अरिजीत सिंह : पार्श्वगायन का बाणभट्ट
बकुल देव
01 फरवरी 2026
यह तुलना आपको विचित्र लग सकती है, लेकिन मेरे देखे वैश्विक स्तर पर भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय गायक अरिजीत को और किसी तरह परिभाषित किया जाना संभव नहीं है।
वाणी बाणो बभूव ह!
यह संस्कृत की एक प्रसिद्ध उक्ति है, जिसका अर्थ यह है कि जब देवी सरस्वती को पुरुष रूप धरने का मन हुआ तो वह बाणभट्ट बन गईं।
इस उक्ति का दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि वाणी/आवाज़/भाषा एक बाण बन गई। वह बाण जो हृदय को बेध दे। इस उक्ति के पहले अर्थ में बाणभट्ट दिखाई देते हैं और दूसरे अर्थ में अरिजीत। 7वीं सदी के कवि-गद्यकार बाणभट्ट असाधारण और अभूतपूर्व लेखक थे। अपने पूर्ववर्तियों से बिल्कुल अलग। कुल 65 बरस जीवित रहे। केवल दो पुस्तकें लिखीं—‘हर्षचरित’ और ‘कादम्बरी’। कई ऑनलाइन वेबसाइट्स यह लिखती हैं कि ‘कादम्बरी’ विश्व का पहला उपन्यास है/माना जाना चाहिए।
बाणभट्ट ने इन दोनों को अधूरा छोड़ दिया। ये दोनों ग्रंथ अपूर्ण या अधूरे ग्रंथ हैं, लेकिन इन अधूरे ग्रंथों के रचयिता बाणभट्ट के पूर्ण कवि होने पर कभी संदेह नहीं किया गया। अधूरे ग्रंथों के रचयिता बाणभट्ट के बारे में यह सुभाषित भी प्रचलित है कि बाण ने सब कुछ कह दिया है और उनके कहे हुए के बाद कहने को और कुछ शेष नहीं बचा है!
ख़ैर…
ख़बर मिली कि 38 बरस के अरिजीत सिंह ने पार्श्वगायन को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। विगत पंद्रह वर्षों (ख़ासकर पिछले दस साल) में बतौर पार्श्वगायक और परफ़ार्मर जो अकल्पनीय और स्वप्न सरीकी ख्याति अरिजीत को मिली है, उसकी दूसरी कोई मिसाल उपलब्ध नहीं है। वह इस समय भारत के सबसे महँगे पार्श्वगायक और लाइव परफ़ार्मर हैं।
केवल 15 बरस की अपनी यात्रा में वह 8 फ़िल्मफेयर पुरस्कार (किशोर कुमार के साथ सर्वाधिक बार) और 2 राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। पिछले बरस उन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा गया। लगातार सात वर्षों तक (2019 से 2025) वह स्पॉटिफ़ाई पर Most streamed Indian artist बने रहे। इस बादशाहत को भी आने वाले कुछ बरसों तक भी कोई ख़तरा दिखाई नहीं देता। 2025 में स्पॉटिफाई ने अरिजीत को Globally most followed artist घोषित किया। 170 मिलियन फ़ॉलोअर्स के साथ। इसी सूची में रहमान 73 मिलियन फ़ॉलोअर्स के साथ 14वें स्थान पर हैं और कोई अन्य भारतीय गायक पहले 25 में शामिल नहीं है।
केवल पंद्रह बरस की यात्रा में इतना कुछ हासिल कर लेना असंभव-सा ही प्रतीत होता है और इस शिखर पर, इस ऊंचाई पर पहुँचने और लगातार बने रहने के बाद अचानक यात्रा को अधूरा छोड़ देना विस्मयकारी है। इस यात्रा (जिसमें अभी उनके आस-पास और कोई गायक नहीं है) से बाहर हो जाने की घोषणा ने उनके श्रोताओं और और संगीतप्रेमियों को चौंका दिया है।
एक नज़र उनकी यात्रा पर डालें तो कुछ बातें ख़ासतौर पर सामने आती हैं—
2005 की बात है। जब 18 बरस का एक प्रतिभाशाली युवा गायक ‘फ़ेम गुरुकुल’ नाम के एक रियलिटी शो से बाहर हो गया और सफ़र अधूरा रह गया। इसके बाद संजय लीला भंसाली ने उन्हें पहले गाने का मौक़ा दिया, लेकिन उसे फ़िल्म में इस्तेमाल नहीं किया गया। बात यहाँ भी पूर्णता पर नहीं पहुँची। ऐसा कहा जाता है कि टिप्स म्यूज़िक लेबल ने उनसे पहले एलबम का क़रार किया और नियति देखिए कि यह भी कभी पूरा नहीं हुआ। कई संगीतकारों के साथ सहायक के तौर पर काम किया और फिर उसे भी बीच में ही छोड़ दिया। अपनी पार्श्वगायन की यात्रा को जिस तरह अरिजीत ने अधूरा छोड़ दिया है। देखा जाए तो यही अधूरापन अरिजीत की संगीत यात्रा का प्रस्थानबिंदु भी था।
अरिजीत की आवाज़ में आख़िर ऐसा क्या था जिससे पिछले दस बरस में अन्य सभी समकालीन आवाज़ें हाशिये पर आ गईं?
