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मैं वापस आऊँगा : हमन हैं इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या

इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों के लाखों दीवानों में एक दीवानी मैं भी हूँ। क्या वजह है इस दीवानगी की... इसका जवाब है कनेक्ट या जुड़ाव। आप उनकी फ़िल्मों के किरदारों से जुड़ पाते हो और फ़िल्म ख़त्म होते-होते पूरी तरह जुड़ जाते हो।

गीत, मीरा, वेद, तारा और जॉर्डन—ये सभी किरदार हैं, लेकिन हम इनके बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे इनकी कहानी हमारे आस-पास ही कहीं घटित हुई हो और हम इन्हें बहुत अच्छे से जानते हों।

‘जब वी मेट’, ‘रॉकस्टार’, ‘तमाशा’, ‘लव आज कल’, ‘लैला मजनू’ और उनकी सबसे नई फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’; सभी की देश, काल और परिस्थिति बहुत अलग-अलग हैं, लेकिन इन फ़िल्मों की आत्मा जैसे एक है। कुछ अधूरा है... जो पूरा करना है, पूरा होना है।

इम्तियाज़ ने राज शमानी को दिए इंटरव्यू में यह बात कही है कि हम सबके भीतर यह अधूरापन रहता है, बस हम इसे स्वीकार नहीं करते। हम सब ‘कुछ’ ढूँढ़ रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्या! उस ‘कुछ’ के लिए हम कभी गहरे में नहीं उतरते कि आख़िर वह क्या है जिसकी हमें तलाश है और क्यों! जैसे ही हमें कहीं गहरे उतरने का मौक़ा मिलता है, हम भागने लगते हैं। हम अपने आपसे, अपने सच से रूबरू होना ही नहीं चाहते—ठीक फ़िल्म में दिलजीत द्वारा निभाए गए किरदार ‘निर्वैर’ की तरह। हमें एक सहारा चाहिए होता है, जिसका हाथ पकड़कर हम अपनी ही इस दुनिया में छलाँग लगा दें बिना किसी डर के...

दिलजीत का किरदार नौकरियाँ बदल रहा है, रिश्तों में कमिटमेंट से डर रहा है, अपने पिताजी के सवालों से भाग रहा है; लेकिन अपने दादाजी की पुरानी कहानी के सिरे जोड़ते हुए, वह अपने व्यक्तित्व के टूटे हुए टुकड़ों को भी जोड़ पाता है।

यही आत्मा है, यात्रा है—इम्तियाज़ के किरदारों का प्रेम में खोना नहीं, ख़ुद को पाना है। अँग्रेज़ी में जिसे self-discovery कहते हैं। उनकी फ़िल्में वह आईना हैं जो हमें ख़ुद से मिलाती हैं।

हर कहानी प्यार-मोहब्बत की कहानी लगती ज़रूर है, लेकिन असल में वह भीतर और बाहर को एकसार करने की कहानी है। सारे बनावटी मुखौटे उतार फेंकने की कहानी है।

कौन यक़ीन कर सकता है कि वह दादाजी जिनके नाम से पूरा परिवार काँपता है, वह अपने भीतर 78 बरसों से इतनी ख़ूबसूरत प्रेम-कहानी छुपाए बैठे हैं। वह फ़िल्म के आख़िरी के संवाद में बहुत गहरी बात कह जाते हैं।

“इस तरह का प्यार मिल नहीं सकता। ये हमारे अंदर होता है और इसका बाहर आना बहुत ज़रूरी है। बस कोई ले ले इसे, कोई passion, कोई इंसान... ये ज़हर की तरह है, अगर इसकी एक बूँद भी अंदर रह गई ना, तो ये चैन से मरने भी नहीं देता...”

