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श्री पीताम्बर पंडित

श्री पीताम्बर पंडित के उद्धरण

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जैसे बाह्य प्रकाश के बिना; बाह्य पदार्थ का नेत्र से भान (ज्ञान) कहीं नहीं होता है, इसी प्रकार से विचार के बिना अन्य साधनों से आत्मज्ञान नहीं उत्पन्न होता है।

ज्ञान और भक्ति आदि के बिना कर्म अवश्य भोगना होता है।

विहित यज्ञ, दान, तप, सत्य, शौच, अंहिसा, दया, शम, दम, अक्रोध, अलोभादि वचन, मन और शरीर से किए गए धर्म होते हैं, और इनसे विपरीत हिंसा, चौर्य, असत्यभाषण, दम्भादि अधर्म होते हैं।

प्रेम का विषय आत्मा परमानंद स्वरूप है।

विषयासक्ति के नाश के बिना श्रवण नहीं होता है, और विषयासक्ति का नाश तथा श्रवण; इन दोनों के बिना मनन नहीं हो सकता है और उन दोनों सहित मनन के बिना ध्यान नहीं हो सकता है, मनन से निश्चित अर्थ का ध्यान होता है।

जैसे कमल पत्र में जल नहीं लिप्त होते हैं, तैसे ही असंग साक्षी के अनुभवी में पाप कर्म नहीं लिप्त होते हैं।

  • संबंधित विषय : पाप

ज्ञानी पुरुष शरीर के रहते भी इच्छा कामादि के अभाव से ब्रह्मस्वरूप से स्थिर रहता है। इसी को जीवनमुक्ति कहते हैं।

काल मिथ्या है, परंतु आत्मा की सत्ता से सत्य प्रतीत होता है।

स्वप्न के समान जो सकल दृश्य (अनात्म) स्वरूप अध्यास (भ्रममात्र मिथ्या) वस्तु हैं, उनको छोड़ना चाहिए (उनमें आसक्ति सत्यता बुद्धि को त्यागना चाहिए), क्योंकि उनको नहीं त्यागने से ब्रह्मसंस्था आत्मनिष्ठ मनुष्य नहीं होता है, किंतु स्वस्वरूप से पतित हो जाता है।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति के आगमन और अपाय (नाश ) का भासन (प्रकाशन ज्ञान) जिससे होता है, वह आत्मा स्वयं प्रकाश चेतन स्वरूप है।

आत्मा और ब्रह्म की एकता, ज्ञान तथा विचार का विषय है।

मन वाक् के अविषय रूप से; मन से उपलक्षित ब्रह्म के आनंद स्वरूप को जाननेवाला विद्वान, तथा मनोमय का उपासक कभी डरता नहीं है।

जैसे वृक्ष के नीचे छाया में बैठे हुए मनुष्य की गोद में ऊपर से सर्प गिर जाए, तो उस को शीघ्र बीग देना उचित होता है; यह कहाँ से आया, कैसे आया, कब से इस वृक्ष पर था इत्यादि शोचना उचित नहीं होता है, तैसे ब्रह्मात्मा में जगत का आरोप कब से हुआ, कैसे हुआ इत्यादि चिंता को त्यागकर, इसकी निवृत्ति बाध के लिए उपाय यत्न शीघ्र कर्त्तव्य है।

विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति, प्रबल मोक्ष की इच्छायुक्त तीव्र जिज्ञासा-युक्त होने पर उत्तम ज्ञान का अधिकारी होता है। उसमें विचार अवश्य सफल होता है।

ब्रह्म आत्मा की एकता का अपरोक्ष ज्ञान, मोक्ष का साज्ञात् साधन है।

आभास त्याग कर (फल व्याप्ति को नहीं समझ कर), अहं ब्रह्मस्मि—मैं सच्चिदानंद ब्रह्म हूँ—ऐसा अपरोक्ष ज्ञान को ही जिज्ञासु पाता है।

स्वशरीर संबंधी वर्णाश्रम धर्मरूप तप द्वारा, या वर्णाश्रम धर्म और मन, इंद्रिय का निग्रहादि रूप तप द्वारा, हरिजनादि रूप हरि की तुष्टि से पुरुष को वैराग्यादि चारो साधन प्राप्त होते हैं।

जैसे मुंज के तूल अग्नि में देने पर शीघ्र दग्ध होता है, वैसे प्राणात्मज्ञ के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

कार्य सहित अज्ञान रूप, अनर्थ की निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति मोक्ष का स्वरूप है।

ब्रह्मनिष्ठ मोक्ष पाता है, अतः मुमुक्षु को दृश्य का अवश्य त्याग करना चाहिए।

जब ज्ञान के अधिकारी अपने स्वरूप को संशय भ्रम के अभावपूर्वक अपरोक्ष जानता है, तब संदेह ही (शरीर सहित ही) उस अधिकारी को भ्रम रूप बंधन की निवृत्ति रूप जीवनमुक्ति समीप ही है।

निष्काम कर्मोपासनादि मोक्ष के अवान्तर साधन है।

सद्गुरु के मुख से महाकाव्य के अर्थ का श्रवण, ज्ञान का साक्षात् अंतरंग साधन है।

अन्य कर्म का ज्ञानादोय मात्र से नाश होता है, परंतु प्रारब्ध की बाधितानुवृत्ति कुछ काल तक रहती है।

अज्ञान रूप बंधन का ज्ञान ही, साज्ञात् मुक्ति का हेतु है।

विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति, मुमुक्षुता तत्त्वं पदार्थ शोधन, श्रवन, मनन, निदिध्यासन—ये आठ ज्ञान के अंतरंग साधन है। कर्मादि बहिरंग साधन है।

कोई नाम रूप को सत्य मानकर उसका विलय कहते हैं, परंतु सत्य का विलय हो नहीं सकता है। अतः माया से कल्पित नाम रूप का विलय होता है।

आत्मा स्वयं प्रकाश है।

जो चेतन (आत्मा) सो सामान्य और विशेष दोविध (दो प्रकार का) है, तहाँ सुजान मनुष्य जो है, वह ) सामान्य स्वरूप सत्य को ही आत्मा मानता है, विशेष को नहीं, क्योंकि विश्ष स्वरूप जो आत्मा है, सो भ्रांति स्वरूप है, अतः कल्पित ( मिथ्या ) है, सत्य नहीं है।

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