वेंकी रामकृष्णन के उद्धरण
सैद्धांतिक रूप से यह संभव है कि हम जैसे-जैसे उम्र को मात देना सीख लें, वैसे-वैसे हम अपनी घटती मानसिक क्षमताओं के बारे में भी कुछ कर सकें, लेकिन अभी तक मस्तिष्क को जीतना सबसे मुश्किल काम साबित हुआ है।
अनुवाद : अमित कुश
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ज़रूरी नहीं कि स्वस्थ बुढ़ापे की दिशा में होने वाली प्रगति, हमें बाद के वर्षों में भी युवावस्था जैसा रचनात्मक और कल्पनाशील बनाए रखे। युवा दुनिया को नई नज़रों से और नए तरीक़ों से देखते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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जब बड़ी और हानिकारक तकनीकें सामने आती हैं, तो हम हमेशा उनके लंबे समय के असर को समझ नहीं पाते।
अनुवाद : अमित कुश
सामाजिक रूप से अलग-थलग रहना और अकेलापन; वैसे तो सभी लोगों के कल्याण के लिए हानिकारक है, लेकिन बुज़ुर्गों पर विशेष रूप से असर डालता है।
अनुवाद : अमित कुश
जीवनकाल में वृद्धि के सामाजिक परिणाम बहुत गंभीर हैं। रिटायरमेंट के बाद के लिए, सरकारी सहायता वाले लगभग सभी कार्यक्रमों में यह माना जाता है कि लोग अधिकतम पैंसठ साल की उम्र में काम करना बंद कर देंगे। यह मानक तब तय किया गया था, जब लोग रिटायर होने के बाद कुछ ही साल जीवित रहते थे, लेकिन आज वे इसके बाद आमतौर पर दो दशक तक ज़िंदा रहते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
अगर हम 'अस्वस्थता के संकुचन' के बिना जीवनकाल बढ़ा देंगे, तो इससे हमारी मौजूदा समस्याएँ और बढ़ जाएँगी, लेकिन अगर शोधकर्ता उम्र बढ़ने को मात देने और अस्वस्थता के संकुचन में सफल रहते हैं, तो हम यह दृश्य देख सकते हैं कि लोग आमतौर पर सौ साल से ऊपर भी स्वस्थ जीवन जी रहे हैं और संभवतः उम्र की लगभग एक सौ बीस साल की प्राकृतिक सीमा के पास पहुँच रहे हैं।
अनुवाद : अमित कुश
यह केवल विज्ञान और गणित की बात नहीं है कि हमारी रचनात्मक शक्ति अपेक्षाकृत युवा रहते हुए चरम पर होती है। व्यापार और उद्योग में भी यही बात सच है। थॉमस एडिसन ने जब न्यू जर्सी में 'मेन्लो पार्क लैबोरेट्री' की शुरुआत की, तब उनकी उम्र तीस से कम थी। इसके कुछ ही समय बाद, उन्होंने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया। आज की दुनिया में नई खोज करने वाली ज़्यादातर कंपनियों, जैसे गूगल, एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट और एआई कंपनी डीपमाइंड की शुरुआत बीस या तीस के दशक में चल रहे लोगों ने की थी।
अनुवाद : अमित कुश
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हमारे भीतर बुद्धिमानी का ज़्यादातर हिस्सा तीस साल पार करने के बाद आता है। उसके बाद हम अपने तौर-तरीक़ों में ढलते जाते हैं और बुद्धिमान होने के साथ-साथ, प्रतिक्रियावादी होने की संभावना भी बढ़ जाती है।
अनुवाद : अमित कुश
जीवन अरबों वर्षों से निरंतर चल रहा है, जबकि हम व्यक्तियों के रूप में आते हैं और चले जाते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
जीवनकाल में अत्यधिक वृद्धि का पक्ष लेने वालों के पास कोई वास्तविक समाधान नहीं है। सिवाए यह कहने कि जब समस्याएँ हमारे सामने आएँगी, तो हम उनसे निपटना सीख लेंगे। कुछ ने कहा कि अगर हमारे सामने जीवनकाल बहुत बढ़ जाने से जनसंख्या की समस्या पैदा होगी, तो हमें एक निश्चित उम्र पर पहुँच जाने के बाद, धरती छोड़कर किसी दूसरे ग्रह पर बस जाना चाहिए।
अनुवाद : अमित कुश
क्या यह सोचना घमंड करना है कि हम विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करके मृत्यु को धोखा दे सकते हैं? और अगर ऐसा ही है, तो फिर हमारा लक्ष्य इसके बजाए क्या होना चाहिए?
अनुवाद : अमित कुश
हम सभी जानते हैं कि लोग अलग-अलग रफ़्तार से बूढ़े होते हैं। कुछ पच्चास की उम्र में बूढ़े लगने लगते हैं, जबकि अन्य अस्सी तक भी अपेक्षाकृत युवा नज़र आते हैं। इसका कुछ श्रेय आनुवांशिकी को दिया जा सकता है, लेकिन तनाव और मुश्किलें भी बुढ़ापा जल्दी लाते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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जब आमतौर पर भोजन की कमी रहती थी; तब मोटे होने की संभावना वाले लोग भी कम मिलते थे, लेकिन अब कैलोरी से भरपूर भोजन ने मोटापे की समस्या को भी बढ़ा दिया है। ख़ासतौर पर उन लोगों में; जिनके भीतर ऐसे जीन मौजूद हैं, जिनसे पुराने समय में कोई हानि नहीं हुई। इसके अलावा ऐतिहासिक रूप से भी, हमारे पास संयमपूर्वक खाने के कुछ कारण थे।
अनुवाद : अमित कुश
मैं जिस भारत में बड़ा हुआ; वह कई धमों की धरती है और ऐसा कोई समय दिखाई नहीं देता, जब कोई-न-कोई वर्ग उपवास न कर रहा हो।
अनुवाद : अमित कुश
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बूढ़ा होता शरीर इतने अधिक तरीक़ों से बदलता है कि यह पता लगाना मुश्किल है कि उम्र किन कारणों से बढ़ रही है, और कौन-से केवल इसका परिणाम हैं; लेकिन वैज्ञानिकों ने उम्र बढ़ने के कुछ लक्षणों पर ध्यान केंद्रित किया है। इनमें तीन ख़ास गुण होने चाहिए : पहला, यह बूढ़े होते हुए शरीर में ज़रूर हो; दूसरा इस लक्षण की ज़्यादा मात्रा से बूढ़े होने की गति बढ़नी चाहिए; और तीसरा इसकी मात्रा कम करने या पूरी तरह रोक देने से बूढ़ा होने की दर घट जानी चाहिए।
अनुवाद : अमित कुश
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संज्ञानात्मक क्षमता में कमी की पूर्ति, अधिक बुद्धिमानी से हो जाती है। उल्लेखनीय है कि अधिक बुद्धिमानी एक धुंधला गुण है, जिसकी सही परिभाषा भी उपलब्ध नहीं है। यह सच है कि युवाओं में आमतौर पर अधिक बुद्धिमानी और दूरदर्शिता की कमी होती है, जिससे उनका व्यवहार रुख़ा हो जाता है, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि एक निश्चित उम्र के बाद बुद्धिमानी बढ़ने लगती है।
अनुवाद : अमित कुश
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मानव-इतिहास के ज़्यादातर हिस्से में, जीवन का अनुमान केवल तीस वर्ष से कुछ ज़्यादा था, लेकिन आज विकसित देशों में, हम अस्सी के दशक के बीच की उम्र तक पहुँचने की उम्मीद कर सकते हैं। तुलनात्मक रूप से ग़रीब देशों में भी आज पैदा होने वाला व्यक्ति; सबसे अमीर देशों के नागरिकों के दादा-दादी की तुलना में, लंबे जीवन की उम्मीद कर सकता है। विज्ञान के लेखक स्टीवेन जॉनसन कहते हैं कि यह कुछ ऐसा है, मानो हम में से प्रत्येक एक अतिरिक्त संपूर्ण जीवन हासिल कर रहा हो।
अनुवाद : अमित कुश
मोटापे की समस्या बढ़ने के क्या कारण हैं, इससे अलग किसी को भी इस बात पर संदेह नहीं है कि सही वज़न तक पहुँचना, और उसे बनाए रखना अच्छे स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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हम्पी जैसा संपन्न और जीवंत शहर कैसे नष्ट हो सकता है, और आज उसका अस्तित्व कैसे ख़त्म हो सकता है? पूरे इतिहास में, किसी भी समाज को टुकड़े-टुकड़े करने का सबसे तेज़ तरीक़ा, कानून-व्यवस्था ख़त्म कर देना था और यह स्थिति किसी नागरिक अंसतोष या युद्ध के कारण सरकारी नियंत्रण ख़त्म होने से आती थी।
अनुवाद : अमित कुश
जीवन के विस्तार की इच्छा रखना, मरीचिका के पीछे भागने जैसा है। असली अमरता से कम कुछ भी, कभी पर्याप्त नहीं होगा और वह कभी नहीं होती। अगर हम बुढ़ापे पर जीत हासिल कर लें, तो भी हम हादसों, युद्ध, महामारी या पर्यावरण की त्रासदियों में जान गंवा सकते हैं। सबसे सरल यह होगा कि हम मान लें कि जीवन सीमित है।
