किम की-यंग : कोरियाई सिनेमा का एक असाधारण नाम
अमन त्रिपाठी
24 जून 2026
हम जब आज से लगभग एक दशक पूर्व कोरिया के बारे में सोचते थे, तो शायद अधिकांश लोगों के लिए उसका उत्तर अज्ञात ही रहता था। जिनकी समझ या रुचि थोड़ी अधिक विकसित थी, उनके मन में शायद किम जोंग उन का नाम आता रहा होगा, क्योंकि राजनीतिक क्षेत्र में वह प्रख्यात हों या कुख्यात, यह मतभेद का विषय हो सकता है, परंतु राजनीतिक चर्चा के केंद्र में वे हमेशा विद्यमान रहे हैं। किंतु आज के समय में यथास्थिति काफ़ी बदली हुई नज़र आती है। आम भारतीय जनमानस अब कोरिया को कई विभिन्न तरीक़ों से जानता है; संभव है कि उसे उत्तर और दक्षिण कोरिया का भेद भी स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गया हो। यह परिवर्तन किसी एक फ़िल्म, किसी एक भोजन, किसी एक कला रूप या किसी एक पद्धति का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से कोरियाई गणराज्य द्वारा किए गए सतत प्रयासों का नतीजा है, जो आज ‘हॉल्यू’ के नाम से जनमानस में प्रचलित है।
जब बाँग जून-हो, जो अपनी ऑस्कर-सम्मानित फ़िल्म ‘पैरासाइट’ और अन्य चर्चित कृतियों के माध्यम से आज विश्वविख्यात निर्देशक के रूप में वैश्विक मंच पर स्थापित हो चुके हैं, से यह प्रश्न किया गया कि वह किन दो निर्देशकों के साथ, चाहे वे जीवित हों या दिवंगत, काम करना चाहेंगे, तो उनका उत्तर अत्यंत अर्थपूर्ण था। उन्होंने कहा कि यदि कभी अवसर मिला, तो वह फ़्रांसीसी निर्देशक अल्फ़्रेड हिचकॉक और कोरियाई निर्देशक किम की-यंग के साथ चाय और बिस्कुट पर बैठकर उनकी फ़िल्मों पर चर्चा करना चाहेंगे, विशेषकर ‘वर्टिगो’, ‘साइको’ और ‘द हाउसमेड’ जैसी फ़िल्मों के निर्देशन के संदर्भ में।
यहीं से उस निर्देशक की गंभीरता और महत्ता का बोध होता है जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं। किम की-यंग कोई साधारण व्यक्तित्व नहीं थे। वैश्विक निर्देशन की दृष्टि से उनकी तुलना उस अल्फ़्रेड हिचकॉक से की जाती है, जिन्हें अक्सर ‘निर्देशन का देवता’ कहा जाता है। पर किम की बात करते समय केवल उनकी फ़िल्मों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना आवश्यक है कि वह किस सामाजिक और ऐतिहासिक परिवेश में काम कर रहे थे। जिस कोरियाई समाज में युद्ध का साया था और सामाजिक परिस्थितियाँ अत्यंत अस्थिर थीं, उस समय ऐसे विषयों पर खुलकर बात करना ही नहीं, बल्कि उन पर फ़िल्में बनाना भी अपने-आपमें एक असाधारण उपलब्धि थी।
इसी साहस और क्रांति की चर्चा हमारे समय के महान यथार्थवादी निर्देशक मार्टिन स्कोर्सेज़ भी करते हैं। वह किम की फ़िल्मों, विशेष रूप से ‘द हाउसमेड’, की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ऐसे सामाजिक परिवेश में इस तरह की फ़िल्मों का निर्माण अत्यंत क्रांतिकारी था। यही कारण है कि ‘द हाउसमेड’ जैसी कृतियों के माध्यम से आज कोरियन फ़िल्म काउंसिल (Korean Film Council—KOFIC) और वर्ल्ड सिनेमा प्रोजेक्ट (World Cinema Project) किम की-यंग के कार्यों को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
इसी फ़िल्म की प्रशंसा करते हुए बाँग जून-हो यह भी स्वीकार करते हैं कि उनकी फ़िल्म ‘पैरासाइट’ का प्रमुख प्रेरणास्रोत यही कृति रही है। यह फ़िल्म स्त्रियों की मनःस्थिति (फ़ीमेल साइकोलॉजी) और समाज में स्त्री के स्थान जैसे विषयों को केंद्र में रखकर निर्देशित की गई थी। बाँग जून-हो यह भी स्पष्ट करते हैं कि किम की-यंग ने इन जटिल सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों को सिम्बोलिज़्म और विभिन्न सिनेमा टूल्स के माध्यम से जिस तरह प्रस्तुत किया, वही दृष्टि उन्हें प्रभावित करती रही है। जिस प्रकार किम ने सीढ़ियों और अन्य कई प्रतीकों का सहारा लेकर समाज की संरचना और उसमें व्याप्त असमानताओं को दर्शाया, वही प्रेरणा बाँग जून-हो को किम की फ़िल्म से मिली जिसे उन्होंने ‘पैरासाइट’ में अपने ढंग से प्रयोग किया। इस प्रतीकात्मक दृष्टि को ही बाँग जून-हो के सिनेमा में एक प्रकार ‘सिंबॉलिक वंडर’ कहा जा सकता है। इसलिए यदि यह कहा जाए कि किम की-यंग केवल यथार्थवादी निर्देशक ही नहीं थे, बल्कि अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण स्त्रीवादी लेखक-निर्देशकों में से एक भी थे, तो यह कथन शायद अतिशयोक्ति नहीं होगा।
