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तुम्हारा बॉडी काउंट कितना है!

बॉडी काउंट शब्द मैंने कहाँ जाना या सुना इस बात पर सोचता हूँ तो दोस्तों की याद आती है। व्यक्ति में गाली, शराब जैसे सामाजिक विकारों की मृत जड़ों को अक्सर दोस्तों द्वारा ही पानी दिया जाता है, शायद इसीलिए घर वाले कहते हैं कि सही दोस्त बनाना। बॉडी काउंट शब्द भी मैंने दोस्तों से ही सुना था। दोस्तों की बातचीत में मैंने ‘तेरा बॉडी काउंट कितना है?’, ‘मेरा बॉडी काउंट तो इतना है’ जैसे वाक्य सुने। यह सब बातें करते हुए, जो अपना बॉडी काउंट जितना ज़्यादा बताता, वह ख़ुद को उतना अल्फ़ा समझता और जिसका काउंट जीरो, वह चुपचाप खड़ा रहता।

बॉडी काउंट शब्द के अर्थ पर ध्यान दें तो इसे दो अर्थ में प्रयोग किया जाता है। पारंपरिक रूप से देखें तो इसका मतलब किसी युद्ध, लड़ाई या दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या से होता है, लेकिन आजकल बॉडी काउंट शब्द का प्रयोग आम बोलचाल की भाषा में किसी व्यक्ति के यौन साथियों की कुल संख्या से है। यह सोशल मीडिया पर बहुत प्रचलित है, जो अक्सर किसी के पिछले शारीरिक संबंधों को दर्शाता है।

बीते दिनों मुझे इंस्टाग्राम फ़ीड में भी इसी शब्द के आस-पास बने कंटेंट की दो रील्स दिख गईं। दोनों रील्स में पति, पत्नी से बॉडी काउंट पूछता है। एक रील में पत्नी अपना बॉडी काउंट चौबीस बताती है और दूसरी रील में बारह बताती है। दोनों रील्स में पतियों का मुँह देखने लायक़ होता है। बाद में जब पति पूछते हैं कि इतना बॉडी काउंट कैसे, तो दोनों की पत्नी समझाती हैं—एक बताती है कि मेरी उम्र अभी चौबीस है तो मेरा बॉडी काउंट भी चौबीस हुआ, तुम्हारी भी तो छब्बीस है; और दूसरी बताती है कि मेरे शरीर के अंग बारह ही हैं तो मेरा बॉडी काउंट बारह। दोनों रील्स में पति यह सब सुनकर तसल्ली की साँस लेते हैं।

ये थीं हँसी-मज़ाक़ के उद्देश्य से बनाई गई रील्स, लेकिन इन दिनों रील्स और मीम्स (सोशल मीडिया) ने ही अधिकतर चीज़ें सँभाली हुई हैं। मुखर पत्रकारिता हो, विरोध हो—सब सोशल मीडिया से/पर किए जा रहे हैं, भले सरकार उस पर बैन लगा दे। इसी सोशल मीडिया से बहुत सारी जानकारियाँ भी प्राप्त हो रही हैं, जैसे मुझे इंस्टाग्राम से ही एक शॉर्ट फ़िल्म के बारे में पता चला। शॉर्ट फ़िल्म का नाम है—Bodycount ...फ़िल्म की थीम ने आकर्षित किया और फ़िल्म यूट्यूब पर उपलब्ध थी तो जाकर देख डाली।

Bodycount छह मिनट चार सेकंड की फ़िल्म है। फ़िल्म शुरू होती है एक प्लास्टिक की गुड़िया के साथ, जो डांस पोज़ में होती है। फ़िल्म में आगे लड़की की गोद में लड़का अपना सिर रखे होता है, लड़का टिशू पेपर का फूल उसके कान पर लगाता है। लड़के के चेहरे पर चारकोल मास्क लगा होता है और लड़का एक हाथ से लड़की की हथेली और दूसरे हाथ से लड़की की पैर का तलवा छूते हुए सवाल करता है कि बुरा मत मानना तुम्हारा बॉडीकाउंट कितना है?

लड़की भी सवाल करती है, “क्यों? ऐसे ही अचानक”, तो लड़का बोलता है ऐसे ही।

लड़की फिर पूछती है, “ऐसे कभी ये नहीं सोचा या पूछा कि मुझे डांस क्यों पसंद है।”

लड़का जवाब देता है, “वो तो हॉबी हुई ना।”

लड़की अब पहले सवाल को परत दर परत खोलती है और सवाल से ही शुरू करती है, “वो वाला टाइम इंक्लूड करना है, जब ऑर्गज्म नहीं आया था...”

लड़का कहता है, “मतलब ऑफ़ कोर्स यार... जितने भी लड़कों के कॉन्टेक्ट में आई थी वो सब...”

