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जगह-जगह 2.0 : नज़्म की पूँछ

प्रस्तुत आलेख शाइर और अनुवादक रियाज़ लतीफ़ की किताब ‘नज़्म की पूँछ’ पर एकाग्र है। आलेख में अपनी बात रखने के लिए उनकी अन्य रचनाओं के भी कुछ हवाले दिए गए हैं।

‘नज़्म की पूँछ’ 2024 में सुख़नकदा, अहमदाबाद से प्रकाशित हुई। मैंने इसे किसी प्रसंगवश पहली बार 2025 में पढ़ा। अन्यान्य पाठकीय अनुभवों के कारण यह किताब तब से प्रिय बनी रही है। इस किताब के पसंद आने और यहाँ चर्चा में प्रस्तुत करने के कई पहलू हैं, इसका शीर्षक, इसकी बुनावट और हर बार अजनबी बनता हुआ दोहराव; चोट नई और आग भी नई। अपनी विषयवस्तु में यह किताब आदि, अंत और मध्य की योजना से मुक्त है। प्रस्थान से ही विचलन का एक ख़ाका बनता जाता है। एक टुकड़ा दूसरे से जुड़ता है और उससे अजनबी भी बना रहता है। अनेकानेक आधिभौतिक प्रत्यय या प्रत्ययों के भ्रम सतह पर आते हैं और नज़्म की शक्ल अख़्तियार करते हैं।

एक

रियाज़ लतीफ़ की शाइरी में समय के भीतर और बाहर एक निरंतर आवाजाही है। वह इसकी सीमाएँ लगातार बनाते और मिटाते रहते हैं। वह अनंत की कगार को छूते हैं और लाँघते हैं।

सफ़र में मरहला बना
दवाम का हिसार भी

अस्तित्व, अनस्तित्व, स्वप्न, शून्यता, मृत्यु तथा अन्यान्य बुनियादी अटकलों में उनकी कविता का जीव सहज चहल-क़दमी करता रहता है। उनकी यह चहल-क़दमी उनके रोज़मर्रा के मौज़ूँ और रोमांटिक कथ्य का भी अतिक्रमण करती है। यह अतींद्रिय या अनुभवातीत का मुख्य दरवाज़े से कविता में प्रवेश है। इस धृष्टता में सौंदर्य है। इसमें शास्त्रीय और नव-शास्त्रीय राग-रंग का सम्मानपूर्वक और सावधान निर्वाह है। यह पुरातन के सिरे और अद्यतन के बीच गिरह लगाने की बाज़ी है। इसमें ख़ुद को देखती हुई आँख है।

रियाज़ लतीफ़ की एक छोटी कविता ‘है’ की पंक्तियाँ पढ़िए :

और कुछ हो न हो  
ज़ख़्म बनती हुई  
ग़ैब की आँख में  
एक नमी सी तो है  
आगही सी तो है

दो

रियाज़ लतीफ़ ने पुस्तक के बारे में इशारा दिया है; “ग़ुबार-ए-जान-ओ-जहान की कुछ झलकियाँ क़द्रे बेहूदा ज़बान में”

नज़्म की पूँछ में ‘पूँछ’ आख़िर क्या है? क्या यह कविता का उत्तरकाल है, उसकी रात है? क्या यह क्षेपक है? उपहास?

पूरी पुस्तक में नज़्म की पूँछ को लेकर जिस ‘क़द्रे-बेहूदा ज़बान’ का इस्तेमाल है, वह इस रूपक के उत्स को एक शरारत की तरह या नासंजीदगी की तरह पेश करने का अमल दिखाई देता है। यह तस्वीर वक़्ती (क्षणिक) है, क्योंकि नज़्म की पूँछ जो “उड़ा रही है लम्हों की बेशुमार मक्खियाँ”, अपनी भूख में “खाना चाहती है ख़ला के कोने”, जो “Riemannian space के नामुमकिन कोनों में” भटक रही है, “बूद-ओ-नबूद से उलझी” हुई , या “एक सुराख़ है नज़्म की पूँछ, तारीख़ की सय्याल खोपड़ी में”, और जो “एक पुल का किरदार अदा कर सकती है / आदमी के बिछड़े हुए बेकिनार अश्कों को जोड़ने में”।