अपने विषय से यह भटकाव आवश्यक था, ताकि उस व्यक्तित्व का सम्यक् परिचय दिया जा सके जो अपने जीवनकाल में शायद वह स्थान प्राप्त नहीं कर पाया जिसका वह वास्तविक अधिकारी था। जब हम किम की-यंग की बात करते हैं, तो यह स्मरण रखना ज़रूरी है कि वह कोरियाई सिनेमा के स्वर्ण युग के सबसे महत्त्वपूर्ण और महान् व्यक्तित्वों में से एक थे। किम की-यंग का जन्म 1919 में सियोल में हुआ, उस समय जब कोरिया जापानी उपनिवेशवाद के अधीन था। औपचारिक रूप से उन्होंने डेंटिस्ट्री की पढ़ाई की, किंतु उनका रुझान शीघ्र ही सिनेमा की ओर मुड़ गया और उन्होंने फ़िल्म जगत में अपने कदम बढ़ाए। अपने करियर में उन्होंने तीस से अधिक फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें प्रमुख रूप से स्त्री-मनोविज्ञान, पारिवारिक सत्ता-संरचनाएँ, दमन, कामना और नैतिक द्वंद्व जैसे विषय केंद्र में रहे।
अपने आरंभिक दौर में उन्होंने अमेरिका के लिए प्रोपेगेंडा सिनेमा का निर्देशन किया, जिससे उनके शिल्प में यथार्थ और अनुशासन की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। बाद के वर्षों में उन्होंने सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और अस्तित्ववादी विषयों पर काम करते हुए एक ऐसी विशिष्ट सिनेमाई भाषा विकसित की जो अपने समय से कहीं आगे थी। उस दौर में, जब विश्व स्तर पर स्त्री विमर्श और सामाजिक परिवर्तन जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा भी नहीं होती थी; किम की-यंग ने स्त्री की इच्छाओं, भय और विद्रोह को सिनेमा के केंद्र में स्थापित किया। इसी क्रम में उन्होंने आयोडो (Iodo / Ieodo Island) जैसी फ़िल्म का निर्माण किया, जिसमें नेक्रोफ़िलिया जैसे अत्यंत असहज और वर्जित विषय को प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रस्तुत किया गया। यह फ़िल्म कोरियाई सिनेमा के इतिहास में एक असाधारण प्रयोग थी और वास्तव में उसे विश्व सिनेमा में कहीं अधिक व्यापक पहचान मिलनी चाहिए थी।
कोरिया के हान्यांग विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर चुंग कांग किम अपनी मशहूर किताब ReFocus: The Films of Kim Ki-young में बताती हैं कि किम की-यंग की फ़िल्में जब 1997 में बुसान अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में दुबारा वैश्विक दर्शकों के सामने आईं, तब अंतरराष्ट्रीय सिने-जगत ने महसूस किया कि उनका सिनेमा एशियाई क्लासिक परंपरा से बिल्कुल अलग थी। जहाँ यासुजीरो ओज़ू (Ozu Yasujirō) और केंजी मिज़ोगुची (Mizoguchi Kenji) जैसे जापानी निर्देशकों का सिनेमा संयम, स्थिरता और मानवीय करुणा के लिए जाना जाता है; वहीं किम की-यंग का सिनेमा अत्यधिक तीव्र, असहज और हिंसक भावनात्मक संरचनाओं से भरा हुआ था। इसी भिन्नता ने उनकी फ़िल्मों को ‘क्लासिक एशियन सिनेमा’ की पारंपरिक परिभाषा से बाहर खड़ा कर दिया। आलोचकों ने उनकी कृतियों को एक ‘हिडन एशियन पर्ल’ कहा, जिसने यह साबित किया कि एशियाई सिनेमा केवल ओज़ू, मिज़ोगुची या चीन की फ़िफ़्थ जनरेशन तक सीमित नहीं है। ‘द हाउसमेड’ आज इसी वैकल्पिक एशियाई सिनेमाई परंपरा की सबसे सशक्त पहचान मानी जाती है।
किम की-यंग का सिनेमा न तो केवल मनोरंजन था और न ही मात्र सामाजिक टिप्पणी, बल्कि वह मानवीय अवचेतन की गहराइयों में उतरने का एक साहसिक प्रयास था और उसके माध्यम से समाज की एक नई रूप-रेखा तैयार करना उनका उद्देश्य था। इसी कारण आज उन्हें केवल कोरियाई सिनेमा का ही नहीं, बल्कि विश्व सिनेमा के सबसे अनोखे और प्रभावशाली निर्देशकों में गिना जाता है, भले ही यह स्वीकृति उन्हें अपने जीवनकाल में पूर्ण रूप से प्राप्त न हो सकी थी।