रेशमा की हूक में किशोर कुमार की आवाज़ का थोड़ा-सा नैसर्गिक खुरदरापन। तलत महमूद की आवाज़ का मख़मल और हेमंत कुमार की सरगोशी मिला देने के बाद जो आवाज़ बरामद होती है—उसे अरिजीत की आवाज़ कहा जा सकता है।
भारतीय फ़िल्म संगीत में ऐसी आवाज़ पहले नहीं सुनी गई थी। गायन की आवर्तसारणी में यह तत्त्व इससे पहले मौजूद ही नहीं था।
2011 में ‘मर्डर 2’ फ़िल्म के एक गाने “दिल संभल जा ज़रा, फिर मोहब्बत करने चला है तू...” में पहली बार अरिजीत की गायकी का यह तत्त्व दुनिया को दिखाई दिया। सईद क़ादरी के लिखे इस ख़ूबसूरत गाने को सुरों में ढाला था संगीतकार मिथुन ने। यह गीत उस लहजे की पहली, मद्धम-सी झलक थी जो अगले डेढ़ दशक में भारतीय फ़िल्म संगीत का सबसे मक़बूल लहज़ा बन जाने वाला था। ‘एजेंट विनोद’ फ़िल्म के गीत “राब्ता” के साथ अरिजीत की जोड़ी बनी प्रीतम के साथ और आने वाले बरसों में प्रीतम के लिए अरिजीत वही हो गए थे जो पंचम दा के लिए किशोर कुमार थे।
2013 में रिलीज़ हुई ‘आशिक़ी 2’ के गीत “तुम ही हो..” के बाद अरिजीत—‘अरिजीत’ बन गए। बेपनाह मुहब्बत और शुहरत के साथ-साथ पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला। इसके बाद “ख़ैरियत”, “चन्ना मेरेया”, “मैं तैनूं समझावां की”, “अगर तुम साथ हो”, “हवाएँ”, “नैना”, “ऐ दिल है मुश्किल”, “केसरिया” और ऐसे दर्जनों गीत नेशनल एंथम की तरह सारे देश में लगातार बजते रहे हैं और आज भी बज रहे हैं। ऐसा लगता है कि पिछले दस-पंद्रह बरसों से कोई कंसर्ट चल रहा है, जिसमें बस अरिजीत गा रहे हैं और हम उन्हें सुन रहे हैं।
अरिजीत कभी किसी नायक विशेष के लिए भी गाते प्रतीत नहीं होते। वह बस गाते हैं और इसीलिए उनके गाए गानों में नायक का अभिनय तक़रीबन अप्रासंगिक है। अरिजीत की आवाज़ गीत के फ़िल्मांकन पर भारी पड़ती है। नायक-नायिका दृश्य/कैमरा एंगल सब पीछे छूट जाता है। केवल आवाज़ आपके साथ-साथ चलती रहती है और बहुत बार तो याद ही नहीं आता का यह गीत किस फ़िल्म का है और किस पर फ़िल्माया गया है।
समर्पण का एक दुर्लभ भाव भी उनकी गायकी का अटूट हिस्सा है। उर्दू में एक मुहावरा है—“तीर तराज़ू होना”। जिसके मानी हैं कि तीर अपने निशाने के आर-पार इस तरक़ीब से हो कि तीर का आधा हिस्सा एक तरफ़ और आधा हिस्सा दूसरी तरफ़ रह जाए।
अरिजीत की आवाज़ की तासीर भी कुछ ऐसी ही है। कोई भी तीर निशाने को बेध कर पार नहीं होता। तराज़ू हो जाता है! और फिर ख़लिश है कि मिटने का नाम ही नहीं लेती।
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
—मिर्ज़ा ग़ालिब
पंद्रह बरसों से करोड़ों श्रोताओं को अपनी आवाज़ के जादू में बाँधे रखने वाले और अधूरेपन में बाणभट्ट की तरह पूर्णता का आनंद लेने वाले अपनी तरह के इकलौते और अनोखे गायक अरिजीत को अपने भावी जीवन के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ।
अंत में महाकवि बाणभट्ट की प्रशंसा में कहा गया त्रिलोचन का यह श्लोक प्रिय गायक अरिजीत के लिए—
हृदि लग्नेन बाणेन यन्मन्दोऽपि पदक्रमः।
भवेत् कविकुरंगाणां चापलं तत्कारणम्।।
अर्थात् : बाण की कविता का आस्वाद जिन्हें लग गया है, उनके लिए अन्य कवियों का काव्य चपलता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
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बेला पॉपुलर
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