मुकुंद लाठ के उद्धरण
संगीत का विशेष, पनपता-बढ़ता इसलिए है कि स्वर और स्वर के संबंध—जिनसे संगीत बनता है—उनकी उधेड़बुन, हर परंपरा की अपनी होती है।
सच पूछिए तो करुण को एक-रस कहने के पीछे एक जगत्-दृष्टि या संवेदना है—जिसे ट्रैजिक या दुःखमयी संवेदना कह सकते हैं।
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कला, मात्र का कला के रूप में बोध भाव की एक ऐसी द्रष्टा की सी दृष्टि या तटस्थ-से भाव को समोए रहता है, जिसके बिना बोध को कला या शिल्प का बोध कहने में ही असमंजस होगा।
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संस्कार की धरती के बिना मनुष्य; मनुष्य ही नहीं हो सकता—प्राणी भर रह जाता है।
मनुष्य का लक्षण ही अगर धर्मशील होना है—जैसा कि हमारे यहाँ चिंतन में गहराई से उभर कर आता है—तो मनुष्य धर्म-निरपेक्ष हो ही नहीं सकता, हाँ, वह धर्म के अनैक्य की; भिन्न क्षेत्रों की बात कर सकता है, जैसी कि की गई है। ‘सेक्यूलर’ शब्द कर्म के किसी ऐसे क्षेत्र की ओर संकेत नहीं करता, जो उस कोटि से बाहर हो, जिसे मनुष्य के लक्षण के रूप में ‘धर्म’ कहा गया है।
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युद्ध के बीच कही गई गीता भी, युद्ध में उपस्थित धर्मसंकट का ही समाधान बताती है। यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ भी युद्ध का ‘समर्थन’ है। पर सच पूछें तो गीता धर्म-संकट का उतर, कर्म की धारणा को कर्म के साधारण व्यवहार-निष्ठ धरातल से हटा कर ही देती है—उससे ऊपर आरोहण कर जाती है।
धर्म की उलटबाँसियों, विडंबनाओं के भीतर भी धर्मप्रज्ञा जागरूक रहती है, और कृष्ण ने ठीक ही कहा है कि धर्मप्रज्ञा को किसी स्थिर तत्त्व या विधान से बाँधा नहीं जा सकता।
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समाज के कर्म का औचित्य—लोकयात्रा का, लोक-व्यवहार का औचित्य—यह भी धर्म का ही प्रश्न है।
अव्यक्त सत्य ‘श्रद्धा’ के रूप में रहता है। श्रद्धा उस सत्य को रखती है, जो सत्य ‘होना चाहिए’।
रूपक अगर अच्छा न हो; उसमें प्रतिभा न हो, संगति न हो, तो रस की निष्पत्ति नहीं कर सकता। यह बात हमारी इच्छा की, हमारे चाहने न चाहने की नहीं हैं—कल्पना के लिए स्वतंत्र रूप से समर्थ होने की बात है।
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धर्म, कर्म का स्वतंत्र पुरुषार्थ है तो नीति से भिन्न है—नीति उपाय-कौशल है, और कोई भी वस्तु, चाहे जड़ हो या चेतन, चाहे मनुष्य ही क्यों न हो, सभी उसके लिए उपाय बन सकते हैं। धर्म में पर को उपेय समझना चाहिए, उपाय नहीं।
संस्कार मनुष्य को समाज में रह कर ही मिलता है। संस्कार क्या दिए जाएँ—यह समष्टि के धर्म का प्रश्न है।
मनुष्य के जीवन में ‘काम’ के साथ ‘काम्य’ का विचार सहज हैं : हर काम को हमारा विमर्श-बोध ‘यह काम्य है या नहीं’ इस परख की कसौटी पर देखने की चाह रखता है। ‘काम्य’ में ‘श्रेयस्’ का बोध उभरता है।
जिसके संस्कार एक परंपरा में दीक्षित हों; उसके लिए दूसरी परंपरा में रसबोध के सामान्य तक पहुँचना—सहृदय-भाव की एक साधना बन जा सकती है।
स्वेच्छापूर्ति साधना ही जिसका स्वभाव है; ऐसा मनुष्य व्यवस्था की ओर झुके भी तो केवल इसलिए झुक सकता है, क्योंकि उसकी इच्छा अन्य को भी अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाना चाहती है—ऐसे में दंड का ही साम्राज्य हो सकता है, व्यवस्था उभरे भी तो दास-व्यवस्था ही उभरेगी, कोई परस्पर-भाव-जन्य ‘समझौता’ कैसे बनेगा?
