परस्पर प्रीति को उत्पन्न करने वाले अपने अनुकूल आलिंगनादि भावों के अनुसरण से, क्षणभर में नाराज़ होकर मुख फेर लेने से और क्षणभर में ही, परस्पर प्रेम भरी निगाहों से देखने से रति की इच्छा बढ़ती है।
जब दीवार या खंभे को दोनों ओर से पकड़ कर; नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे को ज़ोर से दबाएँ, तो वह 'पीड़ितक' आलिंगन कहलाता है।
शाल वृक्ष पर लिपटती हुई लता के समान, नायिका जब नायक का मुख चूमने के लिए उसके मुख को थोड़ा झुकाए, फिर उठाकर सी-सी करती हुई; उससे लिपटकर उसके मुख-सौंदर्य को देखे, तो यह आलिंगन 'लतावेष्टितक आलिंगन' कहलाता है।
नायक-नायिका अत्यधिक कामांध होकर; किसी प्रकार की हानि की परवाह न करके, एक ही पलंग पर नायिका नायक की गोद में बैठकर अथवा एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर; परस्पर एक-दूसरे से इस प्रकार चिपट जाएँ, मानो एक-दूसरे के अंदर समा जाना चाहते हों, तो इस प्रकार के आलिंगन को 'क्षीरजलक' आलिंगन कहते हैं।
यदि आलिंगन करने पर नायिका उठकर खड़ी हो जाए और पुनः दूसरे दिन कुपित न होकर; प्रसन्न होकर उसके सामने आए, तो समझ ले कि अभी वह मिलना ही पसंद करती है। यदि वह प्रगल्भा नायिका दूसरे दिन भी नाराज़ होकर चली जाए, तो दूती के द्वारा सिद्ध करना चाहिए।
नायिका जब एक पैर से नायक के पैर को दबाते हुए, दूसरे पैर से उसकी जंघाओं को संपीडित करे और एक बाँह से उसकी पीठ का आलिंगन करती हुई, दूसरी बाँह से उसके कंधे को झुकाकर; मंद सीत्कार के साथ उसके मुख को चूमने के लिए उस पर चढ़ने का प्रयत्न करती है—तब उस आलिंगन को ‘वृक्षाधिरूढ़क’ कहा जाता है।
जब नायिका लेटे हुए अपने एक जंघा से नायक की जंघा को दबाकर, अपने बालों और बाँहों को फैलाकर नखक्षत, दंतक्षत, प्रहणन और चुम्बनादि आलिंगन करने के लिए पुरुष के ऊपर लेट जाए, तो 'जघनोपगूहन' आलिंगन कहलाता है।
अंधकार में, भीड़-भाड़ में अथवा एकांत में धीरे-धीरे चलते हुए; नायक-नायिका दोनों के शरीर का अधिक देर तक घर्षण हो, तो 'उद्धृष्टक' आलिंगन कहलाता है।
जैसे तिल और चावल एक दूसरे से मिल जाते हैं, वैसे ही शय्या पर लेटे हुए नायक-नायिका; दोनों अपनी भुजाओं, जंघाओं को परस्पर एक-दूसरे से सटाकर, मर्दन करते हुए प्रगाढ़ आलिंगन करें, तो वह 'तिलतंडुलक' आलिंगन कहलाता हैं।
जब नायक-नायिका एक-दूजे से अत्यधिक परिचित न हुए हों, ऐसे में नायिका जब एकांत में अपने प्रेमी को खड़ा हुआ या बैठा हुआ देखे, तो किसी वस्तु को लेने के बहाने उसे अपने स्तनों से नायक को स्पर्श करने की कोशिश करनी चाहिए और नायक को भी उसका अच्छी तरह आलिंगन करना चाहिए। इस तरह का आलिंगन 'विद्धक आलिंगन' कहलाता है।
जब नायक नायिका के साथ सामने मुख करके करवट लेटकर, अपनी एक जाँघ अथवा दोनों जंघाओं से एक-दूसरे को पूर्ण शक्ति के साथ दबाए, तो 'ऊरूपगूहन' नामक आलिंगन होता है।
यदि पत्नी विवाह के पूर्व परिचिता है, तो उन्मत्तयौवना पत्नी का दीपक के प्रकाश में आलिंगन करना चाहिए और यदि विवाह के पहले दोनों का पूर्व परिचय न हो, तो अभुक्तपूर्वा लज्जाशील बाला का अंधकार में आलिंगन करना चाहिए।
अतिपरिचित नहीं हुई प्रेमिका अगर सामने से आ रही हो, तो जाते हुए उसके शरीर को अपने शरीर से किसी बहाने से स्पर्श कराना, 'स्पृष्टक' आलिंगन कहलाता है।
जब नायिका अपने मुख को नायक के मुख से सटाकर और आँखों को आँखों से मिलाकर; ललाट से ललाट को दबाए, तो 'ललाटिया' आलिंगन कहा जाता है।
जब नायिका अपने स्तनों को नायक की छाती में गड़ाकर; स्तनों के भार से उसकी छाती को ज़ोर से दबाए, तो 'स्तनालिंगन' कहलाता है।