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इश्क़, इंक़लाब और इलाहाबाद

पुराने शहर के पुराने इलाहाबादियों के पास थोक के भाव में नेहरू-गांधी ख़ानदान के क़िस्से हैं—जैसे-जैसे गंगा खिसककर यमुना के पास जाती रही, ठीक वैसे ही इलाहाबादियों ने इन गुज़रे क़िस्सों में स्वादानुसार नयापन मिलाकर इन्हें और पुराना बना दिया है। आज भी पुराने कांग्रेसी या फिर उधर चौक, लोकनाथ, अहियापुर, रानीमंडी के पुराने शहर के ख़ालिस इलाहाबादी नेहरू-गांधी परिवार से लेकर बच्चन तक की बातें एक अलग ही ऐतिहासिक अधिकार के साथ बताते हैं। इनमें किसी ख़ानाबदोश का दिल्ली दरबार तक पहुँचना भी है तो कुछ असंभव-सी प्रेम कहानियाँ भी हैं, लेकिन सबसे ख़ूबसूरत हैं पुराने शहर के चप्पे-चप्पे पर ब्रिटिश शासन का मख़ौल उड़ाए जाने के इंक़लाबी क़िस्से… वो किस्से, जो आज भी किताबों से आज़ाद हैं, लेकिन इलाहाबाद के चौक, चबूतरों, गलियों और पेड़ों तक पर हर संभव शोधपरक संभावनाओं के साथ दर्ज हैं।

जैसे इंदौर में है पटियाबाज़ी, कानपुर में चिकाईबाज़ी, वैसे ही इलाहाबादियों में एक कला है—लड़तरानी। इन सारी क़िस्सागोई की कलाओं का बहुत कुछ लेना-देना सामंतवाद की वजह से उपजी कुंठा से भी है, लेकिन इनमें लोक-संस्कृति का अपना एक दूसरा पक्ष भी निहित है। यहाँ ठेठ इलाहाबादी में कुछ शब्द हैं, जैसे बकैती, लड़तरानी या फिर गहरेबाज़ी, जिसका शाब्दिक एवं सांस्कृतिक अभिप्राय सिर्फ़ एक इलाहाबादी ही समझ और समझा सकता है; किसी बाहरी के लिए ये सब वैसे ही है जैसे सरकारी दफ़्तरों के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस।

ख़ैर, यहाँ जिस विशेष क़िस्सागोई के उमड़ते हुए आर्टफ़ॉर्म का ज़िक्र होने जा रहा है, वह है लड़तरानी। बेशक, इस शब्द को चर्चित और स्वीकृत कराने का श्रेय तिग्मांशु धूलिया जी को ही जाता है, लेकिन जनप्रिय मंचों पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व महामंत्री बाबा अभय अवस्थी इस विधा के झंडाबरदार, या यूँ कहें कि पोस्टर बॉय बनकर उभरे हैं। इसलिए उन्हीं की ज़ुबानी एक क़िस्सा प्रस्तुत है—आज़ादी की लड़ाई का, बिल्कुल ख़ालिस इलाहाबादी ज़ायक़े में :

बाबा अभय अवस्थी सीधे उतर जाते हैं 1930 के इलाहाबाद में। वो इलाहाबाद, जो असहयोग आंदोलन और आज़ाद की शहादत के बाद आज़ादी की लड़ाई का कंट्रोल रूम या यूँ कहें वॉर रूम बन चुका था। नेहरू जी इलाहाबाद के मेयर रह चुके थे, 1923 से 1925 तक; और तो और, लाहौर अधिवेशन में नेहरू जी की रावी को हाज़िर-नाज़िर मानकर ली गई पूर्ण स्वराज की शपथ से पूरा इलाहाबाद सुर्ख होकर उबल रहा था। जगह-जगह मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से ब्रिटिश राज की मुकम्मल ख़िलाफ़त की जा रही थी; इलाहाबादी अंदाज़ में कोई यकायक किसी भी सार्वजनिक मंच पर तिरंगा फहरा देता, तो कोई शरारती तरीक़ों से यूनियन जैक और ‘लॉन्ग लिव द क्वीन’ की अवहेलना करता और फिर शाम तक ज़मानत ले आता। इलाहाबाद में इस तरह की लड़तरानी की आज़माइश में पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री जी काफ़ी आगे रहते थे…

ख़ैर, 1933-34 आते-आते लाहौर अधिवेशन के आह्वान का असर उभरने लगा था। पूरे भारत में जहाँ-तहाँ, जब-तब तिरंगा फहराया जाने लगा—क्या गाँव, क्या शहर; क्या मुंबई, क्या मद्रास, और क्या मालाबार और क्या ही मुर्शिदाबाद… हर दिशा, हर दशा में तिरंगा प्रतिकार का प्रामाणिक प्रतीक बनता जा रहा था। लेकिन नेहरू जी के ख़ुद के शहर में वो माहौल बन नहीं पा रहा था। इलाहाबादी आदमी हल्की-फुल्की मुख़ालफ़त का तलबगार तो कभी रहा ही नहीं, उसको हर चीज़ में भौकाल चाहिए; हनक और ठसक तो होनी ही चाहिए।

