देह की देहरी पर परिवार और समाज का पहरा
सियाराम शर्मा
18 मई 2026
जया जादवानी अत्यंत संवेदनशील कथाकार हैं। मानवीय रिश्तों की बारीकियों, जटिलताओं और गहराई को उन्होंने अपनी कहानियों में बहुत ख़ूबसूरती से अभिव्यक्त किया है। बाहरी संसार की विविध छवियों, घटनाओं, स्थितियों के साथ आंतरिक जीवन की हलचलों, पीड़ाओं, बेचैनियों को अभिव्यक्त करने वाली अत्यंत ही कोमल और पारदर्शी भाषा उनके पास है। स्त्री की स्वतंत्रता, मुक्ति और आज़ादी की प्रबल आकांक्षा उनके कथा-संसार का अभिन्न हिस्सा है। जीवन के नए से नए क्षेत्रों के अनुभवों को जानने, समझने, महसूस करने के साथ उनमें उसे अभिव्यक्त करने का साहस भी है। इस अमानवीय दौर में कुछ नैसर्गिक कमियों की वजह से थर्ड जेंडर समुदाय को समाज से मिलने वाले घोर अपमान, उपेक्षा, तिरस्कार और हिंसा के दंश को उन्होंने अपनी चेतना पर महसूस किया और उनकी देह की क़ैद में तड़पते, उठते ज्वार और पछाड़ खाती तूफ़ानी लहरों पर केंद्रित उपन्यास ‘देह कुठरिया’ की रचना की। उनका नवीनतम उपन्यास ‘काया’, लेस्बियन (समलैंगिक रिश्तों) संबंधों पर केंद्रित है।
लेस्बियन सोच, विचार, व्यवहार और साहित्य कोई नया फ़ैशन नहीं है। पश्चिम में प्राचीन यूनानी कवयित्री सप्फो ऑफ़ लेस्बोस (Sappho of Lesbos), 630 ईसा पूर्व, की कविताओं में इसकी झलक मिलती है। हमारे यहाँ वात्स्यायन के ‘कामसूत्रम्’ में भी इस प्रवृत्ति का ज़िक्र है। खजुराहो की मूर्तियों में भी इस कटु सत्य के दर्शन होते हैं। उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में वर्नोन ली एवं एमी लेवी जैसी लेखिकाओं के यहाँ इसका ज़िक्र है। चीनी कवयित्री वू त्साओ की कविताओं में भी लेस्बियन रुझान देखने को मिलता है। बीसवीं सदी में रेडक्लिफ़ हॉल के उपन्यास ‘द वेल ऑफ़ लोनलीनेस’ (1928 ई.) को अँग्रेज़ी का पहला लेस्बियन उपन्यास माना जाता है, जिसे अश्लीलता के आरोप में प्रतिबंधित किया गया। 1952 में प्रकाशित पैट्रिशिया हाईस्मिथ की पुस्तक ‘द प्राईस ऑफ़ सॉल्ट’ सुखद अंत वाला प्रथम लेस्बियन उपन्यास है। एलिस वॉकर की ‘द कलर पर्पल’ ब्लैक लेस्बियन अनुभवों पर आधारित उपन्यास है।
भारतीय संदर्भ में रूथ वनिता की ‘सप्फो एंड द वर्जिन मेरी’ इस विषय पर महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। विद्रोही लेखिका इस्मत चुगतई की कहानी ‘लिहाफ़’ में भी इस सच्चाई का प्रतीकात्मक बयान है। हिंदी में राजकमल चौधरी ने अपने उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ में स्त्री समलैंगिकता को प्रमुखता से उठाया था। लेस्बियन साहित्य प्रेम, इच्छा, कामना और आत्मस्वीकृति के माध्यम से स्त्री समलैंगिकता के प्रति सामाजिक भेदभाव किए जाने का प्रतिरोध करता है। स्त्रीवादी विचारधारा से प्रभावित होते हुए भी यह पितृसत्ता के ढाँचे को चुनौती देता है। यह स्त्रियों के पारस्परिक लगाव, प्रेम, अंतरंगता का बिना किसी अपराधबोध के उत्सव मनाता है।
