पाखंड

माथे तिलक हाथ जपमाला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया।

मारग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम पाया॥

ईश्वर को पाने के लिए माथे पर तिलक लगाना और माला जपना केवल संसार को ठगने का स्वांग है। प्रेम का मार्ग छोड़कर स्वांग करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा को पाना असंभव है।

रैदास

किरतिम देव पूजिए, ठेस लगे फुटि जाय।

कहैं मलूक सुभ आत्मा, चारों जुग ठहराय॥

मलूकदास

बाना पहिरे बड़न का, करै नीच का काम।

ऐसे ठग को मिलै, निरकहु में कहुँ ठाम॥

सुधाकर द्विवेदी

देवल पुजे कि देवता, की पूजे पहाड़।

पूजन को जाता भला, जो पीस खाय संसार॥

मलूकदास

साधो दुनिया बावरी, पत्थर पूजन जाय।

मलूक पूजै आत्मा, कछु माँगै कछु खाय॥

मलूकदास

अंतर गति राँचै नहीं, बाहरि कथै उजास।

ते नर नरक हि जाहिगं, सति भाषै रैदास॥

मनुष्य कितना अज्ञानी है! वह शरीर की बाहरी स्वच्छता और वेश−भूषा पर ध्यान देता है और मन की पवित्रता पर दृष्टि नहीं डालता। रैदास सत्य ही कहते हैं−ऐसे मनुष्य निश्चय ही नरक लोक जाएँगे।

रैदास

जपमाला, छापैं, तिलक सरै एकौ कामु।

मन-काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु॥

माला लेकर किसी मंत्र-विशेष का जाप करने से तथा मस्तक एवं शरीर के अन्य अंगों पर तिलक-छापा लगाने से तो एक भी काम पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि ये सब तो आडंबर मात्र हैं। कच्चे मन वाला तो व्यर्थ में ही नाचता रहता है, उससे राम प्रसन्न नहीं होते। राम तो सच्चे मन से भक्ति करने वाले व्यक्ति पर ही प्रसन्न होते हैं।

बिहारी

देता रहै हज्जार बरस, मुल्ला चाहे अजान।

रैदास खोजा नहं मिल सकइ, जौ लौ मन शैतान॥

रैदास कहते हैं कि मुल्ला चाहे लगातार हज़ार वर्षों तक अजान देता रहे किंतु जब तक उसके भीतर शैतान रहेगा, तब तक खोजने पर भी उसे ख़ुदा मिल सकेगा।

रैदास

माला टोपी भेष नहीं, नहीं सोना शृंगार।

सदा भाव सतसंग है, जो कोई गहे करार॥

दरिया (बिहार वाले)

ना देवल में देव है, ना मसज़िद खुदाय।

बांग देत सुनता नहीं, ना घंटी के बजाय॥

निपट निरंजन

आतम राम चीन्हहों, पूजत फिरै पाषान।

कैसहु मुक्ति होयगी, कोटिक सुनो पुरान॥

मलूकदास

जेती देखे आत्मा, तेते सालिगराम।

बोलनहारा पूजिये, पत्थर से क्या काम॥

मलूकदास

तुका कुटुंब छोरे रे लड़के, जीरो सिर मुंडाय।

जब ते इच्छा नहिं मुई, तब तूँ किया काय॥

संत तुकाराम

सुंदर मैली देह यह, निर्मल करी जाइ।

बहुत भांति करि धोइ तूं, अठसठि तीरथ न्हाइ॥

सुंदरदास
  • संबंधित विषय : देह

संता विसय जु परिहरइ, बलि किज्जउँ हउँ तासु।

सो दइवेण वि मुंडियउ सीसु खडिल्लउ जासु॥

जो उपस्थित विषयों को त्याग देता है, मैं उसकी बलि जाता हूँ। जिसका सिर मुंडा है, वह तो परमात्मा से ही मूड़ा हुआ है। अर्थात् वह परमात्मा से ही वंचित है।

जोइंदु