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लीलाधर जगूड़ी

1940 | टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

समादृत कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

समादृत कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

लीलाधर जगूड़ी के उद्धरण

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भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।

बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।

मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।

बसंत के अंतरतम में, पतझर भी आवाज़ देता हुआ अपना आकार ले लेता है।

कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है।

नए विषयों की उद्‌भावना के लिए, किसी भी रचनाकार को हमेशा खुले मन और खुले दिमाग़ से संसार की हर चीज़ से मिलना चाहिए। सांसारिक यथार्थ और लौकिक परमार्थ के बिना कोई कवि नहीं हो सकता।

कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा, बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे-खासे अनुभव होने चाहिए।

अगर मैं साहित्य के संपर्क में आता, तो मैं संभवतः एक अपराधी हो जाता।

मैं अनुभव और भाषा का आज़ाद ग़ुलाम हैं।

ऑक्टेवियो पाज़ ने कहा है कि प्रत्येक पाठक एक दूसरा कवि है।

किसी चीज़ की हताशा भी किसी चीज़ का अस्तित्व-बोध कराती है।

साहित्य अच्छे आदमी का निर्माण संभवतः इसी तरह करता है कि वह अपने से जुड़ने वाले को अन्यायी, अपराधी और निरर्थक ईर्ष्याओं का पात्र नहीं बनने देता।

कवि को दुश्चरित्रों, दुश्शीलों, पतितों, अटकों, भटकों और अपराधियों तक के प्रति, मानवीय ज़िम्मेदारी और करुणा से भरा हुआ होना चाहिए।

रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।

अकेलापन साहित्य में व्यक्ति की मानसिक मरम्मत करता है।

इतिहास के लिए जो इतिहास में घुसे हुए रहते हैं, वे कविता क्षेत्र में अपने होने के इतिहास से वंचित हो जाते हैं। कहीं एक जगह जमा वर्तमान ही अतीत बन जाता है।

कवि की संवेदना को अनुभवसिद्ध होना आवश्यक है, वरना बिना कीमत चुकाए मुफ़्त की कविताई यशस्वी नहीं हो सकती।

अगला जन्म अगर होता है, तो मैं उसमें भी कवि होना चाहूँगा—सबसे बेहतर कवि। अन्यथा ख़ुद से तो बेहतर होना ही चाहूँगा।

ज़िंदगी बहुत-सी चीज़ों के काम आती है, इसीलिए आत्महत्या के भी काम आई एक दिन—जैसे अपनी मृत्यु ही सारी चीज़ों पर अंतिम पर्दा हो।

अच्छी कविता और अच्छे कवियों की सोहबत व्यक्तित्व में तब्दीलियाँ लाती है।

अपने को अपने कर्म में खोजो और उसी में प्रतिफल भी दिखेगा।

प्रतिष्ठित और प्रचलित, दोनों के विरुद्ध अपना रास्ता निकालना—हर बार चुनौतियों भरा होता है।

चीज़ें स्वभावतः सब अच्छी नहीं होतीं, उन्हें अच्छा बनाना पड़ता है। यह तभी संभव है, जब सबसे पहले अपनी ख़राबी और कमज़ोरी का बोध हो।

मैं ख़ुद को भुला देने के लिए फिर एक नई कविता रचता हूँ, और फिर उससे आगे किसी और नई कविता की ओर बढ़ जाता हूँ। मैंने अब तक क्या-क्या सोचा, किया और लिखा—उसे याद रखता हूँ, पर दोहराता नहीं हूँ।

उजाले का अभाव ही अँधेरा है।

साहित्य की जटिलता, ढाँचे और प्रभाव; दोनों स्तरों पर शुरू से ही मौजूद रही है, इसीलिए ख़ासकर कविता की समझदारी के लिए, अपने भीतर 'शीघ्र बोध' भी पैदा करने का ज्ञानात्मक अभ्यास विकसित करना पड़ता है। सरलीकरण और अतिरंजना से तभी छुटकारा पाया जा सकता है।

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