विश्व की अधिकांश विकसित सभ्यताएँ पितृसत्तात्मक रही हैं। पुरुषों ने ही स्त्रियों की छवियाँ गढ़ी। उसी ने उनके लिए आईने बनाए। उसी के अनुरूप उसमें अपना प्रतिबिंब देखा। उनकी नैतिकता, मूल्य, आदर्श और दायरे सब कुछ पुरुषों ने तय किए। उसे पुरुष पर यौनिक, भावनात्मक और आर्थिक निर्भरता के लिए परिवार, समाज, धर्म और संस्कृति के द्वारा अनुकूलित किया गया। उसने अपनी देह और देह-भाषा को पुरुष के अनुरूप ढाला। सिमोन द बोउवार ने कहा भी है, “स्त्री का शरीर पुरुष की इच्छा का प्रतिबिंब है, लेकिन वह ख़ुद भी इच्छा कर सकती है।”
यह आवश्यक नहीं है कि वह पुरुष के अनुरूप, पुरुष के मुहावरे में ही अपने बारे में सोचे। यहीं से एक वैकल्पिक रास्ता खुलता है। वह अपने यौनाकर्षण और यौन संबंधों के बारे में नए सिरे से विचार कर सकती है। एड्रिन रिच जैसी महत्त्वपूर्ण लेस्बियन चिंतक कहती हैं, “महिलाओं के लिए अनिवार्य विषम यौनिकता, स्वाभाविक नहीं, थोपी हुई है।” एक स्त्री दूसरी स्त्री से वैसे ही प्यार कर सकती है, जैसे स्त्री और पुरुष। शायद उससे भी बेहतर, निर्मल, पवित्र और सुंदर। संभव है उस प्रेम में वैसी आक्रामकता और हिंसा न हो, जैसी स्त्री और पुरुष के प्रेम में पाई जाती है। जिस तरह प्यार जाति, धर्म, ऊँच-नीच, अमीर-ग़रीब, रंग-रूप और उम्र के बंधनों को नहीं मानता, उसी तरह वह लिंग के भेद को भी नकार सकता है।
लेस्बियन सोच, विचार, चिंतन और व्यवहार में पितृसत्ता से इंकार उसकी पहली सीढ़ी है। इस सोच की स्त्रियाँ शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक स्तर पर पुरुष निर्भरता और पुरुष द्वारा परिभाषित होने से इंकार करती हैं। वह स्वयं को दूसरों की अपेक्षा ख़ुद की चाहतों और इच्छाओं के अनुरूप देखती हैं। वे वर्षों से पूर्व निर्धारित वर्जनाओं, प्रतिबंधों और सीमाओं को तोड़ती हैं और साहस के साथ अपने समलिंगी आकर्षण को स्वीकार भी करती हैं। इस तरह वे सदियों से चली आ रही पुरुषों के वर्चस्व और अधिकार को चुनौती देती हैं। लेस्बियन विचार और व्यवहार सिर्फ़ स्त्रियों के बीच यौन संबंधों तक सीमित नहीं है। वे शारीरिक, भावनात्मक, वैचारिक, पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी एक दूसरे से जुड़ती हैं। उनमें अनेक स्तरों पर अपनी निर्भरता, सहयोग, दायित्वबोध और समझदारी का गहरा एहसास होता है। उनमें प्रेम और कामुकता के साथ पितृसत्ता से स्वायत्तता, स्वतंत्रता और मुक्ति का बोध भी शामिल होता है। यह नए तरह का मानवीय संबंध है, जिसे स्त्री-पुरुष संबंधों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता।
आज पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी, फ़ाशीवादी, नाज़ीवादी विचारधारा का फैलाव हो रहा है। इस विचारधारा से प्रभावित लोगों का शुद्धतावादी दृष्टिकोण किन्नरों और समलैंगिकों के प्रति दमनकारी और शत्रुतापूर्ण रहा है। इस विचारधारा के अंतर्गत उन्हें अनैतिक, अवांछनीय और अपराधी समझा जाता है। इन समुदायों की यौनिकता और लैंगिक पहचान उन्हें अपने पारंपरिक नस्लवादी शुद्धता के ख़िलाफ़ जान पड़ता है। नाज़ी जर्मनी में समलैंगिकता, चाहे वह स्त्री