जैसे बाह्य प्रकाश के बिना; बाह्य पदार्थ का नेत्र से भान (ज्ञान) कहीं नहीं होता है, इसी प्रकार से विचार के बिना अन्य साधनों से आत्मज्ञान नहीं उत्पन्न होता है।
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ज्ञान और भक्ति आदि के बिना कर्म अवश्य भोगना होता है।
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प्रेम का विषय आत्मा परमानंद स्वरूप है।
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विषयासक्ति के नाश के बिना श्रवण नहीं होता है, और विषयासक्ति का नाश तथा श्रवण; इन दोनों के बिना मनन नहीं हो सकता है और उन दोनों सहित मनन के बिना ध्यान नहीं हो सकता है, मनन से निश्चित अर्थ का ध्यान होता है।
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विहित यज्ञ, दान, तप, सत्य, शौच, अंहिसा, दया, शम, दम, अक्रोध, अलोभादि वचन, मन और शरीर से किए गए धर्म होते हैं, और इनसे विपरीत हिंसा, चौर्य, असत्यभाषण, दम्भादि अधर्म होते हैं।
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