राधावल्लभ त्रिपाठी के उद्धरण
वेदों में जीवन के संपूर्ण आनंद, उमंग और उल्लास की सबसे बेहतरीन कविताएँ हैं, पर मृत्यु के बारे में भी सबसे ज़्यादा और सबसे मार्मिक कविताएँ या सूक्त भी इन्हीं वेदों में हैं—अत्यंत घनीभूत विषाद की संकुल छायाओं में गुँथी कविताएँ।
हमारे साहित्य के इतिहास की वह एक स्वर्णिम घड़ी रही होगी, जिसमें निराला ने छंदों के बंधनों को तोड़ कर जूही की कली की मुस्कान, उसके खिलने और चटक उठने को कविता में बिखेर दिया।
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आत्मसंस्कृति ही शिल्प है। इस शिल्प के द्वारा मनुष्य सारे संसार को छंदोंमय बना लेते हैं।
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निर्मल जी अंतिम अरण्य में जो संसार रचते हैं, वह मृत्यु को परे ठेलने में लगे पात्रों का संसार है।
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पुत्र का अपने पिता की प्रतिकृति जैसा प्रतीत होना—इस अभिप्राय का प्रयोग भी वाल्मीकि ने ही प्रारंभ किया।
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मृत्यु के विकराल जबड़ों से बाहर निकल कर अमरता का संधान ही छंदस् है।
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संबंधित विषय : मृत्यु
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वस्तुतः करुणा और स्नेह के साथ-साथ, वाल्मीकि मनुष्य की दुराधर्षता और अपराजेयता के भी महान गायक हैं।
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बहस के स्वरूप को लेकर जितनी बहस संस्कृत के शास्त्रकारों ने की है, उतनी कदाचित् संसार की किसी अन्य भाषा के साहित्य में नहीं मिलेगी।
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प्रेम की चरम परिणति दांपत्य में, स्त्री-पुरुष के प्रेम में प्रस्फुटित होती है। स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के सहभाव से परिपूर्ण बनते हैं, यही बात सीता और राम के प्रसंग में वाल्मीकि ने कई बार कही है।
शास्त्रीय वाङ्मय ही नहीं; रामायण, महाभारत, कालिदास, भवभूति और बाणभट्ट जैसे कतिपय महाकवियों को छोड़ दें, तो लगभग सारा का सारा संस्कृत साहित्य ही पुरुषवादी दृष्टि और पुरुष के वर्चस्व के आख्यान से रचा हुआ है।
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वाल्मीकि और व्यास के अनुशीलन के बिना; भारतीय इतिहास, परंपरा और संस्कृति की सही समझ पैदा नहीं हो सकती।
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समाज के द्वंद्र के कारण सीता और राम का दांपत्य, स्थूल स्तर पर खंडित होता है—हृदयसंवाद खंडित नहीं होता।
किसी स्त्री ने न्यायसूत्र या वात्स्यायनभाष्य जैसा कोई शास्त्रग्रंथ रचा हो, ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। उपनिषत्काल के बाद शास्त्रार्थ में स्त्री विस्मृत हाशिए पर है। किसी कोने से उसकी आवाज सुनाई देती है, पर वह जब कभी अपने अवगुंठन से बाहर निकल कर आती है तो एक विकट चुनौती सामने रखती है और दुरंत प्रश्न उठाती है।
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वाल्मीकि ने यथार्थ की ठोस बंजर ज़मीन पर चलते हुए, उस पर जीवन की महनीय आदर्शों का प्रासाद खड़ा किया है।
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मनुष्य की मनस्तत्व की परीक्षा में वाल्मीकि, संस्कृत कवियों में सर्वाधिक निपुण हैं।
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मनुष्य की मनस्तत्त्व की परीक्षा में वाल्मीकि संस्कृत कवियों में सर्वाधिक निपुण हैं।
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मनुष्य हृदय की जटिल भावनाएँ, वैर और कठोरता की पर्तों के भीतर छिपा हुआ स्नेह और कोमलता—वाल्मीकि में व्यंजित हो उठते हैं।
कुछ शास्त्रार्थ ऐसे भी हुए जिनमें स्त्री उपस्थिति की आँच अभी भी मंद नहीं हुई है। यह भी बहुधा हुआ है कि स्त्री अकेली होने के बावजूद, अपनी प्रखरता और तेजस्विता में पुरुष समाज को हतप्रभ कर देती है।
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वाल्मीकि ने मनुष्य के अंतर्मन के उत्ताप और कामना के असीम ज्वार का दर्शन किया है, पर उन्होंने हृदय की पवित्रता और कोमलता को झुलसने नहीं दिया है।
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रामायण में सीता राम के लिए पाथेय और प्राप्तव्य ही नहीं, वह उसके जीवन की संपूर्ण नियति को निर्धारित करने वाली सजीव शक्ति है।
