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चे ग्वेरा : एक समर्पित क्रांतिकारी का एक पूँजीवादी चीज़ में बदलना

रजिस देब्रे ने बोलिविया की जेल में चे ग्वेरा का साक्षात्कार लिया था। बाद में उन्होंने लिखा, “चे आधुनिक युग के ईसा मसीह हैं, बल्कि मुझे लगता है कि उन्हें उससे भी अधिक यातना सहनी पड़ी। दो हज़ार वर्ष पहले ईसा मसीह अपने ईश्वर के सम्मुख प्राण त्याग रहे थे। लेकिन चे जानते थे कि उनका कोई ईश्वर नहीं है और मृत्यु के बाद उनके लिए कुछ भी शेष नहीं रहेगा।”

चे ग्वेरा की मृत्यु 9 अक्टूबर 1967 को बोलिविया के एक दूर-दराज़ गाँव में हुई थी। उन्हें गोलियों से भून दिया गया था। उनके शव को लोगों के सामने प्रदर्शन के लिए रखा गया और उनकी मृत्यु के प्रमाण के रूप में उनके दोनों हाथ तक काट लिए गए। इतिहास के सामान्य नियम के अनुसार वहीं उनकी कहानी समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन विडंबना यह है कि उनकी मृत्यु के बाद ही उनका दूसरा जीवन शुरू हुआ और शायद वह जीवन उनके वास्तविक जीवन से भी अधिक लंबा, जटिल और विवादास्पद साबित हुआ।

आज दुनिया के किसी भी शहर में निकल जाइए, अचानक कहीं न कहीं चे ग्वेरा से आपकी मुलाक़ात हो सकती है। किसी विश्वविद्यालय की दीवार पर, किसी रॉक-बैंड के पोस्टर में, किसी कैफ़े की सजावट में, किसी छात्र की टी-शर्ट पर या किसी बड़े शॉपिंग-मॉल के शोकेस में। यहाँ तक कि यह भी संभव है कि जिस युवक (ख़ासकर Gen Z) ने अपने सीने पर चे की तस्वीर छाप रखी है, उसे यह भी न मालूम हो कि यह व्यक्ति वास्तव में कौन था। शायद वह सिएरा माएस्त्रा के पहाड़ों को नहीं जानता, कांगो के असफल अभियान को नहीं जानता, बोलिविया के जंगलों में लड़ी गई अंतिम लड़ाई के बारे में भी नहीं जानता। वह केवल इतना जानता है कि यह चेहरा आकर्षक लगता है... विद्रोही, अलग और प्रभावशाली।

यहीं से चे ग्वेरा की कहानी एक विचित्र मोड़ लेती है।

सुज़ाना ओसिनागा एक नर्स थीं जिन्होंने चे की हत्या के बाद उनके शव को साफ़ किया था। सुज़ाना ने कहा था, “वे बिल्कुल ईसा मसीह की तरह लग रहे थे... उनकी तीक्ष्ण आँखें, दाढ़ी-मूँछें, लंबे बाल...” लेकिन उन्होंने उन कटे हुए हाथों का उल्लेख नहीं किया, जिन्हें चे की मृत्यु के बाद उनके शव से अलग कर लिया गया था।

इतिहासकार और लेखक जॉर्ज जी. कास्तानेदा लिखते हैं कि ऐसा प्रतीत होता था, जैसा मृत ग्वेरा अपने हत्यारों की ओर देख रहे हों और उन्हें क्षमा कर रहे हों... जैसे किसी आदर्श के लिए प्राण देने वाले मनुष्य की अंतिम करुणा। जर्मन नाटककार Peter Weiss को वह दृश्य लगता है ‘Christ taken down from the cross.’ चे की छवि को केंद्र में रखकर ‘द लास्ट सपर’ की तर्ज़ पर अनेक चित्र बनाए गए हैं। बोलिविया में चे और उनके क्रांतिकारी साथियों के अभियान-पथ को आधार बनाकर ‘होली ग्रेल ऑफ़ चे ग्वेरा’ नामक पर्यटन-मार्ग विकसित किया गया है। यहाँ तक कि ‘सेंट एर्नेस्टो चर्च’ जैसी स्मृतियाँ भी अस्तित्व में हैं। जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में बिताया, मृत्यु के कुछ दशकों बाद उसी को पूँजीवाद ने दुनिया के सबसे सफल ब्रांडों में से एक बना दिया। एक ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और दूसरी ओर क्रांतिकारी युवा... दोनों ही एक ही चेहरे का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन बिल्कुल अलग अर्थों में। Ben & Jerry’s अपने आइसक्रीम का नाम रखता है—‘Cherry Guevara’... 

