नॉस्टेल्जिक दौर में माँ (स्त्री) की भूमिका
सुधांशु कुमार
22 जनवरी 2026
प्रस्तुत लेख ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित ‘बेला’—‘सदी की आख़िरी माँएँ’, प्रणव मिश्र तेजस के लेख की प्रतिक्रिया में लिखा गया है। ‘सदी की आख़िरी माँएँ’ (मूल लेख) प्रथम—23 नवंबर को ‘हिन्दवी’ पर प्रकाशित हुआ। इसे दुबारा ‘दैनिक भास्कर’ ने—‘हिन्दवी’ से विशेष अनुबंध के तहत—संपादित रूप (‘हमने देखी हैं इस बदलती सदी की आख़िरी माँएँ!’) में 28 दिसंबर 2025 को प्रकाशित किया। इस पर एक और प्रतिक्रिया-लेख—स्त्री और माँ—(श्रुति कुमुद) इससे पूर्व भी आप पढ़ चुके हैं।
‘हिन्दवी’ पर प्रणव मिश्र तेजस का लेख ‘सदी की आख़िरी माँएँ’ पढ़ा। भावुकता से लबरेज़ यह लेख लोकप्रिय कोटि का है। लेख में माँ को केंद्र में रखकर स्त्री की भूमिका पर चर्चा की गई है। स्त्री की भूमिका तय करते समय लेखक ने जगह-जगह भावुकता का सहारा लिया है। ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि बिना भावुक हुए सांस्कृतिक विकास के हरेक चरण में स्त्री की भूमिका पर ठहरकर बात की जाए। स्त्री की भूमिकाओं को लेकर हरेक दौर में ज़ोरदार बहस होती आई है। दिनकर संस्कृति के जिन चार चरणों को प्रस्तुत करते हैं, सुविधा के लिहाज़ से मैं भी उन्हीं चरणों के मार्फ़त अपनी बात की शुरुआत करना चाहता हूँ।
सांस्कृतिक विकास के आरंभिक चरण में स्त्री और माँ की भूमिका को लेकर ज़ोरदार बहस देखने को मिलती है। बहस के केंद्र में हैं देवताओं की माता अदिति। ऋग्वेद की ऋचाओं से पता चलता है कि अदिति ने माँ के लिए तय की गई भूमिका का उल्लंघन किया था, इसलिए जन्मत्रयी के तत्त्ववेत्ता ने उन्हें और उनके पुत्र को फटकार लगाई। जो भी स्त्री माँ के लिए तय की गई भूमिका से भटकेगी, उसको पितृसत्ता के एजेंट द्वारा डाँट-फटकार सुननी पड़ेगी। चाहे वो ‘सदी की आख़िरी माँएँ’ हों या फिर सहस्त्राब्दी की पहली माँ ही क्यों न हो? पितृसत्ता के एजेंटों द्वारा स्त्री को लगाई जाने वाली डाँट-फटकार, सांस्कृतिक विकास के दौर का एक सनातनी रिवाज है। इसका पहला लिखित साक्ष्य ऋग्वेद में देखने को मिलता है। इस संदर्भ में चतुर्थ मंडल का ‘इंद्र-वामदेव-अदिति संवाद’ [गंगा सहाय शर्मा (सं.), ऋग्वेद, पृ. : 707-708] को देखा जाना चाहिए। इस संवाद में पितृसत्ता का एजेंट स्त्री की भूमिका को सीमित कर रहा है। ‘इंद्र-वामदेव-अदिति संवाद’ न सिर्फ़ माँ की भूमिका को सीमित करता है, बल्कि बच्चों की दुनिया में माँ की भूमिका पर भी प्रश्न खड़ा कर देता है। यह प्रश्न कुछ उसी तरह का है जिसे लगभग तीन हज़ार साल बाद पश्चिम के पुरुष मनोविश्लेषणवादियों (सिगमंड फ़्रायड, ज़ाक लकाँ आदि) ने माँ की भूमिका पर उठाया था। वैसे गंभीरता से पड़ताल की जाए तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि इस तरह के प्रश्न समय-समय पर उठते रहे हैं। ख़ैर! पहले ‘इंद्र-वामदेव-अदिति संवाद’ का अवलोकन करते हैं।