व्यष्टियों और समष्टियों का अन्य व्यष्टियों और समष्टियों के प्रति जो व्यवहार होता है, कर्म होता है, धर्म उसी की इतिकर्त्तव्यता के औचित्य का विधान करता है।
कृष्ण के लिए अर्जुन का धर्म-संकट, सचमुच का धर्म-संकट नहीं—मन की झूठी गाँठ है, तुच्छ है।
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जिस वासना की धरती पर कथा-लोक की जड़ है, वह धर्म की भी धरा है। कथा में भाव ही नहीं, कर्म भी होता है। बिना इतिवृत्त, चरित, या दूसरे में बिना कर्म के कथा नहीं हो सकती।
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परंपरा समूह की होती है, उसका मर्म हमें किसी एक व्यक्ति में नहीं; किसी समूह-विशेष में ही मिल सकता है—किसी एक का आचरण परंपरा का प्रमाण नहीं होता।
कोई भी कृति, शिल्प या कला के रूप में हमारे लिए उपस्थित होने के लिए ही, हमारे बोध में एक ऐसी वृत्ति की अपेक्षा रखती है, जिसमें शांत और अद्भूत के लक्षण देखे जा सकते है।
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आपदा में ‘आपद्धर्म’ की आवश्यकता होती है, जिसकी गति स्वाभाविक समय के धर्म से भिन्न होती है, जबकि साधारण जीवन अविकृत गति से बह रह होता है।
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मनुष्य के जगत् को जब धर्म, अर्थ, काम इनकी बुनावट कहा जाता है; तब तात्पर्य यही होता है कि धर्म वह तत्त्व है, जो ‘अर्थ-राज्य, समाज और इनके कार्य-कलापों में और काम में, हमारी इच्छा-अभिलाषाओं के स्वच्छंद प्रवाह में—इन दोनों में एक औचित्य का सामंजस्य बनाए रखता है।
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संकल्प शुद्ध हो, राग, द्वेष, मोह, स्वार्थ से ऊपर उठा हुआ हो, तो कर्म सम्यक् ही होगा।
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कल्पना के लिए इच्छा साधक है, वह ‘सत्य’ या धर्म जैसा कुछ नहीं ढूँढ़ती जहाँ इच्छा बाधक होती है।
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जैसे तर्क के बेसहारा; अप्रतिष्ठ मार्ग से ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता, वैसे ही धर्म को भी नहीं जाना जा सकता।
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रस-बोध के स्वीकार में प्रवृत्ति की सार्थकता का, सत् का भी स्वीकार है, और प्रवृत्ति के स्वीकार में व्यवहार-लोक के सत् की स्वीकृति निहित है।
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आपत्-काल की इति-कर्त्तव्यता; उस समय से उलटा रूप लेती है, जब सब कुछ व्यवस्थित ठीक-ठाक चल रहा हो, जिसे हम साधारण अवस्था में अधर्म समझते हैं, वह भी आपत्ति में धर्म की तुला पर खरा उतरता है।
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वेदांत निवृत्ति का मार्ग है, कर्म से हट जाने का मार्ग, जब कि प्रश्न प्रवृत्ति का है—प्रवृत्ति के औचित्य का।
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श्रद्धा जिज्ञासा का वह भाव है, जो खरेपन के साथ सत्य की ओर उन्मुख रहता है; मिथ्या के बहलावे में मोह में नहीं आ जाता, उसी को सत्य कहना चाहता है जो प्रामाणिक रूप से ‘है’—निःसंदेह ‘है’।
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संस्कार मनुष्य को व्यवहार-योग्य मनुष्य बनाता है।
