जब इतिहास ने साहित्य के दरवाज़े से अपनी आत्मा खोजी
मनदीप पुनिया
31 जनवरी 2026
हम बात नहीं करते 1947 की, क्योंकि उस साल की बातें करना आसान नहीं। उन रातों की बात करना, जब ट्रेनें लाश-गाड़ियाँ बन गई थीं। उन औरतों की, जिनके शरीर युद्ध के मैदान बने। उन बच्चों की जिन्होंने घर जलते देखे, पिता मरते देखे, और फिर सीखा कि नफ़रत कैसे फैलती है, पर फिर भी इंसानियत कैसे ज़िंदा रहती है।
1947, एक तारीख़ नहीं, एक विस्फोट था। एक ऐसी दरार जो सिर्फ़ ज़मीन को नहीं, इंसान की रूह को चीरकर गुज़री। लेकिन आज, इस ख़ून से लिखे इतिहास को एक बार फिर हथियार बनाया जा रहा है। व्हाट्सएप के अँधेरे में गढ़ी जा रही झूठी कहानियाँ, ‘असली इतिहास’ के नाम पर परोसा जा रहा ज़हर, सेकुलरिज़्म को ‘मिथक’ बताने वाली आवाज़ें क्या ये सब पुराने ज़ख़्मों को कुरेदकर नई हिंसा को जन्म देने के लिए नहीं किया जा रहा?
तो फिर हम क्या करें इन यादों का? भुला दें? या फिर इन्हें भी हथियार बना लें?
साहित्य कहता है कि आप न भूलो, न हथियार बनाओ। आप समझो। साहित्य सिर्फ़ समझाता नहीं। सवाल भी पूछता है।
चंडीगढ़ के आर्ट कॉलेज के ऑडिटोरियम में गई 17 जनवरी को एल्सव्हेयर फ़ाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘मैं तुम हूँ, तुम मैं हो’ नामक एक कहानी-पाठ ने ठीक यही करने की कोशिश की। पंजाब के चार बड़े हिंदी लेखकों की पाँच कहानियों के ज़रिये, इस प्रस्तुति ने उन सवालों को छुआ जिनसे हम बचते रहे हैं :
क्या हिंसा कभी साहस की निशानी हो सकती है, या वह हमेशा कायरता का सबूत है?
जब हम भीड़ का हिस्सा बनकर हिंसा करते हैं, तो क्या हमारी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है?
बदला लेना और न्याय करना, इन दोनों के बीच की रेखा कहाँ खींची जाए?
जब दुनिया पागल हो जाए, तो क्या तुम भी पागल हो जाओगे?
ये सवाल सिर्फ़ 1947 के नहीं हैं। ये सवाल 1984 के हैं, 2002 के हैं, 2020 के हैं, और आज के भी।
चंडीगढ़ का आर्ट कॉलेज ऑडिटोरियम। शाम का धुँधलका। कुर्सियाँ भरी हुईं। हवा में एक अजीब तनाव। वैसा ही जैसा किसी पुराने ज़ख़्म को छूने से पहले होता है। ‘मैं तुम हूँ, तुम मैं हो’ कहानियों का पाठ शुरू होने वाला था और जो लोग आए थे, वे नहीं जानते थे कि अगले घंटे में उन्हें कहाँ ले जाया जाएगा। किस अँधेरे में। किस रोशनी में। लेकिन यह तय था कि वे जहाँ भी जाएँगे, वहाँ से वैसे नहीं लौटेंगे जैसे गए थे।
पंजाब में विभाजन की आग सबसे भयावह रूप से भड़की थी। उसी सरज़मीं के चार प्रमुख लेखकों की पाँच कहानियों के माध्यम से यह प्रस्तुति उन भावनाओं को जीवित करती है, जो उस दौर में लोगों ने महसूस कीं। भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया है’, मोहन राकेश की ‘मलबे का मालिक’, कृष्णा सोबती की ‘सिक्का बदल गया है’, और अज्ञेय की दो मार्मिक कहानियाँ, ‘शरणदाता’ और ‘बदला’ इस प्रस्तुति का हिस्सा हैं। इस प्रस्तुति की स्क्रिप्ट पूर्वा भारद्वाज ने तैयार की थी, और प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद, अल्का रंजन, पूर्वा और रज़ा हैदर ने इसे जीवंत किया।
प्रस्तुति की शुरुआत भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया है’ से हुई। पहली कहानी ने हॉल में सन्नाटा बिछा दिया। बाबू। दुबला-पतला। कमज़ोर। ट्रेन में पठानों से रात भर काँपता रहा। चुपचाप बैठा रहा, लेकिन अमृतसर पहुँचते ही वह अचानक “बहादुर” हो गया। वही डरपोक बाबू अब मुसलमानों को डिब्बे में चढ़ने से रोक रहा है। गालियाँ बक रहा है। डर साहस में नहीं, बल्कि उसी हिंसा में बदलता है, जिससे वह भाग रहा था।
हॉल में लोग अपनी कुर्सियों पर हिले। किसी ने अनजाने में अपने बग़ल वाले को देखा। क्योंकि यह बाबू कोई अजनबी नहीं था। यह बाबू हम सबके भीतर है। व्हाट्सएप-ग्रुप्स में। टीवी-डिबेट्स में। सड़कों पर।
