भगोरिया : होली का हाट, भागकर शादी करने का पर्व नहीं
रक्षा पंड्या
28 फरवरी 2026
भाया कावळियाँ लाय दो जी,
कावळियाँ पेरीनऽ मी तो भोंगर्यों देखूँगा।
यह एक निमाड़ी गीत है। मध्य प्रदेश के निमाड़ और मालवा अंचल में यह गीत काफ़ी लोकप्रिय है। इस गीत के माध्यम से बहन अपने भाई से मनुहार करती है कि भाई! मुझे चूड़ियाँ ला दो। मैं उन्हें पहनकर भगोरिया हाट जाऊँगी।
इन दिनों संपूर्ण निमाड़ और मालवांचल में ‘भगोरिया’ की धूम है। भगोरिया भील जनजाति अंचलों में लगने वाला एक प्रमुख हाट है, जो कि होली के एक सप्ताह पहले नियत तिथियों में झाबुआ, आलीराजपुर, धार आदि चिह्नित प्रमुख ज़िलों में आयोजित होता है।
निमाड़ अंचल के खरगोन, बड़वानी सहित अन्य भील, भिलाला, बारेला, पटलिया बहुल क्षेत्रों में भी भगोरिया के प्रति विशेष उत्साह देखा जाता है। भगोरिया को भंगर्या, भगुरिया, भौंगर्या आदि नामों से भी जाना जाता है।
मेरा ननिहाल निमाड़ अंचल के बड़वानी ज़िले में है। निमाड़ मध्य प्रदेश का भील जनजाति बहुल अंचल है। इसी अंचल के बड़वानी ज़िले में भगोरिया हाट का विशाल आयोजन किया जाता है।
इस हाट के ठाठ देखते ही बनते हैं। यह एक फ़सलीय उत्सव है, जो रबी की फ़सल पकने और नया अन्न घर में आने की ख़ुशी में एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। उत्सव के दौरान जनजातीय जन अपनी पारंपरिक वेशभूषा में नाचते गाते, माँदल और ढोल वाद्य की थाप पर थिरकते हुए अपनी परंपरा का उत्सव मनाते हैं। कह सकते हैं कि मस्ती और संस्कृति इन दोनों का मेल-मिलाप भगोरिया है।
भोंगर्या म जावांगा नऽ झांझर्या लेवाडूँगा,
असा झाँझर्या पेरीनऽ मी तो छम छम नाचूँगा
गीत में बहन भाई से कहती है कि भैया! मुझे भगोरिया हाट से पायल ला दो। जब मैं वह पायल पहनूँगी, तो उसके रुनझुन स्वर पर थिरक-थिरक कर नृत्य करूँगी। प्रस्तुत पंक्तियों में बहन, भाई से केवल पायल नहीं माँग रही, बल्कि भगोरिया के उस आनंद में सहभागी होने की अपनी आकांक्षा भी व्यक्त कर रही है।
भगोरिया हाटों में ‘डोहिया नृत्य’ किया जाता है। युवक-युवतियाँ आमने-सामने खड़े होकर विभिन्न प्रकार से अंग-संचालन करते हुए कभी आगे बढ़ते, कभी पीछे हटते हैं तो कभी दायीं-बायीं ओर झुककर झूमते हुए नृत्य करते हैं।
जनजातीय संस्कृति के समस्त रंगों के दर्शन इस हाट में होते हैं। भगोरिया में दैनिक जीवन से जुड़ीं सभी वस्तुओं तथा होली पर्व की ख़रीदारी भी होती हैं। गुड़ की जलेबी, भजिये, खारिये (सेंव), पान और कुल्फ़ी इस हाट के विशेष व्यंजन हैं।
होटल म जाऊँगा न भजल्या मिरी खाऊँगा
असा भजल्या खाइ न मी तो मोटली देखाऊँगा
बहन हँसते हुए कहती है कि वह हाट में होटल जाएगी और वहाँ भजिये तथा मिर्ची खाएगी। भजिये खाकर वह हष्ट-पुष्ट दिखने लगेगी। उसके इस कथन में स्नेह, चंचलता और बाल-सुलभ उत्साह झलकता है।
भगोरिया हाट में भाग लेने की तैयारियों के लिये एक हाट इसके एक सप्ताह पूर्व लगता है। इसे ‘तिहवारया या त्योहारिया हाट’ (त्योहार पूर्व की हाट) कहा जाता है। प्राचीन समय में इन हाट-बाज़ारों में गुलाल उड़ाया जाता था, इसलिए इन्हें ‘गुलालिया हाट’ भी कहा जाता है। होली के बाद उजाड़िया हाट लगने की परंपरा भी है।
आयो रे भाया, भंगर्यो आयो
तेवार्यो, गुलाल्यो, भंगर्यो आयो