अनुवाद : अमित कुश
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मौत के बारे में जानना इतना भयानक है कि हम अपने जीवन का ज़्यादातर हिस्सा इससे इनकार करने में ही बिता देते हैं और जब कोई मरता है, तो हमें इसे स्पष्ट रूप से कहने में संकोच होता है; और इसके बजाए हम इसे थोड़ा लाग-लपेट कर कहते हैं, जैसे—वह चल बसे या गुज़र गए, जिससे ऐसा लगता है कि मृत्यु अंतिम नहीं है, बल्कि किसी दूसरी चीज़ में केवल परिवर्तन है।
अनुवाद : अमित कुश
लगभग सभी संस्कृतियों में उपवास और सामान्य रूप से कहें, तो संयम को लंबे और स्वस्थ जीवन का आधार माना गया है और लालच को बुराई।
अनुवाद : अमित कुश
समाज में कानून-व्यवस्था की गड़बड़ी से अव्यवस्था और सामूहिक भुखमरी फैल सकते हैं, यहाँ तक कि पूरे शहरों और सभ्यताओं का विनाश हो सकता है। अशांत परिस्थितियों में, सबसे बुरे आपराधिक तत्त्व अक्सर फ़ायदा उठा लेते हैं। ताक़त छीन लेते हैं और बाकी सभी लोगों के लिए जीना मुश्किल कर देते हैं। इसी प्रकार, जीव-विज्ञान में नियंत्रण खो देना, विनाश और मृत्यु की ओर ले जा सकता है। साथ ही, यह कई बीमारियों को भी न्योता दे सकता है। अगर कोशिकाएँ सही से काम न करें, तो इसके परिणामों का सबसे बुरा उदाहरण कैंसर है। इसमें गड़बड़ी वाली कोशिकाओं को पड़ोसी कोशिकाएँ रोकती नहीं हैं, बल्कि इसके बजाए वे बिना नियंत्रण के कई गुना बढ़ती हैं और सारे ऊतकों और अंगों को अपने कब्ज़े में लेकर, उनके काम-काज में दख़ल देने लगती हैं। इस संदर्भ में कैंसर और उम्र बढ़ने का आपस में गहरा संबंध है : वे दोनों ही जैविक अनियंत्रण से पैदा होते हैं, और उनका अंतिम स्रोत आमतौर पर हमारे जींस में होने वाले उत्परिवर्तन हैं, जिनका कारण हमारे डीएनए में होने वाले बदलाव होते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
एक लोकप्रिय मान्यता यह है कि हमारे पूरे इतिहास में, भोजन बहुत दुर्लभ और छिटपुट तरीक़े से उपलब्ध होता था और जिनके भीतर फैट जमा करने का किफ़ायती जीन होता था, वे अकाल के समय में बेहतर तरीक़े से जीवित रह सकते थे।
अनुवाद : अमित कुश
फिजिशियंस इस बात से हैरान हैं कि कितने ही लोग अपनी ज़िंदगी लंबी करने के लिए हर तरीका अपनाना चाहते हैं, भले ही कुछ हफ़्तों या कुछ दिनों की हो। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो भयानक दर्द देने वाली घातक बीमारियों से पीड़ित हैं।
अनुवाद : अमित कुश
हमारे शरीर की ज़्यादातर कोशिकाएँ, हमारे मरने से पहले कई बार मरती हैं और उनकी जगह नई कोशिकाएँ आ जाती हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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विकास के नियम सभी प्रजातियों पर लागू होते हैं और जीवन के सभी प्रकार, एक जैसे तत्त्वों से मिलकर बनते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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ज़िंदा रहने की इच्छा हमारे भीतर गहराई तक बसी हुई है, भले ही हम अपने अधिक तार्किक पलों में आशावादी हों।
अनुवाद : अमित कुश
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जब हम जीवन-प्रत्याशा यानी अनुमानित जीवनकाल की बात करते है, तो हमारा मतलब जन्म के समय जीवन-प्रत्याशा से होता है, या कहें कि अगर मौजूदा मृत्यु दर नहीं बदली, तो नवजात औसत रूप से कितने वर्षों तक जीवित रहेगा।
अनुवाद : अमित कुश
