दयानंद सरस्वती के उद्धरण
जब विद्वान लोगों में सत्या-असत्य का निश्चय नहीं होता; तभी अविद्वानों को महाअंधकार में पड़ कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ-मित्रता से वाद वा लेख करना, हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो।
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जैसे पशु बलवान् होकर निर्बलों को दुःख देते और मार भी डालते हैं। जब मनुष्य शरीर पा कर वैसा ही कर्म करते हैं, तो वे मनुष्य स्वभावयुक्त नहीं, किंतु पशुवत् हैं। और जो बलवान् होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही मनुष्य कहाता है और जो स्वार्थवश होकर परहानि मात्र करता रहता है, वह जानो पशुओं का भी बड़ा भाई है।
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जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मतमतांतर का विरुद्ध वाद न छूटेगा, तब तक अन्योऽन्य को आनंद न होगा।
जो विद्वान् होता है वह सत्य-असत्य की परीक्षा करके, सत्य का ग्रहण और असत्य को छोड़ देता है।
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जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। विद्यमान जीव का अभाव नहीं हो सकता। देह भस्म हो जाता है, जीव नहीं।
संसार की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जब बहुत सा धन असंख्य प्रयोजन से अधिक होता है, तब आलस्य, पुरुषार्थरहितता, ईर्ष्या, द्वेष, विषयासक्त्ति और प्रमाद बढ़ता है।
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संस्कार के बिना स्मृति और स्मृति के बिना साक्षात् अनुभव नहीं होता।
जहाँ ज्ञाता और ज्ञान होता है, वहीं प्रत्यक्ष होता है अर्थात् आत्मा में सब का प्रत्यक्ष होता है।
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विद्वानों के विरोध से अविद्वानों में विरोध बढ़कर, अनेकविध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती है। इस हानि ने; जो कि स्वार्थी मनुष्यों को प्रिय है, सब मनुष्यों को दुःख-सागर में डुबा दिया है।
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मनुष्य जन्म का होना सत्य-असत्य के निर्णय करने-कराने के लिए है, न कि वादविवाद विरोध करने-कराने के लिए।
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जो मनुष्य पक्षपाती होता है; वह अपने असत्य को भी सत्य और दूसरे विरोधी मत वाले के सत्य को भी असत्य सिद्ध करने में प्रवृत्त होता है, इसलिए वह सत्य मत प्राप्त नहीं हो सकता।
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मंत्र नाम है विचार का। जैसा 'राजमंत्री' अर्थात् राजकर्मो का विचार करने वाला कहाता है, वैसा मंत्र अर्थात् विचार से सब सृष्टि के पदार्थों का प्रथम ज्ञान और पश्चात् किया करने से, अनेक प्रकार के पदार्थ और क्रियाकौशल उत्पन्न होते हैं।
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पुरुषार्थं प्रारब्ध से बड़ा इसलिए है कि जिससे संचित प्रारब्ध बनते हैं, जिसके सुधरने से सब सुधरते और जिसके बिगड़ने से सब बिगड़ते हैं, इसी से प्रारब्ध की अपेक्षा पुरुषार्थ बड़ा हैं।
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वह सत्य नहीं कहाता, जो सत्य के स्थान में असत्य और असत्य के स्थान में सत्य का प्रकाश किया जाए। किंतु जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही कहना, लिखना और मानना सत्य कहाता है।
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जब तक वादी प्रतिवादी होकर; प्रीति से वाद वा लेख न किया जाए, तब तक सत्य-असत्य का निर्णय नहीं हो सकता।
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मनुष्य उसी को कहना कि मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे, अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे।
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जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, वैसे अपने करना, ईश्वर को सर्वव्यापक, अपने को व्याप्त जान के ईश्वर के समीप हम और हमारे समीप ईश्वर है, ऐसा निश्चय योगाभ्यास से साक्षात करना उपासना कहाती है, इसका फल ज्ञान की उन्नति आदि है।
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जो स्वयं धर्म में चलकर सब संसार को चलाते हैं, जिससे आप और सब संसार को इस लोक अर्थात् वर्तमान जन्म में, परलोक अर्थात् दूसरे जन्म में स्वर्ग अर्थात् सुख का भोग करते कराते हैं, वे ही धर्मात्मा जन संन्यासी और महात्मा हैं।
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वस्तुतः जब तीच उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है।
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जीव चाहे जैसा साधन कर सिद्ध होवे तो भी ईश्वर की जो स्वयं सनातन अनादि सिद्धि है, जिसमें अनंत सिद्धि हैं, उसके तुल्य कोई भी जीव नहीं हो सकता। क्योंकि जीव का परम अवधि तक ज्ञान बढ़े तो भी परिमित ज्ञान और सामर्थ्यं वाला होता है। अनंत ज्ञान और सामर्थ्य वाला कभी नहीं हो सकता। देखो कोई भी योगी आज तक ईश्वरकृत सृष्टिक्रम को बदलने वाला नहीं हुआ है और न होगा।
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जो बलवान होकर निर्बल की रक्षा करता है, वही मनुष्य कहलाता है और जो स्वार्थवश परहानि मात्र करता है वह जानो पशुओं का भी बड़ा भाई है।
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संबंधित विषय : मनुष्य
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सोने, चाँदी, माणिक, मोती, मूँगा आदि रत्नों से युक्त आभूषणों के धारण कराने से मनुष्य की आत्मा सुभूषित कभी नहीं हो सकती क्योंकि आभूषणों के धारण करने से केवल देहाभिमान, विषयासक्ति और चोर आदि का भय तथा मृत्यु भी संभव है।
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संबंधित विषय : मनुष्य
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इसका फल यह है कि जैसे परमेश्वर के गुण हैं, वैसे गुण, कर्म, स्वभाव अपने भी करना। जैसे वह न्यायकारी है तो आप भी न्यायकारी होवें। और जो केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणकीर्तन करता जाता है और अपना चरित्र नहीं सुधारता, उसका स्तुति करना व्यर्थ है।
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संबंधित विषय : ईश्वर
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