फिर क्या था, नेहरू जी भी खाँटी इलाहाबादी ठहरे। कर दिया ऐलान, हो गया आह्वान… फ़लाँ दिन, फ़लाँ समय, इधर-उधर नहीं, सीधे शहर के दिल में तिरंगा फहराया जाएगा। बात ये हुई कि नियत तारीख़ पर नेहरू जी ख़ुद आज के पुराने शहर इलाहाबाद के चौक के घंटाघर पर विद्यमान यूनियन जैक को उतारेंगे और ठीक वहीं अपना तिरंगा ध्वज फहरा देंगे। इधर नेहरू जी के हवाले से उद्बोधन हुआ, उधर पूरा इलाहाबाद अफ़वाहों से गर्म और दमन की आशंका से सर्द होने लगा था…

सारे शहर की निगाहें आनंद भवन से घंटाघर की दूरी नापने में लगी थीं और ब्रिटिश राज इस दूरी को अंतहीन बनाने में मुस्तैद हो रहा था।

बाबा अभय अवस्थी बताते हैं कि फिर जब वो दिन आया तो फिर क्या ही दिन आया। आनंद भवन के इर्द-गिर्द क़ब्ज़ा जमाए पानवाले पल-पल की लाइव कमेंट्री करते। बातें वहाँ से तैरतीं—कटरा, विश्वविद्यालय, कचहरी से होती हुई लोकनाथ पहुँचतीं, फिर वहाँ से आगे घंटाघर से टकराकर अफ़वाह में तब्दील होकर वापस आनंद भवन आ जातीं। ये आँखों देखी बातों की रेल पूरे इलाहाबाद का चक्कर काटकर सारे शहर को आज़ादी का मुसाफ़िर बनाए रखने में लगभग कामयाब हो रही थी।

दिन चढ़ते ही नेहरू जी आनंद भवन में ही नज़रबंद कर दिए गए और घंटाघर कई घेरों के चक्रव्यूह में बदल गया। अब पंडित जी निकलें कैसे और फिर वहाँ पहुँचें तो पहुँचें कैसे…

तय समय आते-आते सारे शहर का दिल टूटने लगा था, पानवालों का गला भी सूखने लगा था और उधर घंटाघर, चौक, लोकनाथ, अहियापुर, रानीमंडी की इमारतों की छतें भी खाली होने लगी थीं। इलाहाबाद नाउम्मीद हो रहा था। पंडित नेहरू आनंद भवन की बालकनी में हाथों को पीछे किए तेज़ क़दमों से चक्कर पर चक्कर मारे जा रहे थे और हाँ! इंदिरा जी की वानर सेना के कुछ अति-उत्साही साथी तमाम ज़रूरी बातें आनंद भवन तक आयात कर रहे थे।

ज्यों ही वो समय आया, घंटाघर की सुई अपनी मंज़िल पर पहुँचने को हुई और घंटा बजने के ठीक पहले वाला रुदन शुरू करने ही वाला था कि ऊपर चौक के आसमान में एक हरकत-सी हुई। अँग्रेज़ सिपाहियों के सिर उठने से पहले और तमाम इलाहाबादियों की आँखों में चमक आने के दरमियानी वक़्त में यूनियन जैक के ठीक ऊपर एक तिरंगा उड़ रहा था। बेशक, ये एक तिरंगानुमा पतंग थी, लेकिन इस पतंगबाज़ की क़ाबिलियत का क़ायल पूरा इलाहाबाद तब हुआ, जब ठीक नियत समय पर घंटा बजते ही वो तिरंगानुमा पतंग एकदम सटीक तौर पर घंटाघर के ऊपर लगे यूनियन जैक पर आ गिरी।

सारा शहर जाग उठा… और ख़ालिस इलाहाबादी में “फहर गवा, फहर गवा” का उद्घोष चंद लम्हों में घंटाघर से सीधे आनंद भवन तक पहुँच गया था। ब्रिटिश राज इस बार गांधी के सत्याग्रह या आज़ाद की पिस्तौल से नहीं, बल्कि इलाहाबादी ‘बकैती’ से हारा था। हर तरफ़ बस एक ही सवाल था—“कऊन रहा उ पतंगबाज़?”

शाम तक पुराने शहर के चौराहों और चाय के अड्डों से “कौनो फ़िरोज़ पारसी रहान” की आश्वस्त खोजी पत्रकारिता आनंद भवन तक आ पहुँची थी और अब नेहरू जी भी आश्चर्यजनक तौर पर इस फ़िरोज़ पारसी से जल्द से जल्द मिलना चाहते थे। ये काम सौंपा गया इंदिरा जी की वानर सेना के विश्वस्त किशोर सिपाहियों को।

बाबा अभय अवस्थी बताते हैं कि चंद दिनों में जब वानर सेना के एक सिपाही, जिन्होंने ख़ुद उन्हें ये सारा क़िस्सा सुनाया था—के साथ फ़िरोज़ आनंद भवन पहुँचे तो नेहरू जी ऊपर किसी काम में व्यस्त थे। दरवाज़ा इंदिरा जी ने खोला और वहीं इंदिरा और फ़िरोज़ की पहली मुलाक़ात हुई।

इस मुलाक़ात ने आज़ाद भारत की राजनीति और सत्ता की गुड़ा-भाग को कितनी गहराई तक प्रभावित किया, ये तो ठीक-ठीक या तो राजनीति विज्ञान के शोधार्थी बता सकते हैं या बता सकते हैं आनंद भवन के चारों ओर उस दौर में क़ाबिज़ रहने वाले वो पानवाले—जो इंदिरा और फ़िरोज़ के इश्क़ के क़िस्से वैसे ही इंदिरा जी के जाने के दशकों बाद तक सुनाया करते थे, जैसे वो उस दिन घंटाघर पर तिरंगा फहराए जाने की आँखों देखी की क़िस्सागोई से समूचे इलाहाबाद को आज़ाद कर रहे थे…

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