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कम कैलोरी वाला भोजन खाने वाले चूहे; कितना भी खा लेने वाले चूहों की तुलना में, ज़्यादा लंबे समय तक जीवित और स्वस्थ रहे।
अनुवाद : अमित कुश
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अमेरिकी भविष्यवादी और वैज्ञानिक रॉय अमारा का कहना है कि हमारी आदत है कि हम तकनीक के कम समय में असर का ज़रूरत से ज़्यादा आकलन कर लेते हैं, और लंबे समय में इसके असर को कम करके देखते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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जीन में मौजूद सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी में से एक यह है कि प्रोटीन का निर्माण कैसे किया जाता है। आमतौर पर हम प्रोटीन को केवल अपने खाने के ज़रूरी हिस्से के रूप में देखते हैं, और जानते हैं कि माँसपेशियों को स्वस्थ रखने के लिए यह उपयोगी है। वास्तव में हमारे शरीर में हज़ारों तरह के प्रोटीन होते है। वे शरीर को आकार और ताक़त ही नहीं देते, बल्कि उनमें जीवन के लिए ज़रूरी कई रासायनिक प्रक्रियाएँ भी होती हैं। वे कोशिका के भीतर और बाहर, अणुओं के बहाव को नियंत्रित करते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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आज हम क़रीब एक सदी पहले की तुलना में लगभग दोगुने समय तक ज़िंदा रहते हैं, लेकिन हम उस अतिरिक्त जीवनकाल से संतुष्ट नहीं हैं। बल्कि हम मौत के बारे में और ज़्यादा सोचने लगे हैं। अगर हम एक सौ बीस या डेढ़ सौ साल तक ज़िएँगे, तब इस बात पर कुढ़ेंगे कि हम तीन साल तक क्यों नहीं जी सकते।
अनुवाद : अमित कुश
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धरती पर वायरस मनुष्य से कहीं पहले से मौजूद रहे हैं, परिस्थितियों के अनुसार ख़ुद को बहुत तेज़ी से ढाल लेते हैं और हमारे जाने के बाद भी लंबे समय तक यहाँ रहेंगे।
अनुवाद : अमित कुश
डार्विन के बाद से सभी जीव-विज्ञानी यह देखकर अचंभे में रहे कि विकास—जो केवल सबसे उपयुक्त को चुनने की प्रक्रिया है, या जीन को अगली पीढ़ी में भेजने की प्रत्येक प्रजाति की योग्यता है—ने धरती पर जीवन के प्रकार की आश्चर्यजनक क़िस्मों को बढ़ावा दिया।
अनुवाद : अमित कुश
हम यह सोचकर नहीं जीते कि हम जिस शहर में रहते हैं, वह एक दिन मिट जाएगा। फिर भी शहर और पूरा समाज, साम्राज्य और सभ्यता-उपक्रम विकसित होते हैं और ख़त्म हो जाते हैं। ठीक वैसे, जैसे कोशिकाएँ मरती हैं।
अनुवाद : अमित कुश
समस्याओं के लिए तकनीकों द्वारा तैयार हल, और भी अधिक अवास्तविक लगने वाली तकनीक महसूस होती हैं।
अनुवाद : अमित कुश
हमारी मृत्यु हमें धरती पर, अपने समय का ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग करने की प्रेरणा और इच्छा दे सकती है। बहुत अधिक समय तक खींचा गया जीवनकाल, हमारे जीवन को आकस्मिकता और अर्थ रहित कर देगा, जबकि यह ऐसी इच्छा होती है, जिसमें हर दिन कीमती लगता है।
अनुवाद : अमित कुश
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चिकित्सा के क्षेत्र में होने वाले विकास में हमेशा असमानता बढ़ाने की ताक़त होती है।
अनुवाद : अमित कुश
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हम एक चौराहे पर खड़े हैं। जीव-विज्ञान में क्रांति जारी है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और कंप्यूटिंग, भौतिकी, रसायन-विज्ञान और इंजीनियरिंग को उस क्षेत्र में लाया जा रहा है, जो कभी जीव-विज्ञानियों का अधिकार था। आज वे मिलकर नई तकनीकें और तेज़ी से प्रभावशाली उपकरण तैयार कर रहे हैं, जिससे बुढ़ापे सहित जीवन के विज्ञान के हर पहलू में विकास के लिए कोशिकाओं और जीन में बदलाव किया जा सके।