ऐसे और भी अनेक प्रसंग हैं, जहाँ नज़्म की पूँछ एक रूपकीय स्वायत्तता का इज़हार करती है। शरारती और नासंजीदा दिखते इस रूपक में एजेंसी या कवि-चेतना इसी तरह स्थापित होती है। यह रियाज़ लतीफ़ को उन वर्जनाओं को भी मूर्त में बदलने की अनुमति देता है, जो सामान्यतः कविता में अदृश्य और अंतर्निहित रहती हैं। यह भाषा के सामर्थ्य से पैदा किया गया अधिशेष है।

तीन

रियाज़ लतीफ़ के यहाँ आत्म-अनात्म, देह-देहातीत के बीच कुहासों जितना भी फ़र्क़ नहीं है। यहाँ कविता का ‘उत्पत्ति’ से संवाद देखिए। ये कविता की सीमा भी रेखांकित करती पंक्तियाँ हैं :

अज़ल की आँख खोलते ही  
ख़ुदा ने च्यूँटी के कान में
जो कहा,  
वह दोहरा नहीं सकती, नज़्म की पूँछ

इसके बरक्स ‘नज़्म की पूँछ’ में आधिभौतिक विचरण और विचलन के साथ कविता की पुश्त से निकली पूँछ के उत्सर्जन का प्रसंग भी उसी संजीदा भाषा में प्रस्तुत होता है। लेकिन इस प्रसंग में यह कॉमिकल अश्लीलता किसी मीमांसा में रोड़ा नहीं है। बानगी देखिए :

कमोड पर तख़्त-नशीं नज़्म  
अपनी पूँछ उठाकर  
ज़ेरे कायनात बहा रही है  
ग़ैब के धारे
कहकशाँ के लावारिस पुर्ज़े

अन्य कई प्रसंगों में उत्सर्जन (पेशाब-पाख़ाना) के कई हवाले हैं। यहाँ मेटाफ़िज़िक्स नकार नहीं है। नज़्म समय के छोर के साथ खेलती है, वैज्ञानिक और गणितीय समीकरणों को बहा देती है, उनका उपहास करती है और उन्हें देह के भीतर खींच लाती है। यह कामनाओं, भूख, पतन, भय और मृत्यु के हवाले से मेटाफ़िज़िक्स या आधिभौतिकता का अनुभव है।

कमोड पर बैठी नज़्म जब जगत, भूगर्भीय परतों, शहरों, जंगलों और इतिहास को उत्सर्जित करती है, तो यहाँ सृष्टि के पारंपरिक रूपक को उलट दिया गया है। जिन्हें आमतौर पर सृजन की उच्चतम श्रेणियों में रखा जाता है, वे देह के उत्सर्जन में बदल जाते हैं। सृष्टि का परिणाम और निकष, देह से उत्सर्जित अवशिष्ट बन जाता है।

इस लिहाज़ से यहाँ कल्पनात्मक निरंतरता के दो छोर एक-दूसरे में आ जाते हैं। वे सारी अवधारणाएँ जिन्हें दर्शन और आध्यात्म में गरिमा हासिल है, बार-बार देह में लौटती रहती हैं। मेटाफ़िज़िक्स का यह विघटन उसका निषेध नहीं, बल्कि उसे एक दूसरी, अधिक भौतिक भाषा देना है।

चार

नज़्म की पूँछ
और कुछ भी नहीं
मुस्तक़बिल की छाती से
सियाह दूध पीते हुए
यतीम माज़ी के
सायों के सिवा

किताब में इतिहास खंडित क्रम, संकेतों और सांस्कृतिक स्मृतियों के रूप में उपस्थित होता है। कॉर्डोबा, अल्हाम्ब्रा, शार्त्र का गोथिक स्थापत्य, प्राचीन मिस्र के हाइरोग्लिफ़िक्स, क्यूनिफ़ॉर्म और Linear B जैसी प्राचीन लिपियाँ, शाहनामा की परंपराएँ और दक्षिण एशियाई सांस्कृतिक संदर्भ, सभी कविता में अलग-अलग सभ्यताओं और ज्ञान-परंपराओं से आए हुए बिंबों और संकेतों की तरह उपस्थित हैं।

