लीलाधर जगूड़ी की संपूर्ण रचनाएँ
कविता 17
उद्धरण 27
ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।
मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।