वे जो स्वयं को भद्र, सम्मानित और सुसंस्कृत मानने और मनवाने का पाखंड करते हैं, उनके व्यवहारों में छिपी या कभी-कभी कतई प्रकट हिंसा—संभवतः सबसे भयावह और सूक्ष्म हिंसा है।
यह बिलकुल आसान नहीं है कि ख़तरा किस ढंग से ख़तरनाक है, यह देखा जा सके।
शब्द—विचार का भोजन, शरीर, दर्पण और ध्वनि हैं। क्या अब आप उन शब्दों के ख़तरे को देखते हैं जो बाहर आना चाहते हैं, लेकिन ऐसा करने में असमर्थ हैं?
आत्यन्तिकता और अराजकता, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और सामान्य मनुष्य के लिए सबसे बड़ा ख़तरा इन्हीं से है।
ख़तरों से घृणा की जाए तो वे और बड़े हो जाते हैं।
भगवान और डॉक्टर की हम समान आराधना करते हैं, परंतु करते तभी हैं जब हम संकट में होते हैं, पहले नहीं। संकट समाप्त होने पर दोनों की समान उपेक्षा की जाती हैं—ईश्वर को भुला दिया जाता है, और डॉक्टर को तुच्छ मान लिया जाता है।
ख़तरा टलते ही ईश्वर का विस्मरण हो जाता है।
जो समुद्र की शांत लहरों से आश्वस्त हो जाता है, वह बड़े ख़तरे में पड़ता है।