यही बात इम्तियाज़ के सभी किरदार कह रहे हैं। कस्तूरी मृग की तरह जिस प्यार को हम बाहर कहीं खोज रहे होते हैं, वो हमारे भीतर ही होता है, कहीं बाहर से मिलता नहीं।

कबीर की यह साखी इस फ़िल्म के एक गीत का हिस्सा है और यही इस फ़िल्म का सार भी :

हमन हैं इश्क़ मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आज़ाद या जग से हमन दुनिया से यारी क्या

जो बिछड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते

हमारा यार है हम में हमन को इंतिज़ारी क्या

विभाजन की पृष्ठभूमि की यह अधूरी प्रेम कहानी एक बार फिर उस त्रासदी की ओर ध्यान खींचती है। पाँच दिन में रेडक्लिफ़ ने जो दीवार खड़ी कर दी थी, वह इतने बरसों में ख़ून से लथपथ हो चुकी है, लेकिन उसमें कोई खिड़की नहीं बन पाई है। कितनी मासूमियत से कीनू कहता है, “मैं नहीं जानता यह जगह किस मुल्क का हिस्सा है, लेकिन यह मेरी जगह है और मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।” लम्हों ने ख़ता की है, सदियों ने सज़ा पाई है। विभाजन का ज़ख़्म शायद कभी भरेगा नहीं। इस तरह की फ़िल्मों से वह बस ताज़ा होता रहता है।

गीत-संगीत, इम्तियाज़ की कई पहले की फ़िल्मों की तरह ही इरशाद कामिल और ए आर रहमान का है, लेकिन इम्तियाज़ की बाक़ी फ़िल्मों की तुलना में इस फ़िल्म का संगीत पक्ष मुझे कुछ कमज़ोर लगा है। नीलांजना द्वारा गाया गया गीत ‘मस्कारा’ में एक ताज़गी है। बहुत अच्छे और गहरे लिखे हुए बोलों के बावजूद फ़िल्म के अन्य गीत उतना प्रभावित नहीं करते।

‘चमकीला’ में दिलजीत दोसांझ और निर्देशक की केमिस्ट्री का कमाल हम देख चुके हैं और यही वजह है कि इस फ़िल्म में दिलजीत को देखकर लगता ही नहीं कि वह कोई अभिनय कर रहे हैं। बहुत ही सहजता से वह किरदार में पूरी तरह डूबे हुए नज़र आते हैं।

नसीर साहब के अभिनय के बारे में अगर लिखने बैठें, तो ऐसे न जाने कितने लेख लिखने पड़ेंगे; लेकिन इस उम्र में भी जिस शिद्दत और ईमानदारी से उन्होंने अभिनय किया है—वह एक बार फिर हमें नि:शब्द कर देता है। उनका किरदार फ़िल्म की धुरी है और वह इस बात को पूरी तरह समझते हुए अपने कांधे पर इस फ़िल्म को उठाए हुए हैं।

वेदांग रैना की फ़िल्मों का चयन उन्हें उनके समकक्ष कलाकारों की भीड़ से अलग करता है। वह बॉक्स ऑफ़िस से प्रभावित हुए बिना अपनी पटकथाएँ चुन रहे हैं और एक बार फिर अपनी अभिनय प्रतिभा से चौंकाते हैं।

शरवरी वाघ भी ‘मुंज्या’ जैसी फ़िल्मों से पहचान बना चुकी हैं, लेकिन इम्तियाज़ ने उन्हें एकदम नए कलेवर में प्रस्तुत किया है और वह अपनी बाक़ी फ़िल्मों से अलग नज़र आती हैं।

विनोद नागपाल को एक लंबे समय के बाद बड़े पर्दे पर देखकर अच्छा लगा, एक समय वह टेलीविजन के काफ़ी लोकप्रिय नामों में से एक थे। रजत कपूर, दानिश और अंजना सुखानी सभी ने अपनी छोटी भूमिकाओं में भी प्रभाव छोड़ा है।

जिस नाव के खेवैया इम्तियाज़ हों और पतवार नसीरुद्दीन शाह, वह नाव डूब नहीं सकती। गोते और हिचकोले खाती हुई कहानी पार पहुँचती है, लेकिन आपको पूरी तरह भिगोती हुई।

इसकी हिलोरों से उठती लहरों का स्पर्श देर तक आत्मा को भिगोये रखता है और गालों पर अचानक आई दो बूँदों को महसूस करते हुए आप अचरज से भर जाते हो।

इम्तियाज़ अली ऐसे ही हमें ख़ुद से मिलवाते रहें, यही शुभकामनाएँ!

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