सुमिरन

प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।

अजपा सुमिरण कहत हूं, उपजै केवल ज्ञान॥

सहजो कहती हैं कि ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति अत्यन्त दुर्लभ है। वह सद्गुरु के ध्यान से ही मिलती है। इसलिए स्थिर मन से ईश्वर एवं गुरु का स्मरण-ध्यान करना चाहिए, क्योंकि उसी से ईश्वरीय ज्ञान की साक्षात् अनुभूति हो पाती है।

सहजोबाई

जो पै जिय लज्जा नहीं, कहा कहौं सौ बार।

एकहु अंक हरि भजे, रे सठ ‘सूर’ गँवार॥

सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार दुष्ट, अगर तुझे अपने दिल में शर्म नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान् का भजन नहीं किया।

सूरदास

राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार।

‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तुम अपने हृदय के अंदर और बाहर दोनों ओर प्रकाश चाहते हो तो राम-नाम रूपी मणि के दीपक को जीभ रूपी देहली के द्वार पर धर लो। दरवाज़े की देहली पर यदि दीपक रख दिया जाए तो उससे घर के बाहर और अंदर दोनों ओर प्रकाश हो जाया करता है। इसी प्रकार जीभ मानो शरीर के अंदर और बाहर दोनों ओर की देहली है। इस जीभ रूपी देहली पर यदि राम-नाम रूपी मणि का दीपक रख दिया जाय तो हृदय के बाहर और अंदर दोनों ओर अवश्य प्रकाश हो ही जाएगा।

तुलसीदास

केस पक्या द्रस्टि गई, झर्या दंत और धुन्न।

सैना मिरतू पुगी, करले सुमरन पुन्न॥

सैन कहते हैं कि जब केश पक गए, दृष्टि चली गई, दाँत झड़ गए और ध्वनि मंद पड़ गई, तो जान लो-मृत्यु निकट है। स्मरण का पुण्य कर लो।

सैन भगत

भजन भलो भगवान को, और भजन सब धंध।

तन सरवर मन हँस है, केसो पूरन चँद॥

संत केशवदास

होफाँ ल्यो हरनांव की, अमी अमल का दौर।

साफी कर गुरुग्यान की, पियोज आठूँ प्होर॥

लालनाथ

दादू सिरजन हार के, केते नांव अनंत।

चिति आवै सो लीजिए, यूँ साधू सुमिरैं संत॥

ब्रह्म के अनंत नाम हैं। संतों-सिद्धों ने अपनी रुचि के अनुसार निष्काम भाव से उन नामों का स्मरण करके ब्रह्म-प्राप्ति का प्रयास किया है।

दादू दयाल

दादू रांम सँभालिये, जब लग सुखी सरीर।

फिर पीछैं पछिताहिगा, जब तन मन धरै धीर॥

तू यौवन और स्वास्थ्य से संपन्न और सुखी है। ऐसी स्थिति में तुझे राम-नाम का स्मरण कर लेना चाहिए। जब शरीर जर्जर, वृद्ध और रोग-ग्रस्त हो जाएगा, तब तू कुछ भी करने योग्य नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में तुझे पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं बचेगा।

दादू दयाल

दादू रांम तुम्हारे नांव बिनं जे मुख निकसै और।

तौ इस अपराधी जीव कूँ, तीनि लोक कत ठौर॥

हे राम! आपके नाम के बिना जो कोई शब्द मुख से निकलता है, तो वह महा अपराधी होता है। ऐसे अपराधी को तीनों लोकों में भटकने पर भी कोई सुख नहीं मिलता है।

दादू दयाल

रैदास मदुरा का पीजिए, जो चढ़ै उतराय।

नांव महारस पीजियै, जौ चढ़ै उतराय॥

रैदास कहते हैं कि मदिरा का सेवन करने से क्या लाभ जिसका नशा चढ़ता है और शीघ्र ही उतर जाता है? इसकी जगह राम नाम रूपी महारस का पान करो। इसका नशा यदि एक बार चढ़ जाता है तो फिर कभी नहीं उतरता।

