सौरभ द्विवेदी की रिकमेंडेशन को श्रद्धा से नहीं, संदेह से पढ़ा जाना चाहिए
अतुल तिवारी
20 अप्रैल 2026
रतन राजपुरोहित मेरा सहकर्मी है—युवा, उत्साही, पढ़ाकू और ज़बरदस्त लिक्खाड़। अगर लिखने से कैलोरी बर्न होती, तो वह देश का सबसे फिट आदमी होता। पिछले बुधवार की शाम को, शिफ़्ट ख़त्म होने के बाद उसने मुझसे सेक्टर अठारह के मेट्रो तक छोड़ने का आग्रह किया। बाइक पर बैठने के बाद बातचीत रतन ने ही शुरू की और बताया कि राजस्थान में राजपुरोहित क्षत्रिय-ब्राह्मण होते हैं, “लड़ना सिखाते थे हम राजपूतों को।” उसके बाद महाभारत की अवांतर कथाओं की तरह या शायद लिफ़्ट माँगने के संकोच को ढकने के लिए उसने कहा कि अगले महीने गाँव से अपनी स्प्लेंडर ले आऊँगा। कुछेक सेकेंड मौन रहने के बाद रतन का अगला विषयांतर-वाक्य प्रशंसा का था।
मुझसे उसने कहा, “आप अच्छी हिंदी लिखते हो। आपका लेख पढ़ा मैंने। उसमें एक लाइन बहुत अच्छी लगी। वो बच्चों के ग़ुब्बारे वाली जो लाइन थी न, बहुत मस्त थी।” शुक्रिया के बाद मैंने पूछ ही लिया कि आजकल क्या पढ़ रहे हो? रतन ने बताया कि पिछले महीने सबसे पहले गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी। रद्दी लगी... वह आगे बोला, “जाने किस ज़माने की भाषा है। फिर शुक्ला जी की किताब पढ़ी—दीवार में खिड़की वाली... उसमें बार-बार राजेश प्रसाद, राजेश प्रसाद आता है। साला राजेश प्रसाद हाथी पर बैठ के जा रहा, लुगाई लेकर। दो कौड़ी की किताब है खिड़की वाली।”
बिना कॉमा, पॉज़ और बिना मेरा सवाल लिए रतन राजपुरोहित ने कहा, “ऐसी बात नहीं कि मैं किताब नहीं पढ़ता। लेकिन भाई, कोई तो क्लाइमैक्स दे। बार-बार टट्टी-टट्टी लिख रहा। एक सरप्राइज़ तक नहीं। मेरा तो शुक्ला जी और सौरभ द्विवेदी से विश्वास ही उठ गया। उन्होंने ही यह किताब रिकमेंड की थी। इतना बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बोलना चाहिए था सौरभ जी को। अब वर्मा जी को लाया हूँ। ‘वे दिन’ वाले वर्मा जी। अगर उन्होंने भी निराश कर दिया, तो मैं रद्दी में बेच दूँगा सब। हाँ, उदय प्रकाश की ‘पीली छतरी’ मस्त लगी। अंत में आँसू-से आ गए। अंत में लगा कि अबे यार, ये तो दिल पे मार गया। ये किताब सौरभ जी को रिकमेंड करके रील कटवानी चाहिए थी। बहुत चलती। वो ओवरकॉन्फ़िडेंस में बोल गए, लगता है!”