बृहदारण्यक उपनिषद् में; याज्ञवल्क्य के साथ जनक की सभा में, उस समय के सबसे बड़े ज्ञानियों के साथ बहस को गार्गी ने ब्रह्मोद्य कहा है।
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जीवन की गहरी पकड़ तथा कविदृष्टि के साथ वाल्मीकि ने दिखलाया है कि मनुष्य अपने जीवन के घात-प्रत्याघात, नियति के थपेड़ों तथा दूसरों के द्वारा दिए जाने वाले उत्पीड़न से किस प्रकार जूझता तथा अपने संघर्ष में अंततः उबरता है।
जगत में जो कुछ भी भव्य, रमणीय और कोमल है; उस पर तो वाल्मीकि की दृष्टि पड़ी ही है, साथ ही जो कुछ भी प्रचंड और विस्तीर्ण है, उसे भी उन्होंने अपनी कविदृष्टि का विषय बनाया है।
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भारतीय काव्यचिंतन में रस तथा ध्वनि की परिकल्पनाएँ, वाल्मीकि जैसे कृती रचनाकार के काव्य से ही उद्भूत हुई हैं।
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संबंधित विषय : रामायण
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वाल्मीकि और कालिदास दोनों ही उस क्षेत्र के अन्वेषक हैं, जहाँ जीवन के कर्दम में से स्वतः शतदल खिल उठते हैं। तुलसी जीवन के ललित पक्ष से बचकर रामभक्ति में आश्वासन खोजते हैं अथवा नीतिवादी शब्दावली में उसे धिक्कारते हैं।
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जिन समाजों में नारी अपनी मुक्ति के लिए छटपटा रही थी, उनमें द्रौपदी को अपने लिए प्रेरणा और मुक्ति का प्रतीक माना गया।
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सीता, तारा और मंदोदरी, पुरुषों के वर्चस्ववाले समाज में अपने वाणी की ऊर्जा से अपने लिए स्थान बनाती हैं।
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वाल्मीकि में पहली बार लोक-जीवन में रची-बसी कविता की सृष्टि हुई और वेद के बाद पहली बार छंद का एक नया या एक भिन्न स्तर पर अवतरण हुआ।
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धर्मशास्त्र में तीन ऋण बताए गए : देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण, पर मातृऋण भी हो सकता है—इस पर कहीं कोई विचार धर्मशास्त्रकारों ने नहीं किया।
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वाल्मीकि में मनुष्य को अपना उद्धार स्वयं ही करना है, तुलसी में उसका उद्धार करने के लिए राम हैं।
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संस्कृत के समाज में शास्त्रार्थ की शताब्दियों की परंपरा है; पर उसमें स्त्री की भूमिका पर बात कम हुई है, स्त्री की भूमिका भी कहीं है तो वह उपेक्षित रही है।
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वाल्मीकि के कवि रूप का आकलन सुकर कार्य नहीं है। शिल्प के स्तर पर वे नितांत प्रचलित, लोकभाषा में व्यवहृत शब्दों को उनकी सप्राणता और सहजता की क्षति किए बिना, अकल्पित सामर्थ्य से भर देते हैं।
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अपनी दुर्बलताओं के कारण विनाश को प्राप्त होते हुए मनुष्य की गरिमा को भी, वाल्मीकि ने क्षति नहीं पहुँचाई है।
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वाल्मीकि ने अपनी मानवीय दृष्टि द्वारा उस युग में स्त्री-पुरुष के साहचर्य की प्रतिष्ठा की।
अभिव्यंजना की दृष्टि से सरल से सरल भाषा में; अर्थ की कई-कई लयें एक साथ झँकृत करने की क्षमता के साथ, वैदिक युग से इतिहास काल तक के लंबे समय के अंतराल को निरूपित करते हुए, भारतीय चेतना की पहचान कराने का काम—व्यास के साथ केवल वाल्मीकि ही संपन्न कर सके हैं।
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द्रौपदी के द्वारा जो शास्त्रार्थ उठाया गया, उसका एक स्पष्ट निर्णय यह भी है कि पाप या अन्याय करने वाला ही पापी नहीं होता, उस पाप या अन्याय पर चुप रहनेवाला भी पापी होता है।
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वाल्मीकि और तुलसी हमारी संस्कृति की दो पृथक अंतर्धाराओं के श्रेष्ठ कवि हैं।
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संबंधित विषय : संस्कृति
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होमर और वाल्मीकि को उन्हीं के विशिष्ट संदर्भों के बीच जाँचने पर हम देखते हैं कि दो महान संस्कृतियों का अंतराल इन दोनों महान कवियों को अलग कर देता है।
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