से जुड़ी हो या पुरुष से, उसे कमज़ोरी, विकृति एवं राष्ट्रविरोधी कृत्य माना गया। फ़ाशीवाद और नाज़ीवाद के उभार के इस दौर में जया जादवानी के द्वारा किन्नरों पर ‘देह कुठरिया’ और लेस्बियन पर ‘काया’ जैसे उपन्यासों का लिखा जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इन नए अनुभवों की दुनिया में प्रवेश करना, उन्हें समझना और उनकी पीड़ाओं को महसूस करना लेखिका के लिए आसान नहीं रहा होगा।
प्रेम में जेंडर महत्त्वपूर्ण नहीं होता। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से प्रेम करता है। स्त्री-पुरुष का प्रेम जितना स्वाभाविक है, उतना ही दो स्त्रियों के बीच का प्रेम भी। सारा वॉटर्स कहती हैं, “प्रेम प्रेम है, चाहे वह दो औरतों के बीच हो या किसी और के बीच।” इसमें अप्राकृतिक जैसा कुछ भी नहीं है। दो स्त्रियों के मिलने की उत्सुकता, आकांक्षा, आवेग और आतुरता भी उतनी ही सघन और सुंदर हो सकती है, जितनी स्त्री और पुरुष की। उनके बिछड़ने की पीड़ा भी उतनी ही मारक और त्रासद होती है। इस उपन्यास की मुख्य चरित्र काया-नोरा, मालू, हया, सारा, आहना जैसी लगभग दस समलिंगी लड़कियों की तरफ़ परस्पर आकर्षित होती हैं। बार-बार रिश्तों की टूटन की खरोंच को वह अपने दिल, दिमाग़ और आत्मा पर महसूस करती है। कई लड़कियों का पारस्परिक समलिंगी रिश्ता तब तक क़ायम रहता है, जब तक विपरीत लिंगी प्रेम की तलाश पूर्ण नहीं होती। इनके बीच के ज़्यादातर रिश्ते घर, परिवार और समाज के दबाव में टूटते हैं, क्योंकि हमारा समाज इन्हें मान्यता नहीं देता। इनकी समस्या यह है कि वे पुरुषों के साथ रहना नहीं चाहतीं और स्त्रियों के साथ परिवार और समाज रहने की इजाज़त नहीं देता। वे अपनी इच्छा और आकांक्षा के विरूद्ध घुट-घुट कर अनचाही ज़िंदगी जीने को मजबूर होती हैं। वे पारिवारिक, सामाजिक नैतिकता और ख़ुद की चाहतों और इच्छाओं की टकराहटों में टूटती और बिखरती हैं।
‘काया’ परिवार की विफलता को भी उद्घटित करता है। परिवार कोई बहुत पवित्र संस्था नहीं है। ऐंगेल्स ने अपने समय के उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया था कि परिवार का जन्म निजी संपत्ति के उदय के साथ हुआ। संपत्ति परिवार से बाहर न जाए, यही इसकी संरचना के केंद्र में है। राज्य की तरह परिवार भी सत्ता का एक केंद्र है और हर सत्ता की तरह यह भी दमनकारी और उत्पीड़नकारी है। प्रेम स्त्री और पुरुष के बीच का हो या समलिंगी स्त्रियों का, इसमें सबसे बड़ी बाधा परिवार ही खड़ा करती है। पितृसत्ता और उसके द्वारा अनुकूलित स्त्रियों को प्रेम चुनौती देता है। उसकी अधीनता को अस्वीकार करता है। अतः वे उन्हें अपनी तथाकथित पारिवारिक वर्चस्व और इज़्ज़त के ख़िलाफ़ पाते हैं और इसके लिए उत्पीड़न के हर औज़ार, बलात्कार और हत्या तक का इस्तेमाल करते हैं। उपन्यास की नायिका काया जब अपनी माँ के समक्ष खुलासा करती है कि वह लड़कियों को पसंद करती है और उनसे ही शादी करेगी तो माँ पहले तो चकित होती है, फिर वह उसके फ़ौजी पिता के साथ मिलकर अपने घर में गाँव के तीन लड़कों को बुलाकर पुरुष से यौनानुभव का स्वाद चखाने के लिए रोंगटे खड़े कर देने वाले बलात्कार में सहायक बनती है। उसके बाद मन, शरीर और आत्मा से घायल और टूटी हुई काया अंततः अपने परिवार को छोड़कर घर से भागने को विवश होती है।
