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अश्वघोष

80 AD - 150 AD | अयोध्या, उत्तर प्रदेश

बौद्ध दार्शनिक, नाटककार, कवि, संगीतकार और उपदेशक। 'बुद्धचरित' और सौंदरानंद' जैसी कृतियों के लिए उल्लेखनीय।

बौद्ध दार्शनिक, नाटककार, कवि, संगीतकार और उपदेशक। 'बुद्धचरित' और सौंदरानंद' जैसी कृतियों के लिए उल्लेखनीय।

अश्वघोष के उद्धरण

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अतिथि कैसा भी हो, उसका आतिथ्य करना श्रेष्ठ धर्म है।

दुखों में अज्ञान-दुःख सबसे बड़ा दुःख है।

दुःख के प्रतिकार से थोड़ा दुःख रहने पर भी मनुष्य सुख की कल्पना कर लेता है।

इस प्रकार संसार में धन पाकर जो लोग उसे मित्रों और धर्म में लगाते हैं, उनके धन सारवान हैं, नष्ट होने पर अंत में वे धन ताप नहीं पैदा करते।

तृष्णावान् व्यक्ति का मन धन-संपत्ति में और मूर्ख का काम-सुख में रमता है। जो सज्जन है वह ज्ञान द्वारा भोग-इच्छा को जीतकर शांति में रमता है।

बुढ़ापा, रोग और मृत्यु इस संसार का महाभय है। ऐसा कोई देश नहीं है जहाँ लोगों को यह भय नहीं होता हो।

भय, प्रीति और शोक में मनुष्य निद्रा से पीड़ित नहीं होता है।

अपना विनाश जानता हुआ बुद्धिमान व्यक्ति संकटकाल में कैसे असावधान हो सकता है?

मन से अब्रह्मचारी रहते हुए तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य कैसा?

यह स्नेहमयपाश ज्ञान और रूखेपन के बिना नहीं तोड़ा जा सकता है।

जो घर से निकल गया है किंतु जिसका काम-राग नहीं निकला है, जो काषाय वस्त्र पहनता है किंतु जिसका कषाय नष्ट नहीं हुआ है, जो भिक्षा पात्र धारण करता है किंतु जो सद्गुणों का पात्र नहीं हुआ है, वह भिक्षु-वेष धारण करता हुआ भी गृहस्थ है, भिक्षु।

नियम में स्थिर रहकर मर जाना अच्छा है, कि नियम से फिसल कर जीवन धारण करना।

यह संसार सदा ही शत्रु- स्वरूप, क्षणिक, दुःखजनक विषयभोगों में आसक्त रहता है। यह अविनाशी सुख को पहचानता ही नहीं है।

शरीर धारण करने के लिए ही भोजन विहित है।

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बहुत बार भोजन करने से शरीर की पुष्टि, कांति, उत्साह, प्रयोग और बल में कमी आती है।

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ध्यान तथा आरोग्य के लिए भोजन की मात्रा जानो।

अतः अपनी शक्ति को देखते हुए भोजन करना चाहिए मान के वश होकर भी बहुत अधिक और बहुत कम ही खाना चाहिए।

हितकारी भोजन अप्रिय हो तो भी अच्छा है, कि स्वादिष्ट भोजन जो अहितकारी है।

यदि अधिक भोजन किया जाए तो वह प्राणवायु और अपान वायु में बाधक होता है, आलस्य और नींद लाता है तथा पराक्रम को नष्ट करता है।

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