रैदास

गुरु ग्यांन दीपक दिया, बाती दइ जलाय।

रैदास हरि भगति कारनै, जनम मरन विलमाय॥

सद्गुरु ने मुझे भक्ति रूपी बाती से युक्त ज्ञान का दीपक प्रदान किया। रैदास कहते हैं कि परमात्मा की भक्ति के कारण ही मैं जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गया।

रैदास

हरि बिनु मन तुव कामना, नैकु आवै काम।

सपने के धन सौं भरे, किहि लै अपनौ धाम॥

भगवान के बिना तेरी कोई कामना किसी काम आएगी। भला बताओ तो सही कि सपने के धन से किसने अपना घर भरा है अर्थात किसी ने नहीं भरा। जैसे स्वप्न के धन से कोई अपना घर नहीं भर सकता, वैसे ही भगवान के बिना किसी की इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसलिए और सब कामों को छोड़कर भगवान का स्मरण करना चाहिए।

रसनिधि

जिह्वा सों ओंकार जप, हत्थन सों कर कार।

राम मिलिहि घर आइ कर, कहि रैदास विचार॥

हे मनुष्य! तू अपनी वाणी से ओंकार का जाप और हाथों से कर्म कर। रैदास कहते हैं कि प्रभु राम स्वयं तुझसे मिलने तेरे घर आएँगे।

रैदास

घरी बजी घरयार सुन, बजिकै कहत बजाइ।

बहुकि पैहै यह घरी, हरिचरनन चित लाइ॥

एक-एक घंटे के बाद घंटे में टन से घड़ी बजती है। एक बार बजकर वह फिर बजती है और तुम्हें यह कहती है कि मनुष्य-जन्म की ऐसी सुंदर घड़ी फिर नहीं आएगी। इसलिए भगवान के चरणों में अपना चित्त लगाओ।