एक फ़्रांसीसी उद्यमी का एक परफ़्यूम था, जो ‘चे परफ़्यूम’ के नाम से काफ़ी प्रसिद्ध हुआ था। नाम था ‘शेविग्नॉन’ (Chevignon)। इस उत्पाद का प्रचार-वाक्य था—“यह परफ़्यूम उन लोगों को समर्पित है जो एक क्रांतिकारी की भावना और उसकी ख़ुशबू का अनुभव करना चाहते हैं।”

वर्ष 2008 में रेनॉल्ट समूह की वाहन निर्माता कंपनी डासिया ने अपनी नई Logan MCV Station Wagon के लिए एक विज्ञापन तैयार किया, जिसका शीर्षक था—‘Revolution’ इस विज्ञापन में फ़िदेल कास्त्रो की भूमिका निभाने वाला एक अभिनेता एक दूरस्थ गाँव में पहुँचता है। वहाँ उसका स्वागत आधुनिक युग के अन्य ‘क्रांतिकारियों’ द्वारा किया जाता है। विज्ञापन के अंतिम दृश्य में एक कार के पीछे खड़े अर्नेस्टो चे ग्वेरा और कार्ल मार्क्स दिखाई देते हैं। चे, मार्क्स से कहते हैं, “यह एक नई क्रांति का समय है।” इस पर मार्क्स उत्तर देते हैं, “चे, यही वह चीज़ है जो लोग चाहते हैं।” कार कंपनियाँ अपने नए मॉडलों के प्रचार में चे और मार्क्स को सामने ले आती हैं। कोला, सिगरेट, शराब, मोबाइल फ़ोन, वीडियो गेम ऐसा कौन-सा बाज़ार है जहाँ चे मौजूद नहीं हैं?

यह सोचकर आश्चर्य होता है। इतिहास में कितने ऐसे लोग हुए हैं जिनका चेहरा एक ही समय में प्रतिरोध के झंडे पर भी दिखाई देता हो और सुपरमार्केट के उत्पादों पर भी?

इस पूरे चमत्कार के केंद्र में है एक तस्वीर।

मार्च 1960 में अल्बर्टो कोर्डा ने जो तस्वीर खींची थी, वह उस समय सिर्फ़ एक फ़ोटोग्राफ़ थी। एक युवा क्रांतिकारी का चेहरा... अपने साथी की मृत्यु से दुखी, क्रोधित और फिर भी अदम्य संकल्प से भरा हुआ। लेकिन इतिहास कभी-कभी कुछ तस्वीरों को मनुष्यों के हाथों से छीनकर मिथक में बदल देता है। चे के साथ भी यही हुआ। तस्वीर को काट-छाँटकर उसके संदर्भ मिटा दिए गए। पीछे का दृश्य ग़ायब हो गया और केवल चेहरा बचा रहा। फिर वह चेहरा पूरी दुनिया में फैल गया... पोस्टरों पर, बैनरों पर, किताबों के कवरों पर, दीवारों की ग्रैफ़िटी में।

जब बोलिविया के उस छोटे-से स्कूलघर में चे ग्वेरा का निर्जीव शरीर पड़ा था, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि कुछ दशकों बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के लोग उन्हें केवल एक क्रांतिकारी के रूप में नहीं, एक अलौकिक उपस्थिति के रूप में देखने लगेंगे... शायद यहीं से चे का दूसरा जन्म आरंभ होता है।

बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक इतिहास में अनेक क्रांतिकारी आए, अनेक नेताओं ने जनता के हृदय में स्थान बनाया। लेकिन चे के साथ जो हुआ, वह राजनीतिक लोकप्रियता से कुछ और था। वह धीरे-धीरे एक नैतिक प्रतीक में रूपांतरित हो गए। उनके जीवन की सफलताओं और असफलताओं से परे, उनके राजनीतिक निर्णयों की सही-ग़लत बहसों से ऊपर उठकर, लोगों की सामूहिक कल्पना में वह आत्मबलिदान की एक शाश्वत छवि बन गए।

जिस प्रकार ईसाई परंपरा में सूली पर चढ़ाए गए ईसा मसीह का शरीर केवल एक मनुष्य की मृत्यु का दृश्य नहीं, बल्कि एक विश्वास का मूर्त रूप है, उसी प्रकार चे के मृत शरीर की तस्वीर भी बहुत-से लोगों के लिए एक आदर्श की दृश्य प्रतिमा बन गई। वह व्यक्ति जो जानता था कि उसके सामने पराजय, कारावास या मृत्यु खड़ी है; फिर भी जिसने अपना रास्ता नहीं बदला... यह कथा आज भी मानव-कल्पना को गहराई से झकझोरती है। फलस्वरूप, चे का जीवन धीरे-धीरे इतिहास के विषय से संस्कृति के विषय में बदल गया। उन पर कविताएँ लिखी गईं, चित्र बनाए गए, फ़िल्में बनीं, गीत रचे गए। वह कहीं क्रांति के प्रतीक बने, कहीं प्रतिरोध के, तो कहीं एक रोमानी स्वप्नद्रष्टा के रूप में याद किए गए। एक वास्तविक मनुष्य धीरे-धीरे ओझल होता गया और उसके स्थान पर उसकी प्रतिमा, उसकी मिथकीय छवि सामने आ खड़ी हुई।

समस्या भी यहीं से शुरू होती है। 

कोई प्रतीक जैसे-जैसे लोकप्रिय होता है, उसका अर्थ उतना ही अनिश्चित होता जाता है। कोई उसमें क्रांति देखता है, कोई रोमानी विद्रोह, कोई युवाओं की बेचैनी, तो कोई सिर्फ़ फ़ैशन। परिणामस्वरूप चे ग्वेरा एक ऐसे चिह्न में बदल गए, जिसका कोई एक निश्चित अर्थ नहीं रहा। हर व्यक्ति उन्हें अपनी सुविधा और अपनी कल्पना के अनुसार इस्तेमाल करने लगा।

यहीं फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल के विचारक थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्खाइमर की बात याद आती है। उन्होंने कहा था कि आधुनिक पूँजीवाद केवल वस्तुएँ ही नहीं बनाता, वह संस्कृति भी बनाता है। ऐसी संस्कृति जो मनुष्य की इच्छाओं, कल्पनाओं और विचारों तक को बाज़ार के नियमों के अधीन कर देती है। इस व्यवस्था में कोई भी चीज़ सुरक्षित नहीं रहती—न कला, न विचार, न विद्रोह, न प्रतिरोध। सब कुछ अंततः बाज़ार की वस्तु में बदल सकता है।

