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मैं वापस आऊँगा : क्या कमाल है, न शिकायतें, न मलाल है!

दो गिलहरियाँ इमारत के कोने पर आकर मिलती हैं। एक कहीं से मूँगफली ले आई है, दूसरी हाथ बढ़ाकर उसे ले लेना चाहती है। अचानक बम का धमाका होता है और इमारत ढह जाती है। सब मलबे के हवाले। इस इतनी बड़ी दुनिया में न जाने कितनी सल्तनतें रहीं, क्या इनके इतिहास में एक गिलहरी की दूसरी गिलहरी को मूँगफली देने की अधूरी इच्छा किसी वीभत्स घटना की तरह दर्ज होगी? दुनिया के इतिहास में दर्ज वीभत्स घटनाओं के नाम आँकड़े हैं, कहानियाँ नहीं। कहानियाँ व्यक्ति बुनता है, जीता है, आजीवन भोगता है। ऐसी ही कितनी कहानियाँ भारत विभाजन के बाद सरहदों के दोनों तरफ़ दशकों से यात्रा कर रही हैं। इन कहानियों में आँकड़े नहीं हैं, यादें हैं, छूट चुका जीवन है, विराग है और है अंतहीन पीड़ाओं की परछाईं।

कुछ कहानियाँ दर्ज होती हैं। कुछ कहानियाँ उन्हें जीने वालों के साथ चली जाती हैं। इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ के ईशर सिंह गरेवाल (नसीरुद्दीन शाह) अपनी कहानी, छूट चुके जीवन का एक वादा पूरा किए बिना जाना नहीं चाहते। ऐसा वादा जिसके पूरा होने का मौत भी इंतज़ार करती है। वादा है एक लड़की से जिसका नाम उनके हाथों पर ‘मल्लिका दिलफ़रेब’ के नाम से गुदा हुआ है। जो नाम आजीवन साथ चलता रहा, जिसके नाम एक नज़्म बैनामा है। इसके पहले कि आप शब्दों में भटककर कहानी का ओर-छोर खोजें, कहानी की बुनियादी बातें इत्तिला करते चलूँ। इतिहास में यह साल है 1947 का और जगह है अब के पाकिस्तान का सरगोदा। हज़ार प्रेम कहानियों की तरह एक प्रेम कहानी है। ईशर और अफ़साना उर्फ़ कीनू और जिया की।

विभाजन का ऐलान हो चुका है। अब सिक्ख और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते। वक़्त कम है, बिछड़ जाने का संशय है और ना जाने की ज़िद। प्रेम कहानी शुरू होती है जिसमें खो चुकी या कहें कि जानकर छिपाई एक चाँदबाली है और साथ जीने के सपने। सरगोदा चाँद हो जाता है, जिस पर सांप्रदायिक ज़हर पिए हुए लोगों की नज़र है। ये लोग ज़रूर किसी दूसरे ग्रह से उतरे हैं, जिनकी रगों में शायद कोई और ख़ून बहता है। ये खेतों में आग लगाकर अपने हिस्से की धरती छीन लेना चाहते हैं। ईशर को सर रेडक्लिफ़ की बनाई लकीर के उस पार जाना होता है। कल जो उसका घर था, आज वह उसका मुल्क नहीं। उसकी जगह नहीं जहाँ वह ज़िद करके बैठ जाए। वह लौटने की सारी कोशिश करता है, लेकिन लाशों के पहाड़ पार नहीं कर पाता। उन लाशों में एक उसकी बहन है, एक दादी, एक माँ, एक दोस्त और जाने कितने अपने चेहरे हैं। पीछे छूट जाती है एक समूची दुनिया। वह अपने भाई पाली से कहता है, “यह दुनिया ख़त्म हो चुकी है पाली। अब पीछे मुड़कर नहीं देखना”। वही पाली जो भीष्म साहनी की कहानी ‘पाली’ में देश का प्रतीक है—कभी इस पार, कभी उस पार। तर्बियत कभी हिंदू तो कभी मुस्लिम।

एक ही कहानी नहीं जो इम्तियाज़ अपनी फ़िल्म में कहते हैं। ख़त्म हो चुकी दुनिया के इस पार एक और दुनिया है, जहाँ ईशर का दूसरा जीवन है। अब उसे कोई कीनू के नाम से नहीं जानता। वह 95 साल का एक ज़िद्दी बुज़ुर्ग है, जिसके आँसू लकीर के इस पार आकर सूख गए हैं और उसका दिल डायरियों में सिमट गया है। उसके मरने का सबको इंतज़ार है सिवाय निर्वैर के। निर्वैर ईशर की तीसरी पीढ़ी है। उसी की तरह अपनी मिट्टी से विस्थापित। निर्वैर भी उतना ही ज़िद्दी है, जितने उसके दादा ईशर। कुछ है जिसे किए बिना ईशर मर नहीं सकते और कुछ है जिसे जाने बिना निर्वैर उन्हें मरने नहीं देगा। शुरू होती है एक कड़ी को दूसरी कड़ी से मिलाने की ज़िद। बाहर खोजते हुए कितना कुछ है जो अंदर मिल जाता है। प्रेम और काम की प्रतिबद्धता से भागता निर्वैर समझता है—प्यार का वह सूत्र जो बाहर कहीं नहीं मिलता। वह हम सब के भीतर है किसी ज़हर की तरह। इसे कहीं न उड़ेलो तो नासूर बन जाता है। यह प्रेम का एक और रंग है जो इम्तियाज़ अली के फ़िल्मों में प्रेम की समझ की नई मिसाल बन रहा है। इस नई सदी में हम प्रेम को समझौते की बरतने लगे हैं पर भीतर से वही ‘मर-मिट जाने वाला’ प्रेम तलाशते हैं। शायद इसलिए कहानी के अंत तक हमारी आँखें नम हो जाती हैं। कुछ है जिसे इम्तियाज़ थोड़ी देर के लिए हमारे भीतर भी लौटा देते हैं। आप क्या समझ रहे हैं प्रेम? नहीं! सिर्फ़ प्रेम नहीं, एक सवाल भी।

