‘धुरंधर द रिवेंज’ से बचकर लौटे धुरंधर का बयान
मनीष चौरसिया
20 मार्च 2026
मैंने भी अंतत ‘Dhurandhar The Revenge’ देख ली। वैसे आजकल के ‘मल्टीप्लेक्स कल्चर’ वाले दौर में पीवीआर [PVR] जैसे सिनेमाई मंदिरों में माथा टेकना सीधे अपनी जेब पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने जैसा है, जहाँ एक अदद टिकट के दाम हज़ार रुपए का आँकड़ा छू रहे हैं। मैंने सोचा, जब तक सरकारी योजनाएँ मुफ़्त अनाज दे रही हैं, तब तक हज़ार रुपए की टिकट पर परदे वाला राष्ट्रवाद देखना एक लोअर-मिडिल क्लास रिसर्च स्कॉलर के लिए घाटे का सौदा है। इतने में तो कम से कम पाँच दिन के राशन-पानी का जुगाड़ हो जाएगा। इसलिए मैंने ‘द पैलेस सिनेमा’ की शरण ली, जो कम से कम आम आदमी की फटी जेब और उसकी पुरानी जर्जर साख का सम्मान करना जानता है। फिर भी ‘धुरंधर’ मेरे द्वारा देखी गई अब तक की सबसे महँगी फ़िल्म थी—टिकट क़ीमत तीन सौ रुपए। दो महीने पहले इतने पैसों में ‘Avtar: Fire & Ash’ देख के आ गया था, वो भी IMEX बेंगलुरु में।
‘द पैलेस’—सिविल लाइंस की हृदयस्थली में खड़ा सिनेमाघर ख़ुद में इतिहास की एक धूल भरी किताब है। 20वीं सदी की शुरुआत में जब एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार ने इसकी नींव रखी, तब यह केवल चलचित्रों का घर नहीं, बल्कि कला का गढ़ था। सुना है—‘द पैलेस’ सिनेमाघर यहाँ का सबसे पुराना सिनेमाघर है। शुरुआत में यह नाटकों के मंचन के लिए इस्तेमाल होता था। 1950 में पृथ्वीराज कपूर ने इसमें ‘पैसा’ नाटक का मंचन कराया था। स्टेज शो में तेजी बच्चन, हरिवंशराय बच्चन, अमिताभ बच्चन, मुकेश, मन्ना डे, उत्तम कुमार भी आ चुके हैं। 1924 में जब यहाँ फ़िल्मों के प्रदर्शन की शुरुआत हुई, तब केवल अँग्रेज़ी भाषा में क्लासिक फ़िल्में दिखाई जाती थीं। उन दिनों इसमें बार भी हुआ करता था। 1955 के बाद इसमें हिंदी फ़िल्में भी दिखाई जाने लगीं। फिर दो शो हिंदी फ़िल्मों के और दो अँग्रेज़ी फ़िल्मों के निर्धारित किए गए। 1970 से इसमें पूरी तरह हिंदी फ़िल्में ही दिखाई जाने लगीं और वही परंपरा अब भी अनवरत जारी है। यहाँ नाटकों का वह दौर गुज़रा है, जब अभिनय में आत्मा बसती थी, प्रोपेगेंडा का शोर नहीं। आज भी इसकी वास्तुकला में वो पुरानी चमक और नक़्क़ाशी उस बीते हुए दौर की गवाही देती है, जब सिनेमा—संस्कृति का हिस्सा था, केवल पैसा कूटने की मशीन नहीं। ख़ैर, पैलेस सिनेमा में खेले गए उन नाटकों और इसके स्थापत्य की दास्तान फिर कभी, आज तो चर्चा उस ‘धुरंधर’ की करते हैं, जिसने पूरे देश के ‘सेंस’ और ‘सेंसर’ दोनों को मथ डाला है।
जब ‘धुरंधर’ दिसंबर 2025 में रिलीज हुई, तो इसने भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर सफलता के ऐसे झंडे गाड़े कि मेकर्स के हौसले सातवें आसमान पर पहुँच गए। तब बुद्धिजीवियों का एक दल इसे अपनी तकनीकी सटीकता के कारण ‘कलात्मक सिनेमा’ का प्रमाण पत्र बाँट रहा था, तो दूसरा इसे पाकिस्तान और आतंकवाद के नाम पर ‘प्रोपेगेंडा’ की सबसे परिष्कृत फ़ैक्ट्री बता रहा था। इस फ़िल्म ने कराची के ‘ल्यारी’ [Lyari] गैंगवार और आईएसआई [ISI] के गठजोड़ की एक ऐसी दुनिया रची जिसने दर्शकों के भीतर एक तीव्र प्रतिशोध की भावना जागृत की। ‘धुरंधर’ की अपार सफलता और उस पर उपजे वैचारिक ध्रुवीकरण के बाद ‘धुरंधर पार्ट 2’ के लिए जो हाइप क्रिएट की गई, वह किसी चुनावी लहर से कम नहीं थी। उसी उत्सुकता और ‘सिनेमाई देशभक्ति’ के दबाव में, एक अदना-सा रिसर्च स्कॉलर होने के नाते मुझे भी आज पैलेस सिनेमा की उन ऐतिहासिक कुर्सियों पर बैठना पड़ा।
