नायक और नायिका के राग (प्रेम) को बढ़ाने वाला, कोई और दूसरा सशक्त साधन नहीं है—जितना नखक्षत और दंतक्षत से उत्पन्न कामोत्तेजना।
नायिका के दंतक्षत के स्थान को दोनों दाँतों से काटने से जो चिन्ह बनता है, उसे 'बिंदु' नामक दंतक्षत कहते हैं।
जब इस प्रकार से दंतक्षत किया जाए कि अधरों पर केवल हल्की लाली दिखाई दे और इसमें दाँत का घाव छिपा रहे, उसे 'गूढक' दंतक्षत कहते हैं।
यदि सभी दाँतों से काटा जाता है, तो बिंदुओं की एक माला-सी बन जाती है। इस प्रकार का नखक्षत 'बिंदुमाला' कहलाता है।
जब अधर को दाँतों से कसकर दबाया जाता है; जिससे अधर पर कुछ सूजन आ जाती है, तो उसे 'उच्छूनक' दंतक्षत कहते हैं।
गूढक, उच्छूनक, बिंदु, बिंदुपाल, प्रवालमणि, मणिमाला, खंडाभ्रक और वराह चर्वितक—ये आठ प्रकार के दंतक्षत होते हैं।