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हरि कार्की

1993 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

नई पीढ़ी के रचनाकार।

नई पीढ़ी के रचनाकार।

हरि कार्की के बेला

03 अगस्त 2026

निम्स दाई! हिमाल आपको बुला रहे हैं...

निम्स दाई! हिमाल आपको बुला रहे हैं...

Giving up is not in the blood, Sir! Not in the blood. — Nirmal ‘Nimsdai’ Purja 30 जुलाई 2026 | दिल्ली/काराकोरम उस दिन दिल्ली मेट्रो से दफ़्तर जाते हुए, मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस समय निर्म

28 जनवरी 2026

पेड़ों पर चढ़ने वाली स्त्रियों का संसार

पेड़ों पर चढ़ने वाली स्त्रियों का संसार

विशाल हिमालय की गोद में बसे दो देश—भारत और नेपाल एक-दूसरे के पड़ोसी हैं और दोनों साथ में 1850 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा भी साझा करते हैं। भारत और नेपाल बॉर्डर भारतीय उपमहाद्वीप के बाक़ी देशों

02 जनवरी 2026

सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं

सुधांशु फ़िरदौस से दस सवाल : जीवन एक घर है, जिसमें बेघर हूँ मैं

सुधांशु फ़िरदौस (जन्म : 1985) इस सदी में सामने आई हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। वर्ष 2020 में उनकी कविताओं की पहली किताब ‘अधूरे स्वाँगों के दरमियान’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक के लिए उन

30 सितम्बर 2024

यों याद किए गए नवीन सागर

यों याद किए गए नवीन सागर

गत शुक्रवार, 27 सितंबर को हौज़ ख़ास विलेज, नई दिल्ली में ‘नवीन सागर स्मृति रचना समारोह’ का पहला आयोजन हुआ। मेरी नज़र में बीते कई सालों में हिंदी-संसार में हो रहे आयोजनों में ऐसा कोई आयोजन हुआ या होता

23 सितम्बर 2024

‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह...’

‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह...’

मुन्नवर राना कह गए हैं :  “ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है” बाज़ार चीज़ों के साथ क्या करता है, इसके जवाब में कई ख़ूब मिसालें आपको मिल जाएँगी।

23 मई 2024

बुद्ध की बुद्ध होने की यात्रा को कैसे अनुभव करें?

बुद्ध की बुद्ध होने की यात्रा को कैसे अनुभव करें?

“हम तुम्हें न्योत रहे हैं  बुद्ध, हमारे आँगन आ सकोगे…” गौतम बुद्ध को थोड़ा और जानने की एक इच्छा हमेशा रहती है। यह इच्छा तब और पुष्ट होती है, जब असमानता और अन्याय आस-पास दिखता और हम या हमारे लोग उ

06 मई 2024

एक रोज़ हम लौट आना चाहते हैं

एक रोज़ हम लौट आना चाहते हैं

मई 2024         तुमने कहा—जाती हूँ  और तुमने सोचा कवि केदार की तरह मैं कहूँगा—जाओ लेकिन मेरी लोकभाषा के पास अपने बिंब थे मेरी लोकभाषा में कोई कहीं जाता था ‘तो आता हूँ’ कहकर शेष बच जाता था

02 मई 2024

भूलने की कोशिश करते हुए

भूलने की कोशिश करते हुए

मई 2021 हम किसी दरवाज़े के सामने खड़े हों और भूल जाएँ कि दरवाज़े खटखटाने पर ही उन्हें खोला जाता है। ठीक दूसरी तरफ़ तुम जैसा ही कोई दूसरा हो जिसने आवाज़ें पहचाना बंद कर दिया हो और जो उस चौहद्दी को

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