वामदेव ‘ऋग्वेद’ के चतुर्थ मंडल के सूक्तद्रष्टा हैं। यह गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्त्ववेत्ता हैं। वेद के अनुसार सामान्य मनुष्यों की भाँति जन्म न लेने की इच्छा से इन्होंने माता का उदर फाड़कर उत्पन्न होने का निश्चय किया। आसन्न मृत्य से भयभीत माता ने अदिति का आह्वान किया। अदिति अपने योग्य पुत्र इंद्र के साथ आती हैं। वामदेव अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। इंद्र उनसे तत्त्वज्ञान की चर्चा कर रहे हैं और वामदेव गर्भ से प्रतिउत्तर देते हुए अपनी नाराज़गी दर्ज करा रहे हैं। वह इस बात से नाराज़ हैं कि अदिति ने माँ के लिए तय की गई भूमिका का उल्लंघन किया है। वामदेव फटकारते हुए इंद्र से यह सवाल करते हैं कि जब अदिति ने सैकड़ों मास तक आपको सूतिका गृह में रखा तब आपने यह नियम के प्रतिकूल कार्य क्यों होने दिया? वामदेव माँ के गर्भ/सूतिका गृह से शीघ्र इसलिए निकलना चाहते हैं क्योंकि उन्हें बाहर आकर कई युद्ध लड़ने हैं, वाद-विवाद करना है। यानी उसे जल्द से जल्द शारीरिक और मानसिक रूप से बलवान बनना है।
इस बहस में यह बात अनुस्यूत है कि शारीरिक और मानसिक रूप से बलवान बनाने की भूमिका माँ की नहीं है। इसलिए वामदेव जल्द से जल्द माँ से मुक्ति चाहते हैं। यहाँ वामदेव पितृसत्ता के उस एजेंट के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो बच्चों के विकास में माँ की भूमिका को खारिज करते हैं। जब वामदेव माँ की भूमिका को सीमित कर रहे थे, बच्चों के विकास में माँ की भूमिका को खारिज कर रहे थे, तब इस संवाद में अब देवताओं की माँ अदिति की इंट्री होती है। अदिति बिफरते हुए वामदेव से मुख़ातिब होती हैं। पितृसत्ता के एजेंट वामदेव के आख्यान का प्रतिपक्ष रचती हुई अदिति कहती हैं कि जिसे तुम प्रतिकूल कार्य कह रहे हो, उसी प्रतिकूल कार्य की वजह से आज इंद्र इतना शक्तिशाली और सामर्थ्यवान बन पाया। पाँचवें श्लोक में अदिति कहती हैं कि—“अँधेरे सूतिका गृह में पैदा होने वाले अपेक्षाकृत कमज़ोर और निंदनीय इंद्र को माता अदिति ने परम शक्तिशाली बनाया। इतना सामर्थ्यवान बनाया कि उसकी आभा पृथ्वी और आकाश तक फैल गई।”
यहाँ अदिति माँ की भूमिका को रेखांकित कर रही हैं। बीसवीं सदी की स्त्रीवादी चिंतकों ने अपनी इन्हीं पुरखिनों से प्रेरणा ग्रहण कर पुरुष मनोविश्लेषणवादियों के सामने बच्चों के विकास में माँ की भूमिका को चिह्नित किया होगा।
सांस्कृतिक विकास के दूसरे चरण में भी स्त्री की भूमिका पर पर्याप्त बहस हुई है। दुनिया को नई राह दिखाने वाले बुद्ध भी स्त्री की भूमिका तय करने में पुरानी लीक ही पीटते नज़र आते हैं। चाहे संघ में स्त्रियों को प्रव्रजित करने को लेकर होने वाली बहस हो या फिर ‘अट्ठ-गुरु-धम्म’ (अष्ट गुरु धर्म) पर सशर्त मिलने वाली प्रव्रज्या। इस चरण में तथाकथित मुक्ति पा चुकी बौद्ध भिक्षुणियों की भूमिका सदी की आख़िरी माँओं वाली ही है। कुकुर काटे तो काटे लेकिन अपने कर्तव्य से च्युत नहीं होना है। क्या हुआ पति ने ही तो पीटा है... प्यार भी तो वही करता है। सुमंगलमाता, मुक्ता सरीखी दर्जनों ऐसी भिक्षुणी हैं जो परिवार में होने वाले जेंडर आधारित शोषण और भेदभाव से त्रस्त आकर संघ में शामिल तो होती हैं, किंतु यहाँ भी भिक्षुओं के सामने वे द्वितीयक नागरिक ही हैं।
