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मैं वापस आऊँगा : 78 घंटे बनाम 78 साल का प्रेम

जीवन में पहली बार अकेले फ़िल्म देखने आई हूँ। अकेले घूमी हूँ, शॉपिंग पर गई हूँ, पर अकेले थिएटर में बैठकर फ़िल्म देखना कभी नहीं हुआ था। शायद इसलिए क्योंकि मुझे लगता था कि मैं दुनिया में इस क़दर अकेली कैसे हो सकती हूँ कि मेरे पास फ़िल्म देखने जाने तक के लिए कोई दोस्त न हो? मैं हमेशा से ही अकेले रह जाने से डरती आई हूँ, जबकि मैंने अब तक की ज़िंदगी का लंबा हिस्सा अकेले रहकर ही बिताया है। ख़ैर, इम्तियाज़ अली की नई फ़िल्म रिलीज़ हुई तो मैंने सोचा कि अपनी अकेले की फ़िल्म यही होनी चाहिए। आगे तय भी यही हुआ कि फ़िल्म देखी जाएगी, वह भी पहले ही दिन और पहला शो।

इम्तियाज़ अली की फ़िल्म अकेले देखने के लिए जिगरा चाहिए होता है। ...और क्यों चाहिए होता है, यह आपको उनकी फ़िल्में देखने के बाद ही पता चलेगा। उनकी फ़िल्म देखने के लिए—आप पॉपकॉर्न साथ ले जाएँ या न ले जाएँ, फ़र्क़ नहीं पड़ता; लेकिन आप अगर अकेले हैं, और पास भावुक पल के लिए कोई कंधा नहीं है तो आप मुश्किल में हैं। 

ख़ैर, मैं यह फ़िल्म देखने अकेले ही गई और इस तरह ‘मैं वापस आऊँगा’ फ़िल्म—मेरे जीवन में पहली बार होने वाले अनुभवों के कलेक्शन बॉक्स में जुड़ गई। साथ ही दो नाम भी  जुड़े—जिया और कीनू। फ़िल्म में जिया और कीनू जब पहली बार आपस में बात करते दिखते हैं—तब जिया, कीनू से कहती है कि कीनू लोग आपको कीनू बुलाते हैं? आप कोई ऑरेंज हैं क्या? जवाब में कीनू कहता है कि जिया आप किसी की हार्ट हैं क्या?

फ़िल्म के ये दो किरदार फ़िल्म देखते-देखते मेरे मन के एक कोने में घर कर गए हैं और मेरे साथ चले आए हैं। वही जिया जो किसी का हार्ट है और वही कीनू जो कोई ऑरेंज है। ...और सिर्फ़ इतना ही नहीं हुआ—एक प्यारी-सी लड़की की एक कान की चाँद बाली जो हमेशा गुम हुई रहती है मुझे मिल गई है; एक लड़के की डायरी का एक पन्ना जिसमें एक नज़्म है, जिसे सुनाए बिना वो मर भी नहीं सकता—उसके कुछ अशआर मेरे पास ही रह गए हैं; थोड़ा-सा सरगोदा शहर रह गया है, उसकी सज्जे-खब्बे वाली गलियाँ और वो कच्चा दालान वाला रास्ता भी—जहाँ अक्सर ही गुम हुई चाँद बाली मिल जाया करती थी।

मैं अपने चयन से बहुत ख़ुश हूँ कि जीवन में पहली बार होने वाले अनुभवों के कलेक्शन बॉक्स के लिए मैंने इस फ़िल्म को चुना। अब मैं इम्तियाज़ की फ़िल्में अकेले देख सकती हूँ, मुझे किसी के कंधे की ज़रूरत नहीं। फ़िल्म देखते हुए मुझे ऐसा बार-बार लग रहा था कि मैं थिएटर में अकेली बैठी हूँ, जबकि दूसरी तरफ़ लोग भरे हुए थे। जैसे ही फ़िल्म ख़त्म हुई, सब उठकर चले गए और मैं आख़िर तक उठ नहीं पाई। मैं दिलजीत दोसांझ के चले जाने तक बैठी रही, जब तक कि स्क्रीन ब्लैक नहीं हो गई।

फ़िल्म में एक डायलॉग है—“प्यार ज़हर की तरह होता है, अगर इसकी एक भी बूँद रह गई न तो ये आख़िरी समय में चैन से मरने भी नहीं देती”। यह सुनकर ऐसा लगता है कि जैसे प्यार कोई ऐसी चीज़ है, जो फाँस की तरह दिल में गड़ जाती है, जिसका मीठा-सा दर्द ताउम्र बने रहता है और जिसे निकालना बहुत ही मुश्किल होता है, कुछ लोगों के लिए तो लगभग नामुमकिन ही समझें। आज के समय में जब लोग अपने प्यार को भुलाने में 78 घंटे नहीं लगाते, वहाँ कोई 78 साल में अपने प्यार को भूल ही नहीं पाया। उसे हड़बड़ी में देश छोड़ना पड़ा, पाकिस्तान से भारत आना पड़ा। वह, उससे जाने की इजाज़त नहीं ले पाया था इसलिए उसकी मौत भी ठहरी रही। ऐसी मोहब्बत क्या आज के समय में मुमकिन है! किसी का इंतज़ार क्या इस हद तक किया जा सकता है!

जब मैं थिएटर के अंदर गई थी, तब प्यार के बारे में मेरी जो राय थी—वह बहुत अलग थी। सरपट भागती दुनिया में रिश्ते, प्यार और जज़्बात इंस्टेट हो गए हैं और इस तेज़ रफ़्तार प्यार वाली दुनिया में ठहरा हुआ प्रेम तलाशते हुए लोग अकेले हैं, जिनसे इंस्टेट प्यार हज़्म नहीं होता—ऐसे लोग भूखे ही मर जाते हैं। ऐसे में ऐसी फ़िल्म का आना जो आपको प्यार के बारे में दोबारा सोचने पर मज़बूर कर दे, प्यार को लेकर आपकी राय बदल दे; वह भी ठीक उस समय जब आप यह मान लेते हैं कि आपने प्यार को समझ लिया है और प्यार से ज़्यादा बेकार चीज़ दुनिया में कोई नहीं। ठीक तभी कुछ ऐसा घटता है कि आप फिर से हैरान रह जाते हैं।

यह फ़िल्म हैरत में डालने वाली फ़िल्म है, आप एक बार मलिका-ए-दिल-फ़रेब के प्यार में गिरेंगे तो सारी उम्र उससे निकल नहीं पाएँगे! एक बूँद प्यार की रह ही जाएगी।

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गीतांजली सिन्हा को और पढ़िए : विनोद कुमार शुक्ल से दूसरी बार मिलना | गर्ल्स हॉस्टल, राजकुमारी और बालकांड! | यह ख़ाली जगह नहीं भरेगी | नवोदय विद्यालय के पच्चीस साल : स्मृतियों की यात्रा | नवोदय की नॉट सो गुड मेमोरीज!

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