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हम ‘लगान’ देख रहे थे

साल 2001, जून का महीना। तारीख़ याद नहीं... गूगल बता सकता है, लेकिन क्या पूछना...

मैं  नया-ताज़ा पटना पहुँचा था, दूसरी बार—इस बार स्थायी रूप से रहने के लिए, क्योंकि मैं आयरन गेट तोड़ चुका था... जी हाँ, आयरन गेट। बिहार में हमारे ज़माने में मैट्रिकुलेशन परीक्षा को आयरन गेट ही कहते थे। गिने-चुने लोग ही इसको सम्मान से, यानी प्रथम श्रेणी से, पार करते थे। परीक्षा पिछले कुछ सालों से उच्च न्यायालय की निगरानी में होने लगी थी और शिक्षा का स्तर बुनियादी स्तर पर ठीक था। एक गलाकाट प्रतियोगी माहौल में हम पढ़ रहे थे, जहाँ मास्टर साहब हमेशा डराते थे—“रकेसवा पढ़ता... देख ल... उहे टॉप करी...” रकेसवा से बात करते हुए, हँसते-खेलते और उसको पछाड़ने के लिए हम पढ़ते थे। रकेसवा भी पढ़ता था।

मैट्रिक पास करने के बाद का अगला पड़ाव था—पटना और साइंस। कुछ लोगों के रास्ते यहाँ से इंजीनियरिंग की तरफ़ मुड़ते थे और कुछ लोगों के मेडिकल की तरफ़। इसके दीगर कोई रास्ता अगर किसी को सूझ जाता था तो उसके बारे में समाज की राय थी—“खत्तम बा... बाज़ार साफ़...”

वह असाधारण साल था। पच्चीस साल बाद भी...

मार्च का महीना। बिहार के पश्चिमी चंपारण ज़िले के बगहा शहर के प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय (जिसमें हमारे मैट्रिक के इम्तिहान का सेंटर था) की दुमंज़िला इमारत की सीढ़ियाँ उतरते हुए उस सवाल की याद है, जो नीचे से ऊपर आते हुए व्यक्ति से मैंने पूछा था, “क्या स्कोर है?”

बाहर से आने वाले उस व्यक्ति के पास सूचना थी कि द्रविड़ और लक्ष्मण टिके हुए हैं। 

भारत-ऑस्ट्रेलिया का वह ऐतिहासिक मैच था। अनुमान हो गया था कि इतिहास के साक्षी हम बनने वाले हैं। उस समय तक पढ़ने के अलावा हमारा सबसे बड़ा डिस्ट्रैक्शन क्रिकेट था। ऐसा कि नेतरहाट की तैयारी करने के क्रम में मुझे ट्यूशन के सर के सामने कॉपी पर शपथ लिखनी पड़ी थी कि नेतरहाट की परीक्षा तक क्रिकेट नहीं खेलूँगा। उस परीक्षा का एडमिट कार्ड ही नहीं आया... क्रिकेट खेलना चालू हो गया।

जून की उस तारीख़ को मेरे भाई का भी इंटर का रिज़ल्ट आया था। बिहार इंटरमीडिएट एजुकेशन काउंसिल के मानकों के अनुसार वह बहुत अच्छा था। रिज़ल्ट की ख़ुशी साझा करने के लिए लोग इकट्ठे हुए थे। स्वीट हट लेन, मुसल्लहपुर। पटना के उस दो कमरों के घर में तय हुआ कि सेलिब्रेट करने के लिए खाने-पीने से अच्छा है फ़िल्म देखने चला जाए। ‘गदर’ उसी दिन रिलीज़ हुई थी। दस-ग्यारह लोग रहे होंगे। रात नौ से बारह का शो देखना था। एक साइकिल थी जिससे दो लोगों को आगे जाना था टिकट कटाने और बाक़ी लोगों को पीछे से ‘एल्फ़िंस्टन’ सिनेमा हॉल पहुँचना था। रिक्शा, टेम्पू (तिपहिया मोटर वाहन) और पैदल जाने का विकल्प था। टाइम अगर पास होता तो सिनेमा देखने हम लोग पैदल ही जाते और लौटते। समय कम हो और पैसा पास में हो तो रिक्शे का विकल्प रहता और पैदल चलने का मन न हो, पैसा कम हो, तो टेम्पू का विकल्प था।