काया ही नहीं, उसकी दोस्त सारा का भी छह-सात वर्ष की अवस्था में ग्यारहवीं में पढ़ने वाले उसके सगे भाई के द्वारा कई बार बलात्कार किया जाता है और जब वह अपने भाई से डरकर दूर भागने लगती है तो माँ-पिता के द्वारा उसे ही डाँटा जाता है कि वह अपने भाई से लड़ती क्यों है? जब लड़कियाँ परिवार में भी सुरक्षित नहीं हैं तो आख़िर वे कहाँ जाएँ? क्या सचमुच स्त्रियों का कोई घर नहीं होता! ठीक ही कहा जाता है। परिवार स्त्रियों का पहला वधस्थल है। उसकी सबसे पहली हत्या परिवार के भीतर ही होती है। इसलिए वे स्थायी रूप से ख़ानाबदोश हैं।
परिवार की तरह विवाह को भी हमारे समाज में बहुत पवित्र दर्जा प्राप्त है। उसे जन्म जन्मांतरों का रिश्ता माना जाता है लेकिन विवाह स्त्री की उत्पीड़न का वैध लाइसेंस है। उसके लौह आवरण से बाहर आना स्त्री के लिए बहुत मुश्किल है। अंततः उस तंग दायरे में घुट-घुट कर जीना और मरना ही उसकी नियति है। विवाह एक स्त्री के जीवन में भूचाल की तरह आता है। बहुत कम स्त्रियाँ उसके बाद साबुत बचकर निकल पाती हैं। काया की दोस्त हया उससे कहती है, “हम लड़कियों के सिर पर जो शादी का बम फूटता है तो पूरी ज़िंदगी तहस-नहस हो जाती है।” लड़कियों का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बँट-बिखर जाता है। काया हया से कहती है, “लड़के तुममें एक आदर्श बीवी, माँ, बहू और न जाने क्या-क्या खोजते हैं। वे अपने लिए नहीं करते शादी, अपनी फ़ैमिली के लिए करते हैं... तुम्हें थोड़ा-सा इसको दे देंगे, थोड़ा-सा उसको, तुम्हें इतने टुकड़ों में बाँट देंगे कि न तुम अपनी रहोगी, न किसी और की” (पृष्ठ संख्या : 107, ‘काया’; जया जादवानी, मंजुल पब्लिशिंग हाउस, संस्करण : 2025)
स्त्री और पुरुष के बीच की शादी उनके आनंद और ख़ुशी की गारंटी नहीं है। असंख्य विवाहित जोड़े लड़ते-झगड़ते, ऊबते-खीजते एक-दूसरे को तिरस्कृत और अपमानित करते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। जो शादियाँ टूटती हैं, उनसे ऐसी मजबूरी में साथ रहने वालों की आबादी बहुत बड़ी है। काया के पिता फ़ौज में नौकरी करते हैं। माँ हर बार करवाचौथ का व्रत रखती और पिता की फ़ोटो देखकर व्रत तोड़ती। वही पिता जब एक बार करवाचौथ पर घर पर हैं और माँ के पूजा-पाठ के कारण पिता को रात के खाने में देर होने लगती है, तब वे माँ को बुरी तरह डाँटने लगते हैं। काया को बुरा लगता है और वह पिता पर फट पड़ती है। बहुत सारे लड़के और लड़कियाँ आज शादी से दूर भागते हैं, उसके मूल में माता-पिता के कड़वाहट भरे रिश्ते होते हैं। काया अपनी दोस्त मालू से ठीक ही कहती है, “कमाल की बात है कि हर मम्मी ख़ुद को सुखी समझती है क्योंकि उसका एक झगड़ालू पति और जान खाने वाले दो बच्चे होते हैं और इसी को वह अपनी उपलब्धि समझती है। सोचो तो कंडीशनिंग कितनी गहरी है।” (वही, पृष्ठ संख्या : 39)