माना जाता है कि भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के कालखंड में हुई थी। तत्कालीन भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में मेले की शुरुआत की। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी यह मेला लगने लगा। कालांतर में स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे।
लोक मान्यता अनुसार, भगोरिया शब्द भील जनजाति के भगोर देव के नाम पर अथवा भील जन पर शैव (भग-शिव, गौर-पार्वती) के प्रभाव के कारण प्रचलित है।
इतिहासकारों के अनुसार, झाबुआ से क़रीब सात-आठ किमी दूर भृगु ऋषि की तपस्थली भगोर है। लगभग साढ़े सात सौ साल पहले यहाँ सघन बस्ती हुआ करती थी। प्राकृतिक अकाल की वजह से बस्ती पूरी तरह से उजड़ गई। भगोर के लोग जाकर रतलाम में बस गए। इसलिए तब से एक कहावत प्रचलित हुई कि ‘भाग्यो भगोर और बसियो रतलाम।’
इस घटना के बाद वहाँ के आम जनों ने मिलकर भगवान शिव और पार्वती की पूजा की। भव-गौरी का मंदिर नेगड़ी नदी के पास मदन तालाब के किनारे स्थित है। उसी के आधार पर भगोर का नामकरण हुआ।
क़रीब 450 साल पहले जो भग्गा नायक शासक था, उसने भगोर को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। प्रतिवर्ष यहाँ होली के पहले हाट बाज़ारों में पूजन के लिए मेला आयोजित किया जाने लगा। यही मेला जो भगोर का हाट था, वह भगोरिया कहलाने लगा। तब से यह हाट पलवाड़, मेघनगर, थांदला, पेटलावद से होते हुए रतलाम और धार क्षेत्र तक फैला। दूसरी तरफ़ निमाड़ अंचल में बड़वानी और खरगोन तक पहुँच गया।
कालांतर में भगोर के भील धार जिले की कुक्षी तहसील के ग्राम वाणधा, आगर व घटबोरी में जाकर बस गए और इन्हें ही ‘भगुरिया भील’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा।
भगोरिया हाट को लेकर तथाकथित मीडिया समूहों और ‘छपास’ प्रवृत्ति के लेखकों द्वारा लंबे समय से एक भ्रम फैलाया जाता रहा है कि यह ‘भागने का उत्सव’ है, जहाँ से युवक-युवतियाँ एक-दूसरे को पान खिलाकर या भगाकर ले जाते हैं। आम जनमानस के बीच भी यह धारणा बना दी गई है कि भगोरिया का मूल स्वरूप ही प्रणय और पलायन से जुड़ा है।
जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। आदिम जाति कल्याण विभाग की अनुसंधान एवं विकास संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक़, भगोरिया होली के अवसर पर मिलने-जुलने और सामूहिक नृत्य-संगीत से प्रसन्नता मनाने का अवसर है। स्टडी में पाया गया कि भगोरिया से कोई भी युवक किसी भी युवती को भगाकर नहीं ले जाता है। होलिका दहन तक समाज में किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। विवाह भी नहीं होते हैं।
भगोरिया मूलतः जनजातीय समाज का पारंपरिक हाट उत्सव है, जो होली माता के पूजन और उससे संबंधित सामग्रियों के क्रय-विक्रय के लिए आयोजित होता है। निश्चित तिथियों पर निश्चित स्थानों में लगने वाले इन हाटों में जनजातीय जन पहुँचते हैं।
आज के दौर में, अनेक जनजातीय युवक-युवतियाँ आजीविका की तलाश में बड़े शहरों की ओर रुख़ कर रहे हैं। ऐसे में भगोरिया अपने गाँव-समाज से पुनः जुड़ने, रिश्तों को सहेजने और सांस्कृतिक आत्मीयता को पुनर्जीवित करने का सजीव अवसर है।
जनजातीय जनों में शिक्षा के प्रसार के साथ एक नई जागरूकता दिखाई दे रही है। वे आधुनिकता के साथ क़दम मिलाते हुए अपनी परंपराओं, लोकगीतों, वेशभूषा और उत्सवों को संरक्षित रखने के लिए भी सतत प्रयासरत हैं।
आम्हू आखा चाल्या दादा भंगर्या मा