बुद्ध ने उनकी हदें तय कर दी हैं। लिखित साक्ष्यों से पता चलता है कि तमाम नियमों और उपनियमों के दरम्यान संघ में भिक्षुणियों पर यौन-पहरेदारी भी रखी जाती थी। भिक्षुणियों को खुले में शौच करने की हिदायत दी गई। अनुशासन की टोकरी कहे जाने वाले ‘विनयपिटक’ में भिक्षुणियों के लिए नियम बनाते हुए बुद्ध कहते हैं—“भिक्षुणियों को पाख़ाने में शौच नहीं जाना चाहिए। अनुमति देता हूँ, नीचे (भूमिपर) खुले और ऊपर से छाये (स्थान में) शौच जाने की।” राहुल सांकृत्यायन इसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं—“उस समय भिक्षुणियाँ पाख़ाने में शौच जाती थीं, षड्वर्गीया भिक्षुणियाँ वहीं गर्भ गिराती थीं।” (राहुल सांकृत्यायन, विनयपिटक, पृ. : 539) भिक्षुणियाँ कहीं स्वैराचार में लिप्त न हो जाएँ इसलिए गौतम बुद्ध उन पर यौन-पहरेदारी रखने की अनुमति देते हैं। संघ में भिक्षुणियों को भिक्षुओं से दूर रहने की भी हिदायत दी जाती थी। स्त्रियों पर इस तरह से नियंत्रण रखने के संकेत बाद में लिखे गए हरेक ग्रंथों, संहिताओं में मिलने लगे। ब्राह्मण ग्रंथों ने तो यहाँ तक कहा कि स्त्रियों को सदा किसी न किसी के नियंत्रण में रहना चाहिए। ‘मनुस्मृति’ के पाँचवें अध्याय के 148वें श्लोक से हम सब परिचित हैं—
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने।
पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतंत्रताम्।।
[गिरिजाप्रसाद द्विवेदी (सं.), मनुस्मृति, पृ. : 185]
मनु कहते हैं कि स्त्री बचपन में पिता की आज्ञा, युवावस्था में पति की आज्ञा और वृद्धावस्था में पति के पुत्रों की आज्ञा में रहे परंतु स्वतंत्रता का कभी भोग न करे। सदी की आख़िरी माँओं से भी यही अपेक्षा की जा रही है। जब प्रणव लिखते हैं कि अम्मा सदैव घर में क़ैद रहने वाली महिला हैं, जिन्होंने कभी आज़ादी के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। गोया लेखक यह वाक्य सिर्फ़ लिख ही नहीं रहा है बल्कि यह उसकी अप्रतिम चाहना भी है।
आज़ाद ख़याल महिलाओं के संदर्भ में कुछ इसी तरह की चाहना सांस्कृतिक विकास के हरेक दौर में देखने को मिलती है। भक्ति आंदोलन के तमाम संतों ने पितृसत्ता के मानकों पर न ख़री उतरने वाली स्त्री को पानी पी-पीकर कोसा है। वर्ण-व्यवस्था के पोषक तुलसी ने ताड़ने की बात कही तो वहीं वर्ण-व्यस्था पर लगातार प्रहार करने वाले कबीर ने भर्त्सना के क्रम में हिंदी समाज को यह सिखाया है कि स्वच्छंद स्त्रियों के लिए किन-किन गालियों का प्रयोग किया जा सकता है। हिंदी का पुरुष समाज कबीर द्वारा दिखाए गए तमाम अच्छे रास्ते भले ही भूल गया हो किंतु स्वच्छंद स्त्रियों के संदर्भ में ‘कामिन, नागिन, डाकिन, रंडी’ आदि का उच्चारण करना नहीं भूला। दिलचस्प है कि साधना और अध्यात्म के क्षणों में जो पुरुष कवि अपने आराध्य के सामने ख़ुद को स्त्री के रूप में प्रस्तुत करता है, वही कवि स्त्री को डाँटने, फटकारने का कोई मौक़ा नहीं चूकता। इन्हें आधी आबादी से दिक़्क़त नहीं है, बल्कि आधी आबादी के उस हिस्से से दिक़्क़त है जो इनके बनाए मानक पर ख़री नहीं उतर रही। सांस्कृतिक विकास के हरेक दौर में स्त्री को पितृसत्ता ने अपनी कसौटी पर कसने का प्रयास किया।