मुसल्लहपुर से गांधी मैदान के सिनेमा-हॉलों की दूरी उन दिनों दूरी नहीं लगती थी। गांधी मैदान क्यों, अशोक टॉकीज़ जो ठीक-ठाक दूर था, पटना रेलवे स्टेशन के क़रीब—वहाँ तक लोग सिनेमा देखकर पैदल लौटते थे। हम दोनों भाइयों के पास एक विकल्प और था—साइकिल, जिसका बहुधा प्रयोग होता था। लेकिन अक्सर सिनेमा दो से अधिक लोग साथ देखने जाते थे।

नौ से बारह के शो में केवल टिकट रखना होता था पास में, रात्रि गश्त वाले वाहन पर सवार पुलिस को दिखाने के लिए, जो धीमे से पीछे आकर रोकते, पूछते और फिर आगे बढ़ जाते थे।

यह तथाकथित ‘जंगलराज’ था।

सिंगल थिएटर के स्वर्णिम दिनों का वह आख़िरी दौर था। (यह किसी को क्या पता था?)

पटना की गली-गली में वीडियो पार्लर खुल गए थे। साइबर कैफ़े भी, जिनमें चप्पल-जूता उतारकर जाना होता था। जिज्ञासु दस रुपये में एक घंटे के लिए साइबर कैफ़े में जाते और पर्दे के पीछे बने केबिन में बैठकर पता नहीं क्या देखते थे। रेडिफ़ और याहू के ईमेल आईडी लोग अपने पते के तौर पर बताने लगे थे।

सिनेमा हॉल के बड़े पर्दे का जादू सिर चढ़कर बोलता था, जबकि एक सौ बीस रुपये में पार्लर वाले टीवी और वीसीडी प्लेयर देते थे रात भर के लिए, साथ में मनपसंद पाँच फ़िल्में। घिसी हुई सीडी हो तो वापस करके दूसरी फ़िल्म उसके बदले में ली जा सकती थी। एक सौ बीस रुपये अकेले छात्र के लिए महँगा सौदा था; क्योंकि वह कुल बारह रुपये में फ़िल्म देख सकता था, जिसमें दो रुपये साइकिल-स्टैंड का भी शामिल था। समोसा खाते हुए लौट सकता था।

टीवी को कमरे में छुपाकर लाना पड़ता था, क्योंकि मकान मालिक से लेकर पड़ोसी तक आपको जज करते हुए टिप्पणी कर सकते थे और व्याख्यान भी दे सकते थे। वीडियो लाया भी जाता था ऐसी फ़िल्मों को देखने के लिए जिनका नाम न लेकर लोग भारत के दो महाकाव्यों का नाम लेते थे, जिसका अब नामोल्लेख मात्र से आहत हो जाने की संभावना है। किशोर लड़के एक अपने सामूहिक एकांत में अपनी जिज्ञासा के पार निर्भीकता की दुनिया में झाँकते थे... इसे स्वीकारने का मतलब था—अपनी छवि ख़राब करना। जिस कार्यवाही को गुप्त बनाए रखने के लिए सबके बीच एक अलिखित समझौता था, उसे कभी-कभी कोई तोड़ भी देता था—पैसों के कड़े हिसाब से या अपने अपराध-बोध के आगे समर्पण करते हुए।

इसी समर्पण के परिणामस्वरूप एक अभिभावक इतने व्यथित हुए कि लड़के का साथ छोड़ने पटना तक आए, केवल उस लड़के की खोज में जिसका हिसाब लेना था, जिसकी संगति में उनके लड़के ने इस वीडियो-अनुष्ठान का सफल आयोजन किया था और जो उसे भावी इंजीनियर बनने के मार्ग से च्युत करने की साज़िश कर रहा था।

