डर के साथ झूठ और औचित्य भी आते हैं, जो चाहे कितने भी विश्वसनीय क्यों न हों; हमारे आत्म-सम्मान को कम कर देते हैं।
आप अपनी आंतरिक शक्ति का जितना ज़्यादा इस्तेमाल करेंगे, उतनी ही ज़्यादा शक्ति को अपनी ओर आकर्षित करेंगे।
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आत्मज्ञान, कार्यों का सभारंभ, तितिक्षा, धर्म में स्थिरता—ये सब गुण जिसको उद्देश्य से दूर नहीं हटाते, उसी को पंडित कहा जाता है।
बुद्धत्व का आगमन किसी नेता या गुरु द्वारा नहीं होता, आपके भीतर जो कुछ है उसकी समझ द्वारा ही इसका आगमन होता है।
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हम अपने ऊपर राज करें वही स्वराज्य है और वह स्वराज्य हमारी हथेली में है।
आप बिना किसी पुस्तक को पढ़े या बिना साधु—संतों और विद्वानों को सुने अपने मन का अवलोकन कर सकते हैं।
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ख़ुद की तलाश का रास्ता हमेशा परेशानियों और अनिश्चितताओं से ही भरा रहता है।
आत्म-मूल्य को बढ़ाने के लिए आपको अपने जीवन में लगातार मूल्य जोड़ते रहना होगा।
ख़ुद से झूठ बोलना बंद कर दीजिए तो आपके सामने सच का अगाध सागर होगा और आपके लिए मुक्ति के द्वार खुल जाएँगे।
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आत्मस्वरूप को भूलकर जो अहंभाव उठता है वही अहंकार है, जो विकार से त्रिगुण को क्षुब्ध करता है।
अंततः सबसे अच्छी क़िस्मत वह होती है, जिसे आप ख़ुद बनाते हैं।
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अनुरोध करो, किंतु हुक्म करने मत जाओ। कभी भी निंदा न करो, किंतु असत्य को प्रश्रय मत दो।
स्वयं ठीक रहकर सभी को सतभाव से ख़ुश करने की चेष्टा करो, देखोगे सभी तुम्हें ख़ुश करने की चेष्टा कर रहे हैं। सावधान! निजत्व खोकर किसी को ख़ुश करने नहीं जाओ, अन्यथा तुम्हारी दुर्गति की सीमा न रहेगी।
आपके पास ऐसा मन होना चाहिए जो पूर्णतः: अकेले होने में समर्थ हो, तथा जो दूसरे व्यक्तियों के अनुभवों और प्रचार से बोझिल न हो।
तुम सच्ची दोस्ती, असली जुड़ाव, अडिग प्रेम के हकदार हो और जब तुम उसे चुनते हो तो दुनिया बदल जाती है।
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आत्म-प्रेम के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, लेकिन चलिए इसे स्पष्ट करते हैं:- ये स्वार्थ नहीं है, ये ठीक उसका उल्टा है।
जो व्यक्ति स्वयं को कीड़ा बना ले; वह बाद में शिकायत नहीं कर सकता, यदि लोग उस पर पैर रख दें।
उन लोगों के लिए बार-बार उपलब्ध होना बंद करो, जिन्हें तुम्हारे होने में कोई दिलचस्पी नहीं।
जितना ज़्यादा तुम ख़ुद को उस भूमिका में फ़िट करने की कोशिश करते हो, उतना ही तुम उन रिश्तों और उस समुदाय से दूर होते हो, जो सच में तुम्हारे लिए बने हैं।
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आपको किसी के लिए विकल्प बनकर कभी नहीं रहना चाहिए।
तुम सबके लिए नहीं हो और सब तुम्हारे लिए नहीं हैं—यही बात असली लगाव को इतना दुर्लभ और क़ीमती बनाता है।
आत्मगौरव चरित्र-संशोधन की पहिली सीढ़ी है। मनुष्य में चरित्र की पवित्रता की अंतिम सीमा भी यही है।
आत्मगौरव एक प्रकार का साधन है, जिसे बचाए रखना सहज काम नहीं है।
अगर कोई तुम्हें नज़रअंदाज़ करता है, अपमान करता है, या भूल जाता है—तो उनके लिए अपना समय और अपनी ऊर्जा ख़र्च करना बंद करो।
ज़रा से जीर्ण रूपों को, रोग से क्षीण शरीरों को और काल से ग्रस्त आयु को देखकर किसे अभिमान हो सकता है!