लड़की फिर सवाल करती है, “हग इंक्लूड करना है और हाथ मिलाना?”

लड़का हँसते हुए कहता है, “यार तुम मज़े कर रही हो। बता दो ना! मैं भी बता दूँगा।”

लड़की फिर सवाल करती है, “वो वाला टाइम जब मुझे मेरी मर्ज़ी के बिना टच किया गया होगा या टच से ज़्यादा किया गया होगा...”

लड़का थोड़ा हिचककर मतलब पूछता है। लड़की आख़िरी सवाल करती है, “बचपन से गिनना है ना? सबसे पहले एक कजन भैया ने टच किया था, फिर ट्यूशन टीचर ने... स्कूल में बेस्टफ़्रेंड ने... ट्रेन, बस, ऑटो ये सब गिनना है ना?”

फिर अगला सीन आ जाता है और वो जगह ख़ाली मिलती है, जहाँ दोनों बैठे थे। अब लड़का अपने चेहरे से चारकोल फ़ेस मास्क खींचकर उतार रहा होता है। मुझे फ़ेस मास्क नहीं, बल्कि पितृसत्ता की परत उतरते दिख रही थी और मन में आस उठ रही थी कि एक दिन पितृसत्ता भी समाज से उतरकर कूड़ेदान में चली जाएगी।

शुरू के सीन में प्लास्टिक डॉल डांस पोज में थी, वैसे ही वह लड़की मन मुवाफ़िक़ डांस कर रही थी। यह ऐसा है जैसे डॉल में जान आ गई हो। मैंने महसूस किया कि बोलने से उसके दुःख झर गए हैं।

अधिकार जानना और मिलने में
कई हज़ार प्रकाश वर्ष की दूरी है
बस फिर भी मेरी तरह 
बोलते रहना ज़रूरी है

— शैलजा पाठक

लड़का अब असली फूल लेकर उस रूम में आता है। लगता है कि अब तक दोनों जहाँ थे, वह पुरुषों द्वारा बनाया समाज था; और जहाँ लड़की खुलकर डांस कर रही थी, वह एक स्त्री द्वारा बनाया गया समाज था—वहाँ असली फूल थे और स्त्री-पुरुष दोनों की ख़ुशी थी। लड़का उसे असली फूल देता है और दोनों मुस्कुराने लगते हैं। फ़िल्म यहीं ख़त्म हो जाती है।

इस फ़िल्म को जितनी बार देखा जाए कम है और यह फ़िल्म हमें एक बेहतरीन नज़रिया देती है। एक सवाल किसी के लिए गर्व की चीज़ बन जाता है, तो किसी के लिए शर्मिंदगी का। समाज में ऐसा क्यों है?

एक सवाल से अगर स्त्री के अंक ज़ीरो या एक से अधिक हुए तो उनके चरित्र पर धब्बा लग जाता है; वहीं पुरुष के अंक एक से जितना अधिक, मर्दानगी का तमग़ा उतना बड़ा। ऐसे में ‘मर्द है इतना तो होता ही है’ जैसे वाक्य प्रयोग होते हैं। यह असमानता क्यों? बॉडी काउंट मर्दों के लिए गर्व और सामान्य बात है और स्त्रियों के लिए चरित्र और शर्मिंदगी की बात! अगर ग़लत है तो स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ग़लत है और सही है तो दोनों के लिए सही है। सही कहा न?

बाक़ी निर्देशक ने बहुत बारीक़ी से हर चीज़ को दिखाया है और लेखक ने कहानी के ज़रिये अहम सवाल उठाया है। इतने कम अंतराल की शॉर्ट फ़िल्म में इतना बड़ा दृष्टिकोण दिखाना मामूली बात नहीं है। शॉर्ट फ़िल्मों के आने से नए-नए मुद्दे आसानी से सामने आ रहे हैं और कम संसाधनों में वह कलाकार—जिसके पास कहानी और दृष्टि है—शॉर्ट फ़िल्म बना पा रहे हैं। जो काम अब शॉर्ट फ़िल्में और डॉक्यूमेंट्री कर रही हैं, वह कुछ अपवादों को छोड़कर बड़ी-बड़ी बजट वाली फ़िल्में भी नहीं कर पा रही हैं। बॉलीवुड-ओटीटी सिर्फ़ मनोरंजन और पैसा कमाने का साधन बन गया है।

फ़िल्म प्रस्तुति देवाशीष मखीजा ने की है। एडिट, निर्देशन और कहानी लिखने का काम अमन विशेरा ने किया है। कॉस्ट आरिया और आर्यन ने किया है। यह फ़िल्म यूट्यूब पर देखी जा सकती है : Bodycount

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आर्यन प्रजापति नई पीढ़ी के लेखक हैं। वह हिंदू कॉलेज, दिल्ली में अध्ययनरत हैं।

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