इस वक़्त तक मोबाइल फ़ोन अभी सुलभ नहीं हुआ था। किसी-किसी के हाथ में दिखता था। पीसीओ का ज़माना था और लड़के आत्मनिर्भर थे कि अपनी ज़रूरत के हिसाब से घर पर फ़ोन करते थे।

पाँच-छह लोगों के जुटने पर बीस-बीस के चंदे से होने वाला वीडियो-अनुष्ठान लोकप्रिय हो रहा था, लेकिन बड़ा पर्दा बड़ा पर्दा था और अभी पटना में भी ‘रूपक’ सिनेमा हॉल बंद नहीं हुआ था। मॉर्निंग शो का रिवाज भी कायम था। अकेले को किसी बात का ख़तरा नहीं था, डर नहीं था—बस अपने अपराध-बोध से निजात पा लेनी थी। सिनेमा हॉल के बाहर टिकट ब्लैक हुआ करते थे। काउंटर से टिकट बेचना मजबूरी थी, तो नई रिलीज़ फ़िल्मों के कुछ टिकटों को काउंटर से बेचने का दिखावा भी होता था। टिकट न पाने से निराश दर्शक ब्लैक के सहारे सिनेमा देखने का जतन करते और उसे स्टेटस का प्रतीक भी बनाया जाता, “मैंने तो इतने रुपये में फ़लाँ सिनेमा का टिकट ब्लैक में खरीदा।”

इस दौर के दर्शकों के अपने बनाए सिद्धांतों में एक प्रमुख सिद्धांत था कि हॉल के पास पहुँचकर बिना सिनेमा देखे नहीं लौटेंगे। इसलिए ब्लैक टिकट ख़रीदने का तर्क यह भी था।
पटना में उस समय चर्चा थी कि ब्लैक टिकट का सबसे अधिक रेट अभिषेक बच्चन और करीना कपूर स्टारर ‘रिफ़्यूजी’ का था—ब्लॉकबस्टर ‘कहो ना... प्यार है’ से भी अधिक। पटना के दर्शक अलग थे। वे देश भर में पिट गई फ़िल्म को महीनों सिनेमाघर में लगाए रखते थे और देश भर में हिट रही फ़िल्म पटना में दर्शकों के लिए तरस जाती थी। ‘गदर’ का जलवा रिलीज़ से पहले ही कायम हो चुका था। इसलिए तय हुआ था कि ‘गदर’ ही देखनी है। दो जन साइकिल से आगे बढ़े टिकट लेने और बाकी लोग पीछे। मैं पीछे वाली मंडली में था। जब हम लोग ‘एल्फ़िंस्टन’ सिनेमा हॉल पहुँचे, तो निराशा हाथ लगी—टिकट समाप्त था।

पटना में गांधी मैदान के एक सिरे पर कई सिनेमा हॉल थे। क्रम से ‘एल्फ़िंस्टन’, फिर उससे लगा हुआ ‘मोना’, थोड़ा आगे ‘रीजेंट’, फिर उसके बाद एक सड़क के भीतर आगे बढ़ने पर ‘रूपक’ और एग्ज़िबिशन रोड की तरफ़ ‘अप्सरा’। इसके कुछ आस-पास ही ‘चाणक्य’ और थोड़ी दूर पर ‘उमा’। इनमें से ‘मोना’, ‘एल्फ़िंस्टन’ और ‘रीजेंट’ अपना स्वरूप बदलकर बचे हुए हैं।

अब दस लोग ब्लैक में टिकट ख़रीदें, यह हैसियत नहीं थी और टिकट भी नहीं था। ‘वीणा’ वह दूसरा सिनेमा हॉल था, जिसमें ‘गदर’ लगी थी। वह थोड़ी दूरी पर था और शो के समय तक वहाँ पहुँचना संभव नहीं था। ‘उमा’ जो संभवतः सबसे अधिक दर्शक-क्षमता वाला हॉल था, में एक दूसरी फ़िल्म लगी थी, जो उसी दिन रिलीज़ हुई थी। दर्शक-क्षमता के कारण वहाँ टिकट मिलने की संभावना थी... साइकिल वाले लोग उधर की तरफ़ हो लिए और हम लोग पीछे-पीछे पैदल। गांधी मैदान के बाहरी रोड पर ‘मोना’, ‘रीजेंट’, पटना स्टॉक एक्सचेंज और थाना पार करते हुए दलदली रोड पर आगे बढ़े, जिसका एक सिरा सीधे ‘उमा’ के पास निकलता था। वहाँ पहुँचने पर शुभ समाचार मिला कि टिकट मिल गया... 