‘धुरंधर द रिवेंज’ दरअस्ल पहली फ़िल्म का ही अगला अध्याय है, ठीक वैसे ही जैसे एक सरकारी फ़ाइल दूसरी से नत्थी होती है। फ़िल्म की अवधि लगभग 4 घंटे [229-235 मिनट] है, जो वर्तमान युग में दर्शकों के धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर निर्देशक आदित्य धर चाहते, तो वह इस कथा को 10-12 घंटों की एक विस्तृत वेब सीरीज बनाकर ओटीटी [OTT] पर रिलीज कर सकते थे, लेकिन यहाँ मेकर्स की ‘मार्केट स्ट्रैटेजी’ की दाद देनी होगी। उन्हें पता था कि आज भारत और दुनिया भर में जिस तरह का माहौल है, उसमें सामूहिक रूप से ‘दुश्मन के घर में घुसकर मारने’ वाली कहानियों की माँग इतनी है कि इसे एक ‘इवेंट फ़िल्म’ बनाकर थिएटर में भुनाना ही असली मुनाफ़ा है। उन्होंने इस मौक़े को बख़ूबी भुनाया है।
फ़िल्म में ऐतिहासिक और वर्तमान घटनाओं का जो तड़का लगाया गया है, वह आदमी को असली और परदे के बीच भ्रमित करने के लिए पर्याप्त है। 1999 का IC-814 हाईजैक, 2001 का संसद हमला और 2008 का 26/11 मुंबई हमला—इन राष्ट्रीय त्रासदियों के वास्तविक फ़ुटेज और संदर्भों को काल्पनिक कहानी में ऐसे पिरोया गया है कि दर्शक भूल जाता है कि वह सिनेमा देख रहा है या न्यूज़ चैनलों की पुरानी क्लिपिंग्स का कोलाज। फ़िल्म इन घटनाओं का उपयोग दर्शकों के ‘ब्लड प्रेशर’ को राष्ट्रवाद के नाम पर बढ़ाने के लिए करती है। यहाँ तक कि ‘नोटबंदी’ [Demonetisation] को जाली नोटों के रैकेट और आतंकवाद की कमर तोड़ने वाले एक ‘रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक’ के रूप में दिखाकर वर्तमान राजनीतिक विमर्श को सिनेमाई मोहर लगा दी गई है। परदे पर नायक जब यह तर्क देता है कि नोटबंदी ने जाली नोटों के रैकेट को ख़त्म कर दिया, लेकिन फ़िल्म उस ज़मीनी हक़ीक़त पर मौन का लेप लगा देती है—जहाँ 99% से अधिक नकदी वापस बैंकों में आ गई थी, मानो काला धन गंगा नहाकर पवित्र हो गया हो। फ़िल्म हमें यह तो दिखाती है कि हमने डिजिटल भुगतान करना सीख लिया, लेकिन उन छोटी दुकानों और छोटे व्यवसायों की ‘शव-यात्रा’ का ज़िक्र छोड़ देती है जो इस आर्थिक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ में वीरगति को प्राप्त हुए। यह ‘नया इतिहास’ है, जहाँ अर्थव्यवस्था मंदी के वेंटिलेटर पर हो सकती, लेकिन परदे पर राष्ट्रवाद का ऑक्सीजन सिलेंडर हमेशा फ़ुल रहना चाहिए।
