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दुख पर ग़ज़लें

दुख की गिनती मूल मनोभावों

में होती है और जरा-मरण को प्रधान दुख कहा गया है। प्राचीन काल से ही धर्म और दर्शन ने दुख की प्रकृति पर विचार किया है और समाधान दिए हैं। बुद्ध के ‘चत्वारि आर्यसत्यानि’ का बल दुख और उसके निवारण पर ही है। सांख्य दुख को रजोगुण का कार्य और चित्त का एक धर्म मानता है जबकि न्याय और वैशेषिक उसे आत्मा के धर्म के रूप में देखते हैं। योग में दुख को चित्तविक्षेप या अंतराय कहा गया है। प्रस्तुत संकलन में कविताओं में व्यक्त दुख और दुख विषयक कविताओं का चयन किया गया है।

जिनगी पहाड़ भेल

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

सुनसान पांतरमे

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

उनका ढिठाई के बात

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

खेल उनकर खतम हो गइल

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

ना हँसी बाटे

मिथिलेश ‘गहमरी’

फूस के छप्पर

तैयब हुसैन पीड़ित

चुप्पी मारि बैसल छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

जर रहल बा गाँव

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

हमरा जिनगी में भोर

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

नाँव लिख-लिख के मिटावत

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

दम तोड़ि रहल छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

जानि अहाँ करबे की?

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

अथाह ई सागर

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

जनमे से बाटे उधार हमार

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

साँस के संगीत बन जाता

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

सहबाक जे सन्ताप अछि

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी