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रागदर्पण : सपनों का डर

मैं बेदार बैठी हूँ। पर्दानशीं खिड़की से बहुत धीमी रोशनी भीतर आ रही है। उस मद्धिम रोशनी में मैं सामने की दीवार घड़ी पर वक़्त का अंदाज़ लेना चाहती हूँ। मगर ठीक से कुछ सुझाई नहीं देता। मेरी धड़कन बढ़ी हुई है। देह पसीने से भीजी हुई है। जान पड़ता है कहीं दूर से दौड़ती आई हूँ।

मैं याद करती हूँ कि मैं किस सपने में थी। बहुत ज़ोर डालने पर मानस पटल पर कुछ संभ्रमित और अस्पष्ट से चित्र उभरते हैं। एक बहुत कुछ पहचानी-सी जगह। बौने बूटों पर रंग-बिरंगे फूलों की कलगियाँ। तुर्श पत्तियों वाले छतरी से दरख़्त, हरी दूब के ग़लीचे लेकिन पल भर में यह नूरीन मंज़र बदल गया था—ज्यों किसी ने धक्का देकर एक बेढब बस्ती में पटक दिया। वह शायद कोई मैदानी इलाक़े का गाँव था। टेढ़ी, भैंगी और संकरी गलियों में मटियाले रंग से लीपे जर्जर मकानों की छोटी-बड़ी पाँत। काठ की किवाड़ों पर खड़े पीली आँखों और सूखी सूरतों वाले सरगश्ता लोग। सब के सब एक दूजे से नितांत असंबद्ध और असंपृक्त। वे सब चुप थे मगर सबकी पसलियाँ खड़खड़ा रही थीं। अचानक उन्होंने मिलकर ज़ोरों की हुंकार भरी और एकदम अँधेरा छा गया। सारे दृश्य ग़ायब हो गए। उस अंधे घुप्प में सिर्फ़ आवाज़ें बची थीं। मेरे पीछे बदस्तूर दौड़ते लोगों की आवाज़ें। मैं चारों सिम्त घिरी थी। उस गाढ़े अंधियार में उनसे बचने को आगा-पीछा सोचे बग़ैर दौड़े जा रही थी।

ये कौन लोग थे जो मेरे पीछे पड़े थे!

मैं कई बार महसूस करती हूँ कि सपनों में भी दिमाग़ चलता रहता है। मैं सपनों को अपने हिसाब से मोड़ने के फेर में जाग पड़ती हूँ। कितनी ही दफ़ा सपने के भीतर सपना देखती हूँ। रहस्य के भीतर एक रहस्य। दिमाग़ की यह चुस्ती और मशक़्क़त कोई आज की बात नहीं है। साल 2002 की एक निराश और बेहद गर्म दुपहर मेरी याद के रोज़नामचे में दर्ज है। एनेस्थीसिया की पर्याप्त डोज़ के बाद भी दिमाग़ बाक़ायदा दौड़ रहा था। डॉक्टरों की आवाज़ें बिल्कुल साफ़ थीं। हवास सलामत थे। मगर दर्द नहीं था। मुँदी हुई आँखों में गहन कालिमा के बीच असंख्य तारे नाच रहे थे। जैसे मैं अंतरिक्ष में हूँ। मैं संजीदा बातें कर रही थी। डॉक्टर ने चिंतित स्वर में कहा था, “इतनी डोज़ पर भी यूँ दिमाग़ का चलना ठीक बात नहीं है।”

बहुत छोटी थी। पिता सुबह जल्दी घर से निकलते और देर रात घर लौटते थे। वे घर से छूटने को अकुलाए रहते। घर जाने क्यों उन्हें बाँधता न था, लेकिन आशंकाओं और प्रतीक्षा में जागा रहता था। मैं भी घर के उन रतजगों का हिस्सा होती। अचानक नींद की कोई झोंक आती और मैं उसके साथ बह जाती। घर के रास्ते में रेल की पटरियाँ थीं। तब के सपनों में बहुधा पिता रेल की पटरी पर गिर जाते और रेल धड़धड़ाकर उनके ऊपर से गुज़र जाती।

मैं चौदह-पंद्रह की हुई तो लगता गणित की परीक्षा है और मैं एग्ज़ामिनेशन हॉल तक नहीं पहुँच पा रही हूँ। किसी हड़बड़ी और बेचारगी में ज़ार-ज़ार रो रही हूँ। गणित सदा मेरे लिए एक दु:स्वप्न रहा।

सयानी होते-होते जब शोहदों-दिलचलों की नज़र पहचानना सीख रही थी, तब सपनों में एक दाढ़ीजार लफ़ंगा बदरंग स्कूटर से अपनी साइकिल का पीछा करता नज़र आता। वे अजीब दिन थे। किस-किसकी और कितनी आँख मेरी पीठ पर टिकी हैं—सबका हिसाब रहता। उन आँखों से भय भी लगता और उनकी तलब भी उठती।

शादी के आस-पास के दिनों में दंगाइयों और फ़सादियों के सपने दिखने लगे। जैसे बहुत सारे लोग एक सुर होकर मुझे धमका रहे हैं। उनके मुँह में गालियाँ, आँखों में आग, हाथों में लाठियाँ और तलवारें हैं।

बेटे के जन्म के बाद मुझे सपनों में अक्सर लगता कि उसे तेज़ बुख़ार है। उसकी सारी चपलता और बातूनियत उसकी देह के ताप ने छीन ली है। वह लगातार उल्टियाँ कर रहा है और मल से भरे गड़हे में लस्त पड़ा है। उन दिनों ऐसी घबराहट में मेरी नींद उचटने लगी थी।

इस तरह अलग-अलग समय पर सपनों में अलग-अलग डर बने रहे। हमारे राग ही हमारे भय हैं। भीतर घात लगाए बैठी आशंकाएँ नींद-चैन खा जाती हैं। सपनों का सारा एस्थेटिक छीन लेती है।

दो एक महीने पहले बुढ़ापे के ख़्वाब मेरे लिए सबसे डरावने ख़्वाब हो गए थे। सपने में मैं आईने में झाँकती और यक़बयक ही अपने को कई बरस बूढ़ा हुआ पाती। विकृत, जर्जर और निरुपाय। मेरे सारे दाँत एक-एक कर हथेली पर गिर पड़ते। कमर पीड़ा से अकड़ रही होती, जोड़ दुख रहे होते, चेहरा अनगिन सिलवटों से भरा होता। सपने में ही कोई दहशत अपने निर्दयी हाथों में जकड़कर मुझे मुर्दा-सा कर देती।

आजकल इन सपनों से भय नहीं खाती। सोचती हूँ बुढ़ापा भी क्या ख़ूब शै होगा। मन ख़्वाहिशों के पीछे दौड़ना भूलकर विगत की खोह में नाकारा पड़ा बस अपने जलवागर दिनों को सोचा करेगा। आसक्तियों और मुरादों की तरफ़ खुलने वाले सारे गवाक्ष बंद पड़े होंगे। कैसा विलक्षण चैन और आराम होगा।

रात जब आँख खुल गईं तो फिर न लगीं। कितना भारी है किसी बात की फ़िक़्र में रात भर जागते रहना...

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