तिलिस्मी Hieroglyphs से निचोड़ना चाहती है वह  
सुकूत झड़ते अहराम को

रियाज़ लतीफ़ स्वयं स्थापत्य और कला-इतिहास के अध्येता हैं। उनका व्यापक पठन-अनुभव, जिसमें विश्व साहित्य, इतिहास, कला और संस्कृति का एक बड़ा संसार शामिल है, ‘नज़्म की पूँछ’ की संकल्पना और ढाँचे को प्रभावित करता है। इसी वजह से यह किताब पारंपरिक अर्थ में और अपनी महत्त्वाकांक्षा तथा संतुलन में उर्दू नज़्म की अन्य किताबों से भिन्न है और बहुविध पठन से निर्मित हुई है। अलग-अलग ज्ञान-परंपराओं, कलाओं, सभ्यताओं और साहित्यिक स्मृतियों से आई हुई सामग्री ही नज़्म की भाषा, बिंबों और वाक्यों के विन्यास का हिस्सा बन जाती है और उसकी तश्कील में रियाज़ लतीफ़ के मूलभूत काव्यगत लगाव का दस्तख़त दिखाई देता है।

हनूत किए गए फ़िरऔन Ramses II के  
नथुनों से बरामद किए हैं  
नज़्म की पूँछ ने  
मालाबारी काली मिर्च के दाने

पाँच

सफ़र में भटक रही है  
नज़्म की पूँछ  
या सफ़र भटक रहा है  
नज़्म की पूँछ में

‘नज़्म की पूँछ’ और स्वयं रियाज़ के काव्य का सबसे चमकीला पक्ष है उनका “शून्यता”, अनस्तित्व आदि अवधारणाओं का कविता में प्रयोग और उसकी नव्यता, जो कभी भी अस्तित्ववादी मुद्रा में उपस्थित नहीं होती। अस्तित्ववादी मुद्रा से मुराद कला में वह रुझान और चलन है, जहाँ ख़ला (शून्यता) किसी धार्मिक साक्षात्कार, आधिभौतिक सांत्वना या उदासी, आधुनिकताजन्य अकेलापन, पीड़ा और संत्रास, मृत्यु और सुख की निष्फल तलाश से जुड़ा हुआ कोई परिचित काव्यात्मक अलंकार बनकर उबाने की हद तक दोहराई जा चुकी है। रियाज़ के यहाँ ख़ला, अदम, समावात, दवाम, दायमी, ना-पैद, सिफ़र आदि बहुत सहजता से सत्ता और असत्ता के अस्थिर और असमाप्त रूपक की तरह कविता में प्रवेश करते हैं। वह इसके सामने न नतमस्तक होते हैं, न उससे मुक्ति खोजते हैं, न उसे करुण सौंदर्य में रूपांतरित करते हैं।

सब एक-दूसरे से  
Ex Nihilio फूट निकले हैं  
नमूद की बिसात पर शतरंज खेल रहे हैं

पुस्तक में उद्धरणीयता प्रबल है। इसमें कोई केंद्रीय कथा या नैरेटिव नहीं है और जगह-जगह दार्शनिक दिखाई देने वाली सूक्तियाँ हैं, लेकिन यह किसी व्यवस्थित दार्शनिक चिंतन की पुस्तक नहीं है। फिर भी यह उन तत्वों पर विचार करने का आग्रह करती है और उस पाठ के लिए आमंत्रित करती है, जिनकी पड़ताल कविता के पुरोहित हज़ारों साल पहले कविता से कर रहे थे और आज भी कर रहे हैं। ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके कोई अंतिम उत्तर नहीं हैं, न हो सकते हैं। यह अनंत को गुदगुदाने और समय से छेड़ का और पुस्तक की भाषा में कहा जाए तो “रातों के सबात में शिगाफ़ करने का” अमल है।

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