जब हम तुलनात्मक दृष्टि से विचार करते हैं और भारत में कोरियाई सिनेमा की समझ की नींव रखने का प्रयास करते हैं, तब यथार्थवादी निर्देशक सत्यजीत रे का उल्लेख किए बिना यह संवाद अधूरा रह जाएगा। लगभग समान टाइम पीरियड, यानी 1960 के दशक में, जब किम की-यंग अपनी महत्वपूर्ण फ़िल्म द हाउसमेड की रूपरेखा तैयार रहे थे, उसी समांतर परिवेश में सत्यजीत रे भी मानवीय संबंधों, आंतरिक द्वंद्व और सामाजिक संरचनाओं पर आधारित फ़िल्में रच रहे थे। यदि ‘द हाउसमेड’ की तुलना रे की मैग्नम ओपस ‘चारुलता’ से की जाए, तो दोनों निर्देशकों के सिनेमा-जगत में कई स्तरों पर गहरी समानताएँ दिखाई देती हैं।
उस समय भारत भी एक संक्रमण-काल से गुज़र रहा था। नया देश था, नई स्वतंत्रता और बदलते सामाजिक मूल्यों के बीच मनुष्य की निजी इच्छाओं और सामाजिक सीमाओं के टकराव को रे ने अपने सिनेमा में अत्यंत संवेदनशीलता से तराशा है। इसी प्रकार, कोरिया में भी सामाजिक उथल-पुथल और ऐतिहासिक अस्थिरता के बीच किम की-यंग का सिनेमा यथार्थ की जटिल परतों को उजागर कर रहा था। दोनों देशों में, लगभग एक ही समय में, यथार्थवादी सिनेमा का बीज मज़बूती से फल-फूल रहा था। आज वही सिनेमा भारत और कोरिया दोनों को वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट पहचान दिला चुका है और यह समानांतर यात्रा इस बात का प्रमाण है कि सिनेमा स्थानीय होकर भी वैश्विक हो सकता है।
अब वर्ष 2026 है। 2019 में ‘पैरासाइट’ का ऑस्कर जीतना, 2024 में हान कांग का साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होना, और उससे पहले तथा बाद में अनेक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों का कोरियाई लेखकों, निर्देशकों और कलाकारों को मिलना, यह सब किसी एक क्षण की उपलब्धि नहीं है। बीटीएस जैसे कलाकारों ने कोरियाई लोकप्रिय रैप और संगीत को जिस वैश्विक ऊँचाई तक पहुँचाया, उसी क्रम में कोरियाई सिनेमा ने भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। कांस फ़िल्म महोत्सव जैसे प्रतिष्ठित मंच पर भी कोरिया के अनेक निर्देशकों की निरंतर भागीदारी और सराहना इस बात का जीवित प्रमाण है।
पार्क चान-वुक जैसे निर्देशक, जिनकी ‘ओल्ड बॉय’, ‘वेंजेंस सीरीज़’, ‘जेएसए’, ‘डिसीजन टू लीव’ और हालिया ‘नो अदर चॉइस’ जैसी फ़िल्में वैश्विक दर्शकों के बीच गहरी छाप छोड़ चुकी हैं और आज वह अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में एक बहुत महत्त्वपूर्ण नाम बन चुके हैं। इसी तरह किम की-डुक और अन्य अनेक कोरियाई निर्देशकों की फ़िल्में भी विश्व सिनेमा के विमर्श में अपनी जगह बनाए हुए हैं। इन सभी समकालीन सफलताओं के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों का योगदान है; जिन्होंने कोरियाई सिनेमा की नींव रखी, उसे विचार, साहस और एक पहचान दी।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम केवल वर्तमान की चमक पर न ठहरें; बल्कि उन सभी निर्देशकों, लेखकों, गीतकारों, रैपरों और कलाकारों को भी स्मरण में रखें, जिन्होंने अपने समय में समाज से संवाद बनाया और अपनी कला के माध्यम से रास्ते खोले। जिस प्रकार किम की यंग की फ़िल्में लंबे समय तक भुला दी गईं, लेकिन 1997 के बुसान अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में हुए पुनर्पाठ के बाद उन्हें विश्व सिनेमा की एक ‘छुपी हुई एशियाई धरोहर’ के रूप में पहचाना गया; उसी प्रकार उन सभी व्यक्ति विशेष के कार्यों की समय पर सराहना होती रहनी चाहिए और उन्हें निरंतर सामने लाया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए कोरियाई सांस्कृतिक इतिहास केवल उपलब्धियों की सूची न बने, बल्कि उन नामों की जीवित स्मृति रहे जिनके बिना यह यात्रा संभव नहीं हो सकती थी।
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बेला पॉपुलर
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