बिना कॉमा, पॉज़ और बिना मेरा सवाल लिए रतन ने बताया, “मैं रोज़ दस हज़ार शब्द लिखता हूँ। कुछ तो ऐसा होगा न मुझमें भी कि मैं लिख लेता हूँ। मुझे डर है सौरभ जी इंडियन एक्सप्रेस में जाकर भी किताब शुक्ला जी की ही न पढ़ने को कहने लगें।” मैं मन ही मन हिसाब लगा रहा था कि देश में जितना साहित्य लिखा जा चुका है, उसमें आधा योगदान शायद रतन का ही है।
रतन जारी था। उसने कहा, “दीवार में खिड़की कम, झरोखा ज़्यादा है। हर जगह पर राजेश प्रसाद खड़ा।” मैंने सुधार करते हुए कहा कि रघुबर प्रसाद। रतन ने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, वही जो पूछता है कि कौन-सी चड्डी पहनी है?” मैंने फिर सुधार करते हुए कहा कि भाई, वो इंस्टाग्राम पर वायरल होने के लिए कमलिनी महंत नाम की रीलर ने ऐसी वीडियोज़ बनाई थीं। सब कुछ गड्डमड्ड मत करो, भाई! उसने कहा, “नहीं भाई, इसमें भी चड्डी है। ...और टट्टी भी है। टट्टी में ताला भी मारने को भी बोलता है। आप पढ़ना जाकर।”
बिना कॉमा, पॉज़ और बिना मेरी बात पर ध्यान दिए रतन ने बातचीत को फिर से ख़ुद पर केंद्रित किया और कहा, “मैं पढ़ता हूँ बहुत, पर ऐसा थोड़ी है कि चल भाई, चाय के साथ एक किताब हो जाए।”
रतन राजपुरोहित बहुत आत्मविश्वास से भरा आधा रिव्यूअर और आधा रेसलर लग रहा था। मेरी जिज्ञासा बढ़ी। थोड़ा कुरेदना शुरू किया और रतन से प्रेमचंद का ज़िक्र कर दिया। वह कुछ सहमत-असहमत के बीच की मुद्रा में लगा। फिर उसने कहा, “क्लासिक-वासिक कहते हैं लोग, पर प्रेमचंद की कहानी में खाँसी बहुत है।” मैंने कहा, “खाँसी?” बोला, “हाँ, साले सब सीरियस बहुत रहते हैं। लाइफ़ का इतना भी लोड नहीं चाहिए। थोड़ा एंटरटेनमेंट भी ज़रूरी होता है कि नहीं?”
मुझे लगा कि जिस बीमारी से प्रेमचंद का निधन हुआ था, शायद उसकी जानकारी इसने कहीं पढ़ ली है। टीबी की बीमारी में खाँसी बहुत आती है मरीज़ों को। इसीलिए इसने टीबी और उनकी कहानियों को एक ही श्रेणी में डाल दिया। रतन का पाठ्य-पैटर्न समझने के लिए मैंने एक सवाल और उछाला और उससे पूछा, “ऐसे तो तुम श्रीलाल शुक्ल की ‘राग दरबारी’ से भी उम्मीद करोगे कि इसमें एक-दो गाना होना चाहिए?” रतन ने इस माँग से इनकार किया, “नहीं, गाने-वाने नहीं होने चाहिए, पर ये हिंदी में साला इतने शुक्ला भी नहीं होने चाहिए।”
साहित्य, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय का ऐसा खिचड़ी संस्करण मैंने पहले नहीं देखा था। अभी तो मैं यह बातें आपको खोलकर बता रहा हूँ, लेकिन धीमी चलती मेरी मोटरसाइकिल के पीछे बैठा रतन बहुत तेज़ गति से वाक्यों का उच्चारण कर रहा था।
ख़ैर! मेट्रो-स्टेशन क़रीब आया। रतन उतरा और निष्कर्ष का एक वाक्य दिया, “देखो भाई, मैं सब समझ गया हूँ। दुनिया की सारी किताबें कुल-मिलाकर दो तरह की हैं। एक, जो समझ में नहीं आती। दूसरी, जो बहुत जल्दी ख़त्म हो जाती हैं। मैं किताब की इंटेंशन पकड़ लेता हूँ।” शुक्रिया के बाद रतन ने विदा-वाक्य में कहा, “अगले महीने स्प्लेंडर ला रहा हूँ।”
रतन ने मुझे दो तरह की किताबें बताईं, पर मैंने अपने विवेक से जो दो बातें समझीं—पहली यह कि हिंदी साहित्य में ‘शुक्ला घनत्व नियंत्रण क़ानून’ होना चाहिए। दूसरी यह कि सौरभ द्विवेदी की रिकमेंडेशन को अब श्रद्धा से नहीं, संदेह से पढ़ा जाना चाहिए। ...और कहानी में लड़ाई, प्यार या पुलिस तो होनी ही चाहिए। मुझे रतन के उस रिव्यू का इंतज़ार है, जब वो वर्मा जी को पढ़ेगा और मुझसे कहेगा, “यार, ये वर्मा जी मौसम के बारे में बहुत बता रहे... मुझे पिकनिक थोड़ी प्लान करनी है!”
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