साहित्य और संस्कृति की घड़ी
हम जब आज से लगभग एक दशक पूर्व कोरिया के बारे में सोचते थे, तो शायद अधिकांश लोगों के लिए उसका उत्तर अज्ञात ही रहता था। जिनकी समझ या रुचि थोड़ी अधिक विकसित थी, उनके मन में शायद किम जोंग उन का नाम आता रह
दो गिलहरियाँ इमारत के कोने पर आकर मिलती हैं। एक कहीं से मूँगफली ले आई है, दूसरी हाथ बढ़ाकर उसे ले लेना चाहती है। अचानक बम का धमाका होता है और इमारत ढह जाती है। सब मलबे के हवाले। इस इतनी बड़ी दुनिया म
घरेलू हिंसा पर केंद्रित फ़िल्मों की भीड़ में ‘सहन’ अपनी संयमित अभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध और गहन संवेदनात्मक परतों के कारण, एक विशिष्ट स्थान अर्जित करती है। यह फ़िल्म अपने कथ्य को किसी ऊँचे स्वर में नहीं क
बॉडी काउंट शब्द मैंने कहाँ जाना या सुना इस बात पर सोचता हूँ तो दोस्तों की याद आती है। व्यक्ति में गाली, शराब जैसे सामाजिक विकारों की मृत जड़ों को अक्सर दोस्तों द्वारा ही पानी दिया जाता है, शायद इसीलि
जीवन में पहली बार अकेले फ़िल्म देखने आई हूँ। अकेले घूमी हूँ, शॉपिंग पर गई हूँ, पर अकेले थिएटर में बैठकर फ़िल्म देखना कभी नहीं हुआ था। शायद इसलिए क्योंकि मुझे लगता था कि मैं दुनिया में इस क़दर अकेली क
इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों के लाखों दीवानों में एक दीवानी मैं भी हूँ। क्या वजह है इस दीवानगी की... इसका जवाब है कनेक्ट या जुड़ाव। आप उनकी फ़िल्मों के किरदारों से जुड़ पाते हो और फ़िल्म ख़त्म होते-होते प
15 जून 2026
साल 2001, जून का महीना। तारीख़ याद नहीं... गूगल बता सकता है, लेकिन क्या पूछना... मैं नया-ताज़ा पटना पहुँचा था, दूसरी बार—इस बार स्थायी रूप से रहने के लिए, क्योंकि मैं आयरन गेट तोड़ चुका था... जी
अब शादियों के एल्बम नहीं दिखते। आजकल नीले-नीले लिंक होते हैं जो सीधे हम-आपको तस्वीरों के समंदर में पटक देते हैं। लगाइए गोता। दो-तीन स्क्रॉल में अपनी तस्वीर तक पहुँच जाइए। बेहतर क्वालिटी में डाउनलोड क
दुख आदमी के जिस्म में दाख़िल होता है और फिर कभी नहीं निकलता। कोई मौलवी बताए, कोई हकीम समझाए, कोई फ़लसफ़ेबाज़ अपनी मोटी किताब खोलकर साबित करे—मगर दुख जाता नहीं। वो बदलता है। रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्
मैंने भी अंतत ‘Dhurandhar The Revenge’ देख ली। वैसे आजकल के ‘मल्टीप्लेक्स कल्चर’ वाले दौर में पीवीआर [PVR] जैसे सिनेमाई मंदिरों में माथा टेकना सीधे अपनी जेब पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने जैसा है, जहाँ ए