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मैं जेन-ज़ी के बारे में ग़लत थी

मुझे अपनी पीढ़ी से बहुत उम्मीद नहीं बची थी और जेन-ज़ी से तो शायद उससे भी कम। मुझे लगता था कि इंस्टाग्राम, रील्स और अपने छोटे-से डिजिटल संसार में मस्त इस पीढ़ी की ज़िंदगी में सार्वजनिक सवालों के लिए बहुत जगह नहीं बची है। राजनीति से उसका रिश्ता मीम तक है और प्रतिरोध से सोशल मीडिया पोस्ट तक... लेकिन मैं ग़लत थी।

25 जुलाई 2026 को इन युवाओं ने मेरे भीतर केवल अपनी पीढ़ी को लेकर बनी धारणा नहीं बदली, लोकतंत्र को लेकर लगातार कम होती मेरी उम्मीद भी लौटा दी।

यह उम्मीद एक दिन में ख़त्म नहीं हुई थी। किसान आंदोलन के बाद से वह धीरे-धीरे कम होती गई थी। बार-बार मन में सवाल आता था—क्या हम वाक़ई आज़ाद हैं? क्या हम सचमुच एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं? क्या सरकार से सवाल करने के हमारे सारे तरीक़े धीरे-धीरे ख़त्म होते जा रहे हैं?

पिछले वर्षों में कई आंदोलनों को शुरू होते ही दबते देखा। विरोध के सामने सत्ता और भय का ऐसा चेहरा दिखाई दिया कि समाज के भीतर धीरे-धीरे एक अजीब चुप्पी उतरती गई। ऐसा नहीं था कि हमें ग़लत दिखाई देना बंद हो गया था। हमें सब दिखाई देता था—दूषित पानी पीकर लोगों का मरना, हिंदू-मुसलमान के नाम पर लोगों को लड़ाया जाना, पुलों का भरभराकर गिरना, पेड़ों और पहाड़ों का कटना और प्राकृतिक संसाधनों का भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते जाना।

हम देखते थे। हमें पता था कि यह ग़लत है। फिर भी हम चुप रहते थे।

शायद डर से भी अधिक इसके पीछे एक ना-उम्मीदी थी—बोलकर क्या होगा? आवाज़ उठाकर आख़िर बदल क्या जाएगा?

धीरे-धीरे हम अपनी त्रासदियों के भी अभ्यस्त होते गए। कोई घटना होती, कुछ दिन शोर रहता, सोशल मीडिया पर मीम बनते और फिर हम अगली घटना की ओर बढ़ जाते। कई बार लगता था कि हमारा समाज अपनी त्रासदियों को भी मीम में बदलकर उनसे पीछा छुड़ाने लगा है।

नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की घटनाओं को देखते हुए मेरे मन में अक्सर एक सवाल उठता था—भारत में ऐसा जन-प्रतिरोध कब दिखाई देगा? और इस सवाल के साथ एक डर भी था। कहीं हमारे युवा भी पड़ोसी देशों की तरह हिंसा का रास्ता न चुन लें। क्या लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता से सवाल करने और उसे जवाबदेह बनाने की गुंजाइश अब भी हमारे पास बची है?

20 जुलाई 2026 का दिन अगर मेरे लिए लोकतंत्र को लेकर निराशा का दिन था, तो 25 जुलाई उम्मीद की वापसी का।

उस दिन लगा कि लोकतंत्र अभी पूरी तरह निष्प्राण नहीं हुआ है। हममें अब भी इतना माद्दा बचा है कि सत्ता से सवाल कर सकें, जवाबदेही माँग सकें और अपनी माँग पर अडिग रह सकें। जिस जेन-ज़ी को लेकर मेरी राय इतनी सतही थी, उसी ने मेरे भीतर यह विश्वास फिर पैदा किया कि समाज अभी ज़िंदा है।

मेरे लिए भारत हमेशा गांधी का देश रहा है। गांधी यहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, प्रतिरोध की एक पद्धति हैं—असहमति, अहिंसा, सत्याग्रह और सत्ता के सामने बिना डरे अपनी बात पर टिके रहने की पद्धति। हम गांधी को कितनी भी बार मारें, गांधी का विचार बार-बार किसी दूसरी जगह से उठ खड़ा होता है।

सैंतीस दिनों की इस लड़ाई में कई बार मुझे डर लगा। जब भी मध्यस्थता या बातचीत की बात सामने आती, लगता कि कहीं आंदोलन अपने परिणाम तक पहुँचने से पहले किसी समझौते में समाप्त न हो जाए। कहीं ये युवा भी वही राजनीतिक भाषा न बोलने लगें, जिससे हम वर्षों से परिचित हैं। कहीं मूल सवाल पीछे न छूट जाए... लेकिन यहाँ भी मैं ग़लत साबित हुई।

कॉकरोच जनता पार्टी अपनी मूल माँग पर टिकी रही। एक समय के बाद आंदोलन सोनम वांगचुक, अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास, रत्ना, नेहा  जैसे चेहरों से भी बड़ा दिखाई देने लगा। वह उन युवाओं का आंदोलन बन गया जो शायद पहली बार इतने स्पष्ट रूप में कह रहे थे कि सत्ता में होना जवाबदेही से मुक्त होना नहीं है।

इस आंदोलन ने युवाओं और सत्ता के संबंध की कई दूसरी परतें भी खोलीं। प्रधानमंत्री को लेकर जो नाराज़गी शायद अब तक बंद कमरों में व्यक्त होती थी, वह सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आई। मुख्यधारा के मीडिया को लेकर युवाओं के भीतर कितना अविश्वास जमा हो चुका है, वह भी दिखाई दिया। उसकी भाषा कई बार तीखी, असहज और अस्वीकार्य भी हो सकती है; लेकिन उसके पीछे मौजूद असंतोष को केवल भाषा के आधार पर ख़ारिज नहीं किया जा सकता।

हम जानते हैं कि एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से पूरी व्यवस्था नहीं बदल जाएगी। लेकिन शायद इस आंदोलन की उपलब्धि केवल एक इस्तीफ़ा है भी नहीं। इसकी वास्तविक उपलब्धि है—जवाबदेही का स्थापित होना। यह एहसास कि सत्ता से पूछा जा सकता है—क्यों? यह कहा जा सकता है कि ग़लती हुई है तो उसकी ज़िम्मेदारी तय हो और अगर बहुत-से लोग एक सवाल के साथ लगातार खड़े रहें, तो सत्ता को उस सवाल की ओर देखना पड़ सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का सातवाँ श्लोक है :

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

इस श्लोक को मैं यहाँ धार्मिक उद्घोष की तरह नहीं, उम्मीद के एक पुराने रूपक की तरह याद करती हूँ। जब अन्याय बहुत शक्तिशाली और स्थायी दिखाई देने लगे, तभी उसके प्रतिरोध की संभावना सबसे अधिक आवश्यक हो जाती है। 25 जुलाई 2026 ने मेरे भीतर उसी संभावना को फिर से जीवित किया है।

और शायद इस पूरे आंदोलन से मेरी सबसे निजी उपलब्धि भी यही है—जिन युवाओं से मुझे उम्मीद नहीं थी, उन्होंने मुझे फिर से उम्मीद करना सिखाया।

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संगीता मनराल विज और पढ़िए : सतलुज : बहता हुआ इतिहास

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