बारा महना मा आवे भंगर्यू रे
हाड़ जुड्या गाड़ी गेरी भंगर्या मा
पुरीया पारी गाड़ीम गया भंगर्या मा
पान खाजे आखा भंगर्या मा
रंग खेलणे आखा भंगर्या मा
गीत में कहा जा रहा है कि आओ, हम सब भगोरिया हाट चलें। जल्दी से बैलगाड़ी सजाएँ, बैल जोतें, और बच्चे-बूढ़े सभी हँसते-गाते भगोरिया की ओर निकल पड़ें। बारह महीने में एक बार आने वाला यह पर्व केवल हाट नहीं, बल्कि मेल-मिलाप, उल्लास और रंगों का उत्सव है। हम सब साथ चलें, वहाँ पान खाएँगे, और रंगों से होली खेलेंगे।
वर्तमान परिदृश्य में भगोरिया के स्वरूप में परिवर्तन देखने को मिला है। जहाँ पारंपरिक परिधानों में पुरुषों का मुख्य परिधान धोती, साफा, झुलड़ी है। वहीं, बढ़ती आधुनिकता के साथ युवाओं के पहनावों में परिवर्तन आया है। जींस, शर्ट, टी-शर्ट के अलावा चश्मों ने अपना स्थान बना लिया है।
दूसरी ओर महिलाओं ने भी समय के साथ क़दम मिलाकर सूट-सलवार, साड़ियाँ पहनना प्रारंभ किया है। प्रत्येक हाथों में मोबाइल फ़ोन है। आवागमन के साधनों के लिए बैलगाड़ियों का स्थान मोटरगाड़ियों ने ले लिया है।
भोंगर्या म जावांगा नऽ साड़ी लेवाडूँगा,
असी साड़ी पेरीनऽ मी तो वायड़ी देखाऊँगा।
भैया, जब मैं भगोरिया हाट जाऊँगी, तो मुझे एक रंग-बिरंगी साड़ी अवश्य दिला देना। उसे पहनकर मैं भी हाट की भीड़ में इठलाऊँगी।
निमाड़ की धरती से राजा भोज की नगरी में आकर जब मैंने भगोरिया का अध्ययन किया, तो मेरे सामने उसकी एक बिल्कुल भिन्न और अधिक प्रामाणिक छवि उभरकर आई। यह केवल एक हाट नहीं है, न ही कपोल-कल्पना में गढ़ा गया कोई प्रणय प्रसंग; यह भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है।
फागुन की मादक हवाओं में ढोल और मांदल की थाप पर थिरकते स्त्री-पुरुष कोई फूहड़ प्रदर्शन नहीं कर रहे होते, वे अपनी परंपरा का उत्सव मना रहे होते हैं, एक ऐसा उत्सव, जिसमें सामुदायिक एकता और लोक-आस्था का संगम दिखाई देता है।
यह कृषि चक्र की पूर्णता का भी उत्सव है। रबी की सुनहरी बालियों के पकने और नए अन्न के घर आने की ख़ुशी में जनजातीय जन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
ताड़ी और महुआ जैसे पेय पदार्थों को यदि केवल नशे के चश्मे से देखा जाए तो यह दृष्टि अधूरी होगी। जनजातीय समाज के लिए ये उनकी आजीविका, देव पूजा और प्रकृति-आधारित अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग हैं।
निस्संदेह, युवाओं के आपसी परिचय और सामाजिक संवाद के अवसर इस हाट में किसी अन्य मेले या हाट की तरह स्वाभाविक रूप से उपस्थित रहते हैं, किंतु इसे ‘परिणय पर्व’ या ‘भागने का उत्सव’ के रूप में परिभाषित करना न केवल अतिरंजित है, बल्कि जनजातीय परंपरा की अस्मिता और गरिमा के साथ अन्याय भी है।
भगोरिया को समझने के लिए उसके धार्मिक और सामाजिक संदर्भों में उतरना आवश्यक है, न कि सनसनीखेज़ कथाओं और आधे-अधूरे आख्यानों के आधार पर।
वस्तुतः, भगोरिया भारत की उस जीवित विरासत का प्रतीक है, जिसने आधुनिकता की आँधी में भी अपने पारंपरिक मूल्यों को सहेज कर रखा है। यह उत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि संस्कृति केवल स्मृति नहीं होती, यह एक जीवंत आचरण है और भगोरिया उसी जीवंत परंपरा का उज्ज्वल उदाहरण है।
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बेला पॉपुलर
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