सवाल यह कि क्या बम के धमाकों से इमारतों का मलबों में बदलना सिर्फ़ एक कहानी है? क्या ये इंसानियत और सभ्यता का वह सच नहीं जिसे अब हम मात्र सूचनाओं की तरह बरतने लगे हैं। जिसपर ‘ना कोई शिकायतें हैं, ना कोई सवाल है, क्या कमाल है!’ सवाल यह कि क्या विभाजन का वह दंश जो हमारे पुरखों ने झेला, वह उनके साथ चला गया? नहीं। आज भी उसका असर दिखता है और रह-रहकर टीस बनकर उठता है। कभी रात को दादी-नानी की कहानियों में, कभी किसी बुज़ुर्ग की अंतहीन चुप्पी और ठंडे व्यवहार में, पुरानी तस्वीरों और खंडहरों में। जैसा कि फ़िल्म में निर्वैर के किरदार में दिलजीत ने कहा कि ये वो बेचैनी है जो शायद ईशर और पाली के साथ न जाए। पीढ़ियों तक चलती रहे। यही वह सच है जिसे ‘जेनरेशनल ट्रामा’ कहते हैं। एक पीढ़ी का अवसाद कई पीढ़ियों तक असर करता है। इस अवसाद इस पीड़ा में उस हैवानियत को क्या कभी भूला जा सकता है जो औरतों के साथ हुई। जिन्हें हिंदू-मुस्लिम होने के पहले औरत होने की सज़ा मिली। जो अचानक किसी की भी आबरू न समझी गई। ‘भारत’ आज़ाद हुआ और ‘माता’ उत्पीड़ित!

माफ़ कीजिएगा। फ़िल्म की बुनियादी बातों से आपका ध्यान युद्ध और विभाजन के इतिहास की बुनियादी हक़ीक़त तक ले आई। शायद कला का यही काम है और यह काम बड़ा जोखिम भरा है जिसे इम्तियाज़ अपने तरीक़े से निभाते हैं। वह आपको बताते नहीं लेकिन फ़िल्म में अंत में एक सवाल छोड़ जाते हैं कि जो 1947 में हुआ; जो फ़िलिस्तीन, वेनेज़ुएला और ईरान में हो रहा है; कितनी सभ्यताएँ और पीढ़ियाँ लगेंगी उनके अवसाद को, उसके असर को भुलाने में। मनुष्य प्रेम खोकर भी प्रेम करना नहीं भूलता जैसे वह हिंसा के परिणाम झेलकर भी हिंसा करना नहीं भूलता। फ़र्क़ इतना है कि प्रेम हावी नहीं हो पाता और हिंसा सबकुछ खा जाती है। इसी दुर्दांत समय में अपने आस-पास देखिए।

यह फ़िल्म हमें बताती है कि प्रेम का वह भी एक रूप था जहाँ क़समों-वादों के मायने थे, कभी-कभी जान से भी ज़्यादा। जहाँ अलग होने के दशकों बाद भी एक-दूसरे का इंतिज़ार था। प्रेम जब सच में होता है तो आप लाख कोशिश कर लें उसे भुलाने की, वह मौत से चंद घड़ी पहले आपका रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है। और तब तक नहीं जाता, जब तक कीनू-जिया के लिए पहली और आख़िरी बार नज़्म ना पढ़ दे; जब तक ‘उसने कहा था’ का लहना सिंह अपनी क़सम पूरी ना कर दे, वह प्रेम नहीं जाएगा। ना कहानियों से ना उसे करने की इच्छा हमारे भीतर से जाएगी। जिसे अब हम ‘उस ज़माने’ का प्यार कहते हैं, वह कहीं बचा हुआ है हम सब में... पुरानी इमारतों की तरह। थोड़ा जर्जर है, लेकिन अपना अस्तित्व नहीं खो पाया है। जब तक यह प्रेम बचा रहेगा, युद्ध और अवसाद से लड़ने की आवाज़ बची रहेगी। तब तक एक गिलहरी का दूसरी गिलहरी से मूँगफली साझा न कर पाने की टीस, इमारतों के मलबों से लौटकर आती रहेगी।

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