किरदारों की बात करें तो आदित्य धर ने ‘असली’ और ‘नक़ली’ के बीच की रेखा को लगभग मिटा दिया है। आर. माधवन द्वारा अभिनीत अजय सन्याल का किरदार सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की छवि पर गढ़ा गया है—वही गंभीर मुद्रा, आँखों पर चश्मा [जिसमें तिरंगा झलकता है] और ‘Preserve the evidence, hopefully a politician comes in the future who will act’ जैसे संवाद, जो सीधे तौर पर 2014 के सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा करते हैं। रणवीर सिंह का हमज़ा/जसकीरत सिंह रंगी का किरदार पठानकोट के सिख जाँबाज़ की याद दिलाता है, जो अपनी वेशभूषा और लंबे बालों के साथ ल्यारी के अंडरवर्ल्ड में घुसकर उसे तबाह करने वाला काल्पनिक मसीहा बन जाता है। अर्जुन रामपाल का मेजर इक़बाल [ISI] का किरदार डेविड कोलमैन हेडली के उस असली हैंडलर से प्रेरित है, जिसका ज़िक्र एफ़बीआई [FBI] की फ़ाइलों में मिलता है। यहाँ तक कि यूपी के गैंगस्टर ‘अतीफ़ अहमद’ [अतीक अहमद से प्रेरित] का समावेश इसे समकालीन अपराध गाथा से जोड़ देता है।
तकनीकी रूप से फ़िल्म में पैसा पानी की तरह बहाया गया है। विकास नौलखा की सिनेमैटोग्राफ़ी [Cinematography] कराची की तंग गलियों के तनाव को ऐसे पकड़ती है, जैसे कोई जासूस अपनी साँसें थामे खड़ा हो। शाश्वत सचदेव का बैकग्राउंड स्कोर इतना भारी है कि कमज़ोर दिल वालों को लगता है कि गोलियाँ परदे पर नहीं, उनके कान के बग़ल से गुज़र रही हैं। संगीत में ‘तम्मा-तम्मा’ जैसे पुराने गानों का उपयोग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि रॉ और ग्रिटी माहौल को रचने का एक टूल है।
अब सवाल यह है कि क्या यह फ़िल्म प्रोपेगेंडा है? यदि प्रोपेगेंडा का अर्थ किसी विशेष विचारधारा का महिमामंडन और तथ्यों को सुविधानुसार एक ख़ास चश्मे से पेश करना है, तो यह फ़िल्म उस कसौटी पर शत-प्रतिशत खरी उतरती है। फ़िल्म की ‘ईमानदारी’ का असली ‘करिश्मा’ तो तब दिखता है, जब यूपी का एक माफ़िया, जिसे व्यवस्था का शिकार नहीं बल्कि ‘न्यू इंडिया’ का ख़लनायक बनाया गया है, झुंझलाकर अपनी तबाही का श्रेय सीधे दिल्ली के ‘चाय वाले’ को दे देता है—“इस चाय वाले ने हमें बर्बाद कर दिया!” यह संवाद सिनेमाई क्रिएटिविटी नहीं, बल्कि सत्ता के चरणों में चढ़ाया गया एक ऐसा ‘पुष्प’ है, जिस पर सिनेमा हॉल की तालियाँ किसी चुनावी विजय जुलूस का भ्रम पैदा कर देती हैं। इसके साथ ही ‘ऑपरेशन ग्रीन लीफ़’ जैसे चैप्टर फ़िल्म के प्लॉट में ऐसे पिरोए गए हैं कि फ़िल्म किसी पार्टी के घोषणापत्र का हाई-डेफ़िनिशन वर्जन लगने लगती, जहाँ कला सिर्फ़ प्रोपेगेंडा की ढाल बनकर रह जाती है। यह फ़िल्म एक ‘नया इतिहास’ रचने का प्रयास कर रही है, जहाँ वास्तविक घटनाओं को काल्पनिक प्रतिशोध का जामा पहनाकर सामूहिक चेतना को ‘इजरायल-शैली’ के हमलों से संतुष्ट किया जाता है।
पैलेस सिनेमा के उस वैचारिक और बारूदी धमाके से निकलकर मैं वापस अपने हॉस्टल [Sir PCB Hostel] आ गया हूँ। 4 घंटे की उस ‘धुरंधर’ की मास्टरपीस प्रोपेगेंडा और इतना सब कुछ लिखने के बाद दिमाग़ की बची-खुची रचनात्मक ऊर्जा सूख गई है, अब रिसर्च टॉपिक का पहला चैप्टर जो महीनों से लिख रहा हूँ, लेकिन लिखा नहीं जा रहा, लिखने की हिम्मत नहीं बची है। इतिहास पढ़ना आसान है, पर परदे पर रचा जा रहा ‘नया इतिहास’ पचाना बहुत थकाऊ काम है। अगर आपने इतना सब पढ़ लिया और आपने मूवी भी देख ली तो बताइए आपको क्या लगता है?
अगर अभी तक आपने यह फ़िल्म नहीं देखी, और इसे देखने जाने का मन हो तो दिल्ली की मुख्यमंत्री के शब्दों में कहूँगा कि मूवी देखने ‘अपने रिस्क पर आएँ’।
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