अनुवाद : अमित कुश
कल्पना की यह विफलता हम तक व्यक्तिगत रूप से भी फैली हुई है। भले ही हम यह जानते हैं कि हम बूढ़े भी होंगे और मरेंगे भी, फिर भी अपने रोज़मर्रा के जीवन में हम यही सोचते रहते हैं कि हम अमर हैं। बशर्ते, हम गंभीर रूप से बीमार न हों।
अनुवाद : अमित कुश
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यह उल्लेखनीय है कि आज जीवित प्रत्येक जीव अरबों साल पहले मौजूद प्राचीन कोशिका का सीधा वंशज है। इसलिए समय के साथ बदलाव और विकास के बावजूद, हम सभी में कुछ-न-कुछ अंश कुछ अरब वर्षों से लगातार बना हुआ है। हर सजीव चीज़ में यह बात तब तक सच रहेगी, जब तक धरती पर जीवन रहेगा। बशर्ते, हम एक दिन पूरी तरह कृत्रिम जीवन तैयार न कर दें।
अनुवाद : अमित कुश
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प्रत्येक कोशिका में हमेशा व्यक्त रहने वाले जीव होते हैं, क्योंकि हर कोशिका को उनकी ज़रूरत होती है।
अनुवाद : अमित कुश
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अनेक वैज्ञानिक जब थोडे बढ़े हो जाते हैं, तो वे प्रथम श्रेणी का काम अपनी प्रयोगशाला से करना जारी रखते हैं। हालाँकि इसका कारण यह नहीं है कि वे ख़ुद तेज़ दिमाग़ और नएपन वाले होते हैं, बल्कि वे एक बैंड नाम बन चुके होते हैं, उनके पास संसाधन और धन जमा होते हैं, और वे काम करने के लिए प्रथम श्रेणी के वैज्ञानिकों को आकर्षित कर सकते हैं।
अनुवाद : अमित कुश
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स्पष्ट तौर पर; ज़रूरत से ज़्यादा खाना सेहत के लिए बुरा है, लेकिन क्या इसका उल्टा भी सच है?
अनुवाद : अमित कुश
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यह स्पष्ट नहीं है कि पूरे अतिरिक्त जीवनकाल के साथ भी, हम अतीत के महान लेखकों, कंपोज़र्स, कलाकारों और वैज्ञानिकों से ज़्यादा उपलब्धियाँ हासिल कर रहे हैं या नहीं। अंततः यह हो सकता है कि हम बहुत लंबा जीवन जिएँ, लेकिन वह बोरियत भरा और बिना किसी उद्देश्य के हो।
अनुवाद : अमित कुश
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ज़्यादातर अध्ययन यह कहते हैं कि हमारी सामान्य संज्ञानात्मक क्षमताएँ भी उम्र के साथ कम हो जाती हैं, लेकिन इस बात पर भी चर्चा होती रही है कि यह सटीक रूप से किस समय होता है? कुछ लोग तर्क देते है कि इसकी शुरुआत अट्ठारह साल की कम उम्र में ही हो जाती है, जबकि कुछ अन्य कहते हैं कि यह केवल साठ साल की उम्र के बाद प्रमुखता से महसूस होता है।
अनुवाद : अमित कुश
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जीवन का आरंभ कब होता है; यह प्रश्न जितना वैज्ञानिक है, उतना ही सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। इसका प्रमाण गर्भपात पर की जाने वाली बहस है।
अनुवाद : अमित कुश
हम मनुष्य भी अपनी कोशिकाओं से बहुत अलग नहीं हैं। हम समूहों में अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं: कंपनियाँ, शहर और समाज। किसी बड़ी कंपनी से एक कर्मचारी के चले जाने पर उस कंपनी का कामकाज प्रभावित नहीं होता और शहर या देश के मामले में यह और भी कम होता है। ठीक इसी तरह, किसी एक पेड़ के मर जाने से जंगल के अस्तित्व के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन अगर बहुत महत्त्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति, जैसे पूरा सीनियर मैनेजमेंट अचानक कंपनी छोड़ दें, तो कंपनी की सेहत और भविष्य, दोनों संदिग्ध हो जाएँगे।
अनुवाद : अमित कुश