संस्कार तो एक तरह से धर्म की पहल है। संस्कार की धरती पर खड़ा होने के बाद ही, मनुष्य स्वतंत्र हो कर पूछता है कि वह क्या करे? फिर इति-कर्त्तव्यता के दूसरे क्षेत्र स्वतः आगे आ जाते हैं।
''तद् आहुः केन जुहोति कस्मिन् हूयत इति। प्राणेनैव जुहोति प्राणे हूयते''—पूछा जाता है कि आहुति किस से दी जाती है और किस में दी जाती है? आहुति प्राण की दी जाती है, और प्राण में ही दी जाती है।”
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आचरण में लोभ और दंभ का अभाव और आत्मवान होने का भाव, सचमुच न हो तो आचरण ही झूठा कहलाएगा।
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वासना विवेक का आधार बन सकती है; पर वह आधार अपने स्वरूप में ही व्यंजना को पालता है, अपने संकेत को ध्वनित करता है, बुद्धि की तरह परिनिष्ठित कोटियाँ नहीं बनाता, न उस तरह से कसा जा सकता है।
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प्रवृत्ति अगर असत् है, तो प्रज्ञा जो सत् है—निर्वाण के सन्मार्ग पर ले जाती है, वह भी असत् ठहरेगी—वह प्रवृत्ति में रहती हुई प्रवृत्तिमय होती है।
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सत्य-वचन कहना और वचन का सत्य रखना—इनमें स्पष्ट ही भेद है। पहले का संबंध किसी सामने खड़े, प्रदत्त ‘सिद्ध’ सत्य से है, जो हमारे कहने में अनृकृत, अनूदित-सा होता है। हमारा कहना सत्य तब होता है, जब उस सत्य की ओर हम सही संकेत कर दें जो ‘है’। उसका उसी रूप में ‘कथन’ कर दें, जैसा वह है।
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कर्म करते हुए कर्म का औचित्य, हम स्वागत, व्यक्तिगत स्वातंत्र्य और विवेक से ही समझ सकते हैं।
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मनुष्य का व्यावर्तक स्वरूप-स्वभाव ही धर्म को कहा गया है। धर्म मनुष्य को मनुष्य बनाता है, ‘परिभाषित’ करता है।
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रस का सामान्य रस-भेद के परे नहीं है, बल्कि ऐसा है कि हर रस विशेष में ‘रूपं रूप प्रतिरूपो बभूव’ की तरह परम रस की पहचान हो सकती है—ऐसी कि हर रस अपनी अलग पहचान रखते हुए भी, रस के परमार्थ को अपने में पूरी तरह सहेज लेता है। वैसे ही जैसे हर देवता भिन्न होते हुए भी देवत्व में पूर्णमिदम् होता है।
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वचन-पालन का संबंध, सत्य की ‘कर्त्तव्यता’ से है। ऐसा सत्य जिसे हमारा कर्म सत्य करता है, जो पहले से सत्य नहीं होता।
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कर्म-प्रवाह का संबंध अगर मनुष्य से है, तो मनुष्य के होने में इसका आदि है और मनुष्य के अंत के साथ इसका आदि है, और मनुष्य के अंत के साथ इसका अंत होगा।
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धर्म का संबंध व्यष्टि से ही नहीं; एक ऐसे व्यवस्था-बोध से भी है जो समष्टि में स्थापित है, समष्टि के परस्पर-धारण का वह व्यापक है—जो व्यष्टि के धर्म का भी धारण करता है।
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धर्म का द्वार स्वातंत्र्य का द्वार है। हमारा स्वभाव-धर्म हमें स्वतंत्र करता है और हम स्वतंत्र होकर उस धर्म की साधना करते हैं, जो कर्म का औचित्य है।
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