हम दस-ग्यारह लोग हॉल में दाख़िल हुए। फ़िल्म किस बारे में थी, यह किसी को पता नहीं था। आमिर ख़ान की फ़िल्मों का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। कुछ गाने लोकप्रिय हो रहे थे। सिनेमा के बारे में जानकारी टीवी विज्ञापनों से मिलती थी, लेकिन वह सुविधा हममें से किसी के पास नहीं थी। अख़बारों में प्री-रिलीज़ कवरेज से भी कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल था। हम जिस शहर से पटना आए थे, वहाँ उन्हीं फ़िल्मों के ट्रेलर दिखाए जाते थे, जो सिनेमा हॉल में लगने वाली होती थीं। वहाँ फ़िल्में रिलीज़ होने के कुछ दिनों बाद लगती थीं। वैसे ‘लगान’ के ट्रेलर से भी कुछ ख़ास अंदाज़ा नहीं लगता था। 

‘गदर’ का तीसरा शो ख़त्म होने वाला था। अमीषा पटेल स्टार बन चुकी थीं। सनी देओल की ग़ुस्सैल छवि ट्रेलर से प्रचारित हो चुकी थी। गाने लोगों की ज़बान पर चढ़ गए थे और हॉल से बाहर निकलने वाले लोगों ने ‘गदर’ का गदर काटना शुरू कर दिया था। इधर ‘लगान’ में आमिर ख़ान के अलावा कोई पहचान में नहीं आ रहा था। ए. आर. रहमान के गानों ने कुछ जगह बना ली थी, लेकिन इतनी नहीं कि पान की दुकानों पर बज सकें। वहाँ ‘उड़ जा काले कावाँ...’ लगातार बज रहा था।

बिहार में पान की दुकानें ही चार्टबस्टर की सूची तय करती थीं।

ग्रेसी सिंह को कौन जानता था? 

पहला ही दिन था। मुँहज़बानी चर्चा शुरू नहीं हुई थी। ‘उमा’ में एक दिन में तीन ही शो चल रहे थे। पौने चार घंटे की फ़िल्म थी। दूसरा शो अभी चल ही रहा था। एक शो से निकलने वाले लोग कितना शोर मचा पाते? हम लाइन में थे। बालकनी की सीट थी। बारी-बारी से हमने सीट ली। फ़िल्म शुरू हो चुकी थी। आमिर ख़ान हिरन को शिकार से बचा रहे थे। फ़र्स्ट हाफ़ बीता। मैच की तैयारी भुवन की टीम करने लगी थी और दूसरे हाफ़ में सिनेमा हॉल स्टेडियम में तब्दील हो चुका था। दर्शकों को लग गया था कि वे एक ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा हैं और ऐसे क्षणों में शरीक होने का मौक़ा उन्हें भविष्य में फिर कभी नहीं मिलने वाला।

हम इस बात से भी अनजान थे कि ठीक उन्नीस साल बाद ऐसी महामारी आएगी, जो बंद होते सिनेमाघरों को स्थायी रूप से बंद करा देगी। हम इस बात से भी अनजान थे कि बड़े पर्दे का जादू सिमटने लगेगा। ओटीटी का व्यापक संजाल पसर जाएगा। हम इस बात से भी अनजान थे कि वह साल हिंदी सिनेमा के पैराडाइम शिफ़्ट का भी साल बनने वाला था। कुछ दिनों बाद एक फ़िल्म रिलीज़ होने वाली थी—‘दिल चाहता है’ और सब बदलने वाला था।

हम ‘लगान’ देख रहे थे।

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अमितेश कुमार को और पढ़िए : कविता में नाटकीयता की खोज

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