सांस्कृतिक विकास के चौथे चरण में भी स्त्रियों से यह अपेक्षा की गई कि वे पितृसत्ता द्वारा तय की गई भूमिकाओं का निर्वहन ईमानदारी से करें। उन्नीसवीं सदी के पुरुष सुधारक ठीक उसी तरह की माँ को गढ़ रहे थे, जिनके विलुप्त होने से प्रणव दुखी हैं। इस मायने में प्रणव मिश्र तेजस के विचार 100-150 साल पहले के विचार से अक्षरशः मेल खाते हैं। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध की तमाम पत्रिकाएँ इस बात की गवाही देते हुए मिल जाएँगी। भारतीय स्त्रियों की भूमिकाओं के संदर्भ में उन पत्रिकाओं का यह मजमून होता था कि स्त्री अपनी संतानों का ठीक ढंग से लालन-पालन करना जानती हों, सिलाई-बुनाई-कताई में सिद्धस्त हों, किफ़ायत से घर चलाने का हुनर जानती हों, घर के सभी सदस्यों एवं अतिथियों का मन से सेवा-सत्कार करने की कला जानती हों। सुबह सबसे पहले उठें और सबके बाद सोएँ। तेजस जी के शब्दों में कहूँ तो सुबह सूरज को उठाकर उठना और जुगनुओं को सुलाकर सोना। उन पत्रिकाओं में स्त्री को क्या करना चाहिए ही नहीं लिखा होता था बल्कि क्या करने से बचना चाहिए; इसके भी संकेत दे दिए जाते थे। मसलन—भारतीय स्त्री को अँग्रेज़ी मैमों की तरह पार्टी नहीं करनी चाहिए, अँग्रेज़ी मैमों की तरह के फ़ैशन की रंगीन दुनिया में नहीं फँसना चाहिए। प्रणव भी कुछ ऐसी ही हिदायत देते हुए दिखते हैं।
प्रणव अपने लेख में सिर्फ़ सदी की आख़िरी माँओं का महिमामंडन ही नहीं करते बल्कि दो-तीन जगह प्रगतिशील समाज की स्त्रियों को आड़े हाथों लेने का भी प्रयास करते हैं। गोया प्रगतिशीलता पिछड़ेपन की निशानी हो। प्रगतिशील समाज की स्त्रियों के माध्यम से प्रणव शायद उग्र-नारीवादी विचार से प्रेरित स्त्रियों की आलोचना प्रस्तुत करना चाहते हों। यह अनायास नहीं है कि इन स्त्रियों की आलोचना के ठीक बाद बिना ब्लाउज की स्वच्छंद व निर्भीक भाव से विचरण करने वाली दाई नमूदार होती है। लेखक जिस दाई को प्रगतिशीलता का विशेष स्तर छूने वाली के रूप में प्रस्तुत करते हैं, दरअस्ल वे दाईयाँ पितृसत्ता की वह एजेंट हुआ करती थीं जिनका काम ‘सदी की आख़िरी माँओं’ को गढ़ना होता था। अब जिसने पितृसत्ता का गंभीर व गुरुतर कार्य सँभाल रखा हो, उसका सम्मान मुर्हट्ट से मुर्हट्ट आदमी क्योंकर न करें।
संयुक्त परिवार की व्यवस्था में ऐसी एक-दो दाईयाँ हर परिवार में पाई जाती हैं जिनका काम महिलाओं को पितृसत्ता की हितों के अनुरूप ढालना होता है। बाज़ार एवं पूँजी की इस नई दुनिया में जैसे-जैसे संयुक्त परिवार की व्यवस्था कमज़ोर होती जा रही है, वैसे-वैसे पितृसत्ता की पकड़ परिवार व्यवस्था से ढीली पड़ती जा रही है। ऐसे समय में पितृसत्ता अपनी जकड़ को और मजबूत करने के लिए एक नए मॉडल की तलाश में है। दिलचस्प है कि इस नए मॉडल में नयापन जैसा कोई तत्त्व नहीं है। वही पुराने घिसे-पिटे फ़ार्मूले को नए रैपर में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस फ़ार्मूले का केंद्रीय तत्त्व है—नॉस्टेल्जिक एवं अतीतजीवी होकर माँओं को याद करना, सदी की आख़िरी माँ के ख़त्म होने पर करुण क्रंदन करना।
अतीतजीविता पितृसत्ताक सामंती समाज का अचूक हथियार है। सतयुग के स्वप्न बेचकर और कलियुग का भय दिखाकर दुनियाभर के तमाम प्रतिगामी नियम-क़ानून बनाए गए। जब भी कोई अतीत को बेचने का प्रयास करता है तो उसे संदेह की नज़र से ही देखना चाहिए।
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बेला पॉपुलर
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