रसनिधि

'दया' सुपन संसार में, ना पचि मरिये बीर।

बहुतक दिन बीते बृथा, अब भजिये रघुबीर॥

दयाबाई

अर्ध नाम के लेत ही, उधरे पतित अपार।

गज गनिका अरु गीध बहु, भये पार संसार॥

दयाबाई

राम नाम शंकर कह्यौ, गौरी कौं उपदेस।

सुंदर ताही राम कौं, सदा जपतु है सेस॥

सुंदरदास

चरनदास गुरुदेव ने, मो सूँ कह्यो उचार।

'दया' अहर निसि जपत रहु, सोहं सुमिरन सार॥

दयाबाई

कीड़ी कुंजर सूँ लटै, गाइ सिंघ कै संग।

“बखना” भजन प्रताप थैं, निवाला मवलौ संग॥

बखना

तुका बड़ो मानूं, जिस पास बहुत दाम।

बलिहारी उस मुख की, जिस ते निकसे राम॥

संत तुकाराम

श्री गुरदेव दया करी, मैं पायो हरि नाम।

एक राम के नाम तें, होत संपूरन काम॥

दयाबाई

तुका मार्या पेट का, और जाने कोय।

जपता कछु राम नाम, हरि भगत की सोय॥

संत तुकाराम

‘व्यास’ स्वपच बहु तरि गए, एक नाम लवलीन।

चढ़े नाव अभिमान की, बूड़े कोटि कुलीन॥

हरीराम व्यास

राम कहो फिर राम कहु, राम नाम मुख गाव।

यह तन बिनस्यो जातु है, नाहिन आन उपाव॥

दयाबाई

जीवहुँ ते प्यारे अधिक, लागैं मोहीं राम।

बिन हरि नाम नहीं मुझे, और किसी से काम॥

मलूकदास

राम कहे सो मुख भला रे, बिन राम से बीख।

आय जानू रमते बेरा, जब काल लगावे सीख॥

संत तुकाराम

तुका दास तिनका रे, राम भजन नित आस।

क्या बिचारे पंडित करो रे, हात पसारे आस॥

संत तुकाराम

सुंदर भजि भगवंत कौं, उधरे संत अनेक।

सही कसौटी सीस पर, तजी अपनी टेक॥

सुंदरदास

'दया' प्रेम उनमत जे, तन की तनि सुधि नाहिं।

झुके रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं॥

दयाबाई

भजन किये भगवंत बसि, डोली जन की लार।

सुंदर जैसे गाय कौं, बच्छा सौं अति प्यार॥

सुंदरदास

जेहि घर केसो नहिं भजन, जीवन प्रान अधार।

सो घर जम का गेह है, अंत भये ते छार॥

संत केशवदास

राम-राम कह रे मन, और सुं नहिं काज।

बहुत उतारे पार आगे, राखि तुका की लाज॥

संत तुकाराम

हरि रस महंगा मोल कौ, 'बखना' लियौ जाइ।

तन मन जोबन शीश दे सोई पीवौ आइ॥

बखना

स्वाँसउ स्वाँस बिचार करि, राखै सुरत लगाय।

“दया” ध्यान त्रिकुटी धरै, परमातम दरसाय॥

दयाबाई

हरख जपो हरदुवार, सुरत की सैंसरधारा।

माहे मन्न महेश, अलिल का अंत फुँवारा॥

लालनाथ

पहली था सौ अब नहीं, अब सौ पछैं थाइ।

हरि भजि विलम कीजिये, 'बखना' बारौ जाइ॥

बखना

भजत-भजत ह्वै जात है, जाहि भजै सो रूप।

फेरि भजन की रुचि रहै, सुंदर भजन अनूप॥

सुंदरदास

सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदे बिसार।

डोरो गहि हरि नाम की, 'दया' टूटै तार॥

दयाबाई

बिन रसना बिन माल कर, अंतर सुमिरन होय।

‘दया’ दया गुरदेव की, बिरला जानै कोय॥

दयाबाई

आपै नो आपु मिली रहिआ, हउमै दुविधा मारि।

नानक नामि रते दुतरु तरे, भउ जलु विषमु संसारु॥

गुरु अमरदास

एक भजन तन सौं करे, एक भजन मन होइ।

सुंदर तन मन कै परै, भजन अखंडित सोइ॥

सुंदरदास

जहं लगि आये जगत महं, नाम चीन्ह नहिं कोय।

नाम चिन्हे तौ पार ह्वै, संत कहावत सोय॥

संत शिवनारायण

जगत सनेही जीव है, राम सनेही साध।

तन-मन-धन तजि हरि भजे, जिन का मता अगाध॥

दयाबाई

बिषय-बात मन-पोत कों, भव-नद देति बहाइ।

पकरु नाम पतवार दृढ़, तौ लगिहै तट आइ॥

दुलारेलाल भार्गव

सात दीप नौ खंड के, ऊपर अगम अबास।

सबद गुरु केसो भजै, सो जन पावै बास॥

संत केशवदास

आठ पहर चौंसठ घरी, जन बुल्ला घर ध्यान।

नहिं जानो कौनी घरी, आइ मिलैं भगवान॥

बुल्ला साहब

करमाँ सूँ कला भया, दीसो दूँ दाध्या।

इक सुमरण सामूँ करो, जद पड़सी लाधा॥

लालनाथ

मोटे बंधन जगत के, गुरु भक्ति से काट।

झीने बंधन चित्त के, कटें नाम परताप॥

संत शिवदयाल सिंह

जग आये जग जागिये, पागिये हरि के नाम।

बुल्ला कहै बिचारि कै, छोड़ि देहु तन धाम॥

बुल्ला साहब

अर्ध-उर्ध मधि सुरति धरि, जपै जु अजपा जाप।

'दया' लहै निज धाम कूँ, छूटै सकल संताप॥

दयाबाई