चे ग्वेरा की कहानी शायद इस सिद्धांत का सबसे नाटकीय उदाहरण है। जो चेहरा कभी साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष का प्रतीक था, वही आज कॉफ़ी-मगों पर छपता है। जिस व्यक्ति ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आलोचना की थी, उसकी तस्वीर को वही बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ करोड़ों बार पुनरुत्पादित करती हैं। जिसने बाज़ार व्यवस्था को चुनौती दी थी, बाज़ार ने उसी को अपनी सबसे मूल्यवान संपत्तियों में बदल दिया। पूँजीवाद की यह शक्ति लगभग पौराणिक प्रतीत होती है। वह अपने विरोधियों को भी निगल सकता है। वह प्रतिरोध को भी बेच सकता है। वह विद्रोह को भी ब्रांड में बदल सकता है। इसी संदर्भ में हाना चार्लटन लिखती हैं, “संभवतः मोनालिसा की तस्वीर से भी अधिक, ईसा मसीह की छवि से भी अधिक, बीटल्स या मर्लिन मुनरो से कहीं अधिक, चे ग्वेरा की तस्वीर ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानव कल्पना को अपने प्रभाव में बाँधे रखा है।”

फिर भी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

उपभोक्ताओं और दर्शकों ने धीरे-धीरे चे की वास्तविक क्रांतिकारी चेतना को उनकी तस्वीर में घोलकर पतला कर दिया। पॉप-आर्ट की निर्वैयक्तिकता, सामान्यीकरण और सरलीकरण ने चे के चेहरे को सबके लिए सहज और उपभोग्य बना दिया। पॉप-संस्कृति के सिद्धांत ने चे को उनके ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भों से अलग करके एक ऐसे प्रतीक में बदल दिया, जो प्रश्न नहीं उठाता, आत्मचिंतन नहीं कराता, किसी प्रकार की बेचैनी पैदा नहीं करता। उनकी छवि के निरंतर पुनरुत्पादन ने उन्हें एक निष्क्रिय, निरापद और निर्दोष वस्तु में परिवर्तित कर दिया।

लेकिन ऐसा क्यों हुआ? ऐसा क्यों होता है? 

फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल के थियोडोर अडोर्नो (1903–1969) और मैक्स होर्खाइमर (1895–1973) ने 1944 में अपनी पुस्तक Dialectic of Enlightenment में पहली बार ‘संस्कृति उद्योग’ (Culture Industry) शब्द का प्रयोग किया था। इस पुस्तक के The Culture Industry: Enlightenment as Mass Deception अध्याय में कहा गया है कि लोकप्रिय संस्कृति (Pop Culture) फ़िल्म, रेडियो और पत्रिकाओं जैसे माध्यमों द्वारा निर्मित एक कारख़ाना-उत्पाद है, जिसका उपयोग जनसमाज को निष्क्रिय बनाने और उसे आसान मनोरंजन तथा उपभोग की संस्कृति में बाँधने के लिए किया जाता है। जनसंचार माध्यम लोगों के भीतर ऐसी कृत्रिम मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएँ पैदा करते हैं, जिन्हें केवल पूँजीवाद द्वारा निर्मित उत्पादों के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है, चाहे उनकी आर्थिक परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। (“Pop culture is a factory product of film, radio, magazine—that are used to manipulate mass society into passivity, consumption of easy pleasure of pop culture made available by the mass com media make people control to cultivation of false psychological need that can only be made and satisfied by the product of capitalism. No matter how difficult their economic circumstances.”)

अडोर्नो और होर्खाइमर ने यह दिखाया था कि ‘गुएर्रिलेरो एरोइको’ के विश्वव्यापी प्रतीक बनने से भी पहले, बड़े पैमाने पर उत्पादित संस्कृति तकनीकी और बौद्धिक दोनों स्तरों पर तथाकथित ‘हाई आर्ट’ की तुलना में कितनी अधिक प्रभावशाली और साथ ही कितनी अधिक हानिकारक हो सकती है।

इसके परिणामस्वरूप चे का चेहरा एक प्रकार के ‘राशोमोन प्रभाव’ की तरह काम करता रहा जिसने भी उसे देखा उसने उसमें अपना-अपना अर्थ खोज लिया। हर व्यक्ति के मन में उस छवि ने अलग-अलग प्रतिक्रिया उत्पन्न की। इस प्रकार एक समर्पित क्रांतिकारी अंततः पूँजीवाद की एक वस्तु में बदल गया, क्योंकि “capitalism devours everything ... even its worst enemies.”

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