दूसरी कहानी ने सवाल किया। क्या हिंसा सिर्फ़ नफ़रत से जन्म लेती है? रक्खा पहलवान। गली का बादशाह। उसने अपने दोस्त चिराग़दीन को बुलाया और छुरा मार दिया, ताकि वह उसका नया मकान क़ब्ज़ा सके। उसकी पत्नी और बेटियों को भी ‘पाकिस्तान’ भेज दिया। तीनों की लाशें नहर में मिलीं। लेकिन रक्खे से पहले ही वह घर किसी ने जला दिया और वह उस मलबे का मालिक बनकर रह गया। कई साल बाद जब चिराग़दीन के पिता वापस अपना घर देखने आए तो रक्खे के साथ हुए उनके वार्तालाप ने रक्खे को हिलाकर रख दिया। अब रक्खा बिना सज़ा भोगे भी ज़िंदा लाश बनकर रह गया था। हॉल में किसी की आँख भीगी, किसी ने गला साफ़ किया क्योंकि राकेश ने दिखा दिया था—अपराध की सबसे भयानक सज़ा यह नहीं कि हमें सज़ा मिले। सबसे भयानक सज़ा यह है कि हमें अपने अपराध के साथ जीना पड़े। रोज़। हर पल।
इस प्रस्तुति की तीसरी कहानी, कृष्णा सोबती ने लिखी थी, ‘सिक्का बदल गया है’। इस कहानी में शेरा सोचता है कि वह शानी को मार दे। क्योंकि ‘राज बदल गया है...” लेकिन मार नहीं पाता। हॉल में सन्नाटा था। गहरा और भारी भी। इस कहानी ने दिखा दिया कि नफरत की राजनीति रिश्तों को तोड़ सकती है। लेकिन स्मृतियाँ? स्मृतियाँ नहीं मरतीं। वे हमें भीतर से खाती रहती हैं।
चौथी कहानी अज्ञेय की ‘शरणदाता’ थी, जिसनें एक ही परिवार में दो इंसान, एक क़ातिल बनता है, दूसरा मुक्तिदाता। शरणदाता में जो औरत एक हिंदू को बचाती है, उसकी बस एक गुज़ारिश है : “याद रखना कि तुम्हारे देश में भी अल्पसंख्यक होंगे। उनके साथ भी यही होगा। उन्हें बचाना। इसलिए नहीं कि वे मुसलमान हैं, बल्कि इसलिए कि तुम इंसान हो।”
इस प्रस्तुति का अंत अज्ञेय की ‘बदला’ से हुआ। एक सरदार, जो ख़ुद शरणार्थी है, फिर भी एक मुस्लिम औरत को ताने सुनने वाले यात्री से बचाता है। बुर्क़े के पीछे छुपी वह औरत उससे डरती है पहले, लेकिन अंत में यही सरदार उसे सुरक्षित अलीगढ़ पहुँचाता है। मुस्लिम औरत पर हमला करने के लिए उकसा रहे एक व्यक्ति को वह कहता है, “औरत की बेइज़्ज़ती औरत की बेइज़्ज़ती है। वह हिंदू या मुसलमान की नहीं, इंसान की माँ की बेइज़्ज़ती है। शेख़ूपुरे में हमारे साथ जो हुआ सो हुआ। लेकिन मैं जानता हूँ कि उसका मैं बदला कभी नहीं ले सकता, क्योंकि उसका बदला हो ही नहीं सकता!” और फिर इसके बाद वह वाक्य जो इस पूरी शाम का सार था : “मैं बदला दे सकता हूँ। और वह यही कि मेरे साथ जो हुआ वह और किसी के साथ न हो। इसीलिए दिल्ली और अलीगढ़ के बीच इधर और उधर लोगों को पहुँचाता हूँ मैं।”
कहानियों के पाठ के बाद युसरा नक़वी ने अमृता प्रीतम की नज़्म ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नूं, कितों कबरां विच्चों बोल’ बेहद सुरीली आवाज़ में गाई। अमृता प्रीतम की यह नज़्म बँटवारे पर ऐसा दर्द ब्यान करती है, मानो वह विभाजित होने के ख़िलाफ़ आंदोलित हों।
हॉल में लोग अपनी जगहों पर खड़े हो गए थे। आँखों में आँसूओं के मोती लिए भारी मन से तालियाँ बजा रहे थे। उनके मन में यह सवाल भी था कि तालियाँ बजाई जाएँ या नहीं।
यह प्रस्तुति इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि आज, 2026 में, हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं। लगातार ‘असली इतिहास’ के नाम पर झूठ फैलाया जा रहा है। नफ़रत को ‘गौरव’ का नाम दिया जा रहा है और हिंसा को ‘न्याय’ कहा जा रहा है।
चेमेगोइयाँ समूह से जुड़े पूर्वा भारद्वाज, अपूर्वानंद, अल्का रंजन और रज़ा हैदर ने इस शाम जो किया, वह सिर्फ़ कहानियाँ सुनाना नहीं था। यह इतिहास को इंसानियत की भाषा में पढ़ना था। यह याद दिलाना था कि हम सब हिंसक हो सकते हैं। हम सब मानवीय भी हो सकते हैं। चुनाव हमेशा हमारे हाथ में रहता है। बशर्ते हम चुनना चाहें।
अंत में या शायद शुरुआत में, प्रस्तुति का नाम था, ‘मैं तुम हूँ, तुम मैं हो’। और यही सबसे गहरी सच्चाई थी इस शाम की।
बाबू मैं हूँ। रक्खा तुम हो।
ज़ैबू तुम हो। सरदार मैं हूँ।
हम सब एक-दूसरे में हैं। हम सब एक-दूसरे के प्रतिबिंब हैं। सवाल यह है कि किस प्रतिबिंब को हम जीना चुनेंगे? साहित्य इंसान को इंसान की नज़र से देखना सिखाता है। वह बताता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी भयावह हों, करुणा का रास्ता हमेशा खुला रहता है।
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