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श्याम मनोहर

श्याम मनोहर के उद्धरण

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आलोचक को दार्शनिक होना पड़ता है। ऐसे दार्शनिक आलोचकों के होने पर पाठक अनाथ हो जाता है, लेखक अनुशासनहीन हो जाते हैं।

मज़े में ख़ुशहाल होकर जीना है, तो डिस्कवर नहीं हो सकते।

जिस सभ्यता में सीधा-सादा आम आदमी भी खोज करने की क्षमता रखता है, वह सभ्यता महान है।

हमारी संस्कृति की यह तत्काल ज़रूरत है कि हम अपने आम पाठक की बौद्धिक-मानसिक दशा, अपने अँग्रेज़ी पाठक के व्यक्तित्व की बुनावट और पाठ-प्रक्रिया का अनुसंधान करें और उपायों की खोज करें।

किसी के आगे का लेखन करने का मतलब है—अज्ञात की खोज करना।

जब धर्म, दर्शन, विविध शास्त्र ललित साहित्य के पुस्तकों को पढ़ने की प्रक्रिया पारिवारिक परिक्षेत्र में आरंभ होगी, तब परिवार में ज्ञान-प्रक्रिया का भी आरंभ होगा। परिवार से ही कवि, लेखक, वैज्ञानिक, कलाकार निर्माण होते हैं।

परंपरा वही होती है, जिसमें व्यक्ति और समाज के भीतर कला, शास्त्र, दर्शन आदि के गहन प्रश्नों के बारे में कौतूहल कार्यरत होता है।

आलोचना साहित्य के विषय के बारे में बोलती है; अंतर्वस्तु के बारे में नहीं, रूप के बारे में तो बिलकुल ही नहीं। समीक्षकों को चाहिए कि बुद्धि की बाजी लगाकर समीक्षा के प्रमेयों की खोज करें।

सभ्यता का कथा-साहित्य कालबाह्य हो सकता है, संस्कृति का कथा-साहित्य कभी कालबाह्य नहीं होता—वह अभिजात होता है।

कुतूहल, कल्पनाशक्ति और चेतना, मनुष्य को मनुष्य होने के लक्षण हैं। कुतूहल, कल्पनाशक्ति, चेतना के लक्षणों के कारण मनुष्य खोज करता है।

विज्ञान और कला की अपेक्षा, आम आदमी को फिक्शन ज़्यादा निकट का प्रतीत होता है।

सभ्यता का अर्थ है—जीने का तरीक़ा, जीने की व्यवस्था।

जीवन-शैली इस तरह बनानी चाहिए कि हमें डिस्कवरर होना है। इस बात का एक छोटा-सा धागा ही क्यों हो, अपने तन-मन में होना चाहिए।

जिस समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व होता है, उस समाज में कथा-साहित्य फलता-फूलता है।

व्यवस्था ठीक हो तो प्रक्रिया भी ठीक से होती है, लेकिन अव्यवस्था हो तो विचार भटक जाते हैं।

कविता भावना, बुद्धि के स्तर पर रहती है। शारीरिक स्तर पर असर नहीं करती।

भारत की भूमि आध्यात्मिक है। हर एक व्यक्ति आध्यात्मिक है और हवा ऐसी है कि हर एक को कभी कभी अध्यात्म करना है। इतना कि कोई भी व्यक्ति स्वीकार करता है कि जीवन में अध्यात्म ही अहम है, और बाक़ी सबकुछ बाद में है।

अच्छा गद्य-लेखन भावनाओं-विचारों का ऐश नहीं कर सकता। अच्छा गद्य-लेखक बेमज़ा, उबाऊ ज़िंदगी जीता है। जोशीला गद्य-लेखक, झूठी-मूठी काव्यात्मकता वाली और मूल को मतलब में रूपांतरित करने वाली भाषा बनाता है।

संस्कृति की ताक़त प्रतिभावान और आम आदमी की बौद्धिकता के रेज़ोनन्स पर निर्भर करती है।

कौतूहल होना, उत्सुक होना—जीने की सर्वोत्तम स्थिति है।

भाषा कथा-साहित्य का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

अपने काम में डूबने वाला आदमी ख़ूबसूरत होता ही है, और संस्कृति को भी ख़ूबसूरत बना देता है।

डिस्कवरी के लिए ही कल्पकता की बाज़ी लगानी होती है।

अध्यात्म एक स्वतंत्र प्रेरणा है। उसका विकारों के साथ सीधा संबंध नहीं है।

प्रयोग करना कल्पनाशक्ति का कार्य होता है।

धारणा का सूझना पर्याप्त नहीं है। उसे सिद्ध करना होता है। सिद्धता के लिए विचारों का अनुशासन अनिवार्य है।

पढ़ना मनुष्य की भूख, प्यास की तरह प्राकृतिक क्रिया नहीं है। पढ़ना कौशल का काम है और उसे कमाना पड़ता है।

अभिरुचि के पैदा होने का मतलब है—परंपरा का पैदा होना।

अभिजात साहित्य की ओर नहीं मुड़ता।

कविता हमें भाषा अर्क़ देती है। भाषा के अर्क़ को जानने के लिए कविता बेहद उपयुक्त साहित्य-रूप है।

श्रेष्ठ कविता सृष्टि, विश्व-जीवन में जो अज्ञात है, ऐसा कुछ तो खोज है। यही कविता की अंतर्वस्तु है।

एकांत में आदमी के विद्रूप होने की चर्चा या संभावना होती है।

कथा-साहित्य जीवन को चेतना देता है।

जो समाज भाषा के सुख को समझता है, उस समाज में कथा-साहित्य फूलता-फलता है।

उत्क्रांति का तत्त्व है, जो समर्थ है वह बचेगा।

मनुष्य की सबसे बड़ी जिज्ञासा, जीवन का अर्थ क्या है, सृष्टि का अर्थ क्या है—इन प्रश्नों के बारे में होती है। जीवन का अर्थ क्या है, सृष्टि का अर्थ क्या है जैसे मूलभूत प्रश्नों की खोज करने को मैं संस्कृति कहता हूँ।

कविता का तात्पर्य है—खोजने की प्रणाली।

मनुष्य की कितनी भी बदहाली हो; श्रेष्ठत्व क्या होता है, इसे वह जानना चाहता है—क्योंकि वह जीवन का गुणधर्म है।

हम जब चालीस को पार करते हैं, तब ज्ञान-क्षेत्र शब्द से संपर्क होता है। तब कहते हैं कि बहुत देर हो गई, पहले ही पता होना चाहिए था।

बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि कला, शास्त्र, दर्शन जैसे गहन प्रश्नों का संधान कर, सीधे नागरिकों तक पहुँचना चाहिए—तभी लोकशाही सिद्ध होगी।

कुंठा के जाने का अर्थ है—स्वतंत्रता।

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