी विशेष मंडल या परिवार के लोगों के बीच अपनी विशिष्ट भाषा, अपने विशिष्ट मुहावरे, यहाँ तक कि अपने विशिष्ट शब्द पैदा हो जाते हैं जिनके विशिष्ट अर्थ अन्य लोग अन्य नहीं समझ सकते।

सड़क एक फिसलन भरा लालची गला है, जिसकी गहराइयों में शहर के भोजन के काले टुकड़ों जैसे जीवित लोग तैरते हैं।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

  • संबंधित विषय : सड़क

क्रांतिकारी को गृहस्थी में पड़ कर अपनी शक्ति कम नहीं कर लेनी चाहिए अपितु सदैव अपनी शक्ति बढ़ाते रहने का प्रयत्न करना चाहिए, दिन पर दिन अपनी शक्ति को गहरा और विशाल बनाने का प्रयत्न करते रहना चहिए। इस काम के लिए पूरा समय चाहिए। क्रांतिकारियों को सदा दूसरों से आगे रहना चाहिए।

तुम्हें क्या पता, भूख कैसी होती है? तुम्हें उसकी भय-करता का क्या पता? परंतु वहाँ मनुष्यों के पीछे-पीछे भूत की तरह लगी फिरती है। उन्हें रोटी मिलने की कोई आशा नहीं होती। अस्तु, यह भूख उनकी आत्मा को ही खा जाती है। उनके मुँह पर से मनुष्यता के चिह्न नष्ट हो जाते हैं। वे जीते नहीं। भूख और आवश्यकताओं से धीरे-धीरे घुलते है।

मौत के भय से डरे हुए आदमी के मन को भीड़ अच्छी तरह समझती है, और इस रहस्यमय ऊहापोह के बीच जो भी उसकी समझ में आता है—उससे उसे आनंद मिलता है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

दुनिया का नया देवता 'जनता' है। दुनिया की सारी चीज़ें सभी के लिए हैं। सभी कुछ हर एक के लिए है। जीवन का सर्वस्व एकता में है। सारा जीवन हर एक के लिए है और हर एक सारे जीवन के लिए है।

अंधी भीड़ धुँधले तरीक़े से हरेक चीज़ के लिए आक्रामक है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

अगर एक आदमी अपनी सारी ज़िंदगी अपने देश के लिए मशक़्क़त करता रहा हो, तो यह निश्चित तौर पर उसका हक़ है कि उसकी मौत के बाद उसे शांति से रहने को छोड़ दिया जाए।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

कोई क्रांतिकारी किसी व्यक्ति-विशेष से चिपटकर नहीं रह सकता, किसी के साथ लगातार हाथ मिलाए हुए जीवन में नहीं चल सकता। ऐसा करे तो उसे अपने क्रांतिकारी विश्वास को कम और ढीला करना होगा।

माताएँ ही भविष्य के विषय में विचार कर सकती हैं क्योंकि वे अपनी संतानों में भविष्य को जन्म देती हैं।

जब भी कोई ऐसा व्यक्ति सड़क पर नज़र आता है; जो अपने कपड़ों या चाल की वजह से दूसरों से फ़र्क़ नज़र आता है, तो अपने सैकड़ों सिरों को उसकी तरफ़ घुमाकर 'भीड़' उसे सवालिया निगाहों से घूरती है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

मौत का मौत से बदला चुकाओ। ऐसी मौत मरो जिससे लोगों को जीवन मिले। हज़ारों को इसी तरह मरना चाहिए जिससे पृथ्वी पर बसने बाले लाखों को फिर से जीवन मिले। समझे? मर मिटना तो आसान है मगर लोगों में जान आनी चाहिए।

नैतिकता आपके काम आती रहती है, जब आपके पास अपनी ज़रूरत की हर चीज़ है और आप उसे बस अपने लिए रखना चाहते हैं।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

जहाँ बहुत सारी ग़ुलामी होती है, वहाँ आज़ाद रचनात्मक विचारों के लिए जगह नहीं होती और केवल विनाश के विचार और प्रतिशोध के फूल वहाँ खिल सकते हैं।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

अपनी गति में जीवन बिना थके, बिना ठहरे चिंघाड़ता रहता है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

गुपचुप मंद गति से गंदे नाले के प्रवाह की तरह यहाँ का जीवन बह रहा था।

अगर आप आदमी की आत्मा को जकड़ देते हैं, तो आपको उससे दया की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

शहर में प्रवेश करना पत्थर और लोहे के किसी पेट में घुसने जैसा है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

एक ग़रीब आदमी किसी ऊँची इमारत की छत पर खड़े दृष्टिहीन आदमी जैसा होता है।

अनुवाद : अशोक पाण्डे

अतीतकाल रूपी गाड़ियों से तुम कहीं नहीं जा सकते।

हर आदमी को दुनिया में बूट, जूता या छाता सुलभ नहीं होता परंतु हर आदमी को अपने पड़ोसी से अधिक दिखावा करने का शौक़ होता है।

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