जया जादवानी इस उपन्यास में यह सवाल भी प्रमुखता से उठाती हैं कि हमारे समाज में स्त्री का अनुकूलन इस तरह किया जाता है कि वह पुरुष की तरह सोचने लगती है। स्त्री होकर भी बेटियों के दर्द को नहीं समझ पाती। अगर वे पुरुष प्रभुत्व और वर्चस्व से मुक्त होकर एक स्त्री के नज़रिये से देखना, सोचना शुरू करतीं तो शायद उनके बेटों में स्त्री को लेकर इतनी संवेदनहीनता नहीं होती। स्त्री-स्त्री की दुश्मन इसलिए हो जाती है कि वह ख़ुद को और दुनिया को पुरुष के नज़रिये से देखना शुरू कर देती है।
‘काया’ में जया जादवानी यह महत्त्वपूर्ण सवाल उठाती हैं कि जब ‘एक लड़का और लड़की साथ रह सकते हैं तो दो लड़कियाँ क्यों नहीं?’ समलिंगी स्त्रियों का प्रेम, आकर्षण और लगाव अप्राकृतिक नहीं है। अगर वह अप्राकृतिक होता तो हर काल में, हर समाज में ऐसी प्रवृत्ति के लोग क्यों होते? वस्तुतः उनकी प्रकृति और प्रवृत्ति आम लोगों से अलग होती है। क्या आम लोगों से अलग होना कोई गुनाह है। कोई सभ्य समाज, परिवार, सत्ता या व्यक्ति यह कैसे तय कर सकता है कि किन्हीं दो व्यक्तियों का मन, शरीर और आत्मा क्या चाहती है? उसकी इच्छा, आकांक्षा और स्वप्न कैसा हो? पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों और आदर्शों के दबाव में ऐसी आकांक्षा वाले लोगों में सबसे पहले अपराधबोध पैदा होता है और वे ख़ुद की नज़रों में अपने को दोषी मानने लगते हैं। अगर समाज में सिर्फ़ दो जेंडर की स्वीकृति है और कोई तीसरी श्रेणी में आता है, तो उसका दोष क्या है? लेखिका पूरी ताक़त के साथ कहती हैं, “हमें समझना पड़ेगा कि जिसे हम अप्राकृतिक संबंध समझते हैं, वह प्रकृति का ही एक हिस्सा है, उसकी प्रकृति ही ऐसी है। यह कोई मेंटल प्रॉब्लम नहीं है, हक़ीक़त है। अगर दो समलैंगिक एक साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें किसी की परमिशन क्यों चाहिए? ...वे सारे बच्चे जो अपने मन से नहीं जी पा रहे, छिप-छिपकर जी रहे हैं, आप उन्हें नहीं स्वीकारेंगे तो वे आपसे दूर भागेंगे, दोहरी ज़िंदगी जिएँगे, नशे में डूबेंगे, ख़ुद को बर्बाद कर लेंगे और अंततः दूसरों को भी” (वही, पृष्ठ संख्या : 152)
काया जब अपनी माँ से कहती है कि वह लड़कियों को पसंद करती है और लड़की से ही शादी करेगी तो माँ पहले तो चौंकती है, पर उससे सवाल पूछती है, “कभी लड़की से लड़की की शादी होती है? वंश कैसे चलेगा?” समलिंगी स्त्रियों से पूछा जाने वाला यह आम सवाल है। इसी के दम पर उनके संबंधों को नकारा जाता है और उसे अव्यावहारिक समझा जाता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या स्त्री सिर्फ़ प्रजनन का माध्यम है। बहुत सारी स्त्रियाँ जो माँ नहीं बन पाती, क्या वे स्त्री नहीं हैं? क्या स्त्री से संतान को अलग कर दिया जाए तो वह स्त्री नहीं रह जाती? स्त्री सिर्फ़ गर्भाशय नहीं है। उसकी पहचान सिर्फ़ प्रजनन से नहीं है। इसके अलावे भी उसकी पहचान, उसका व्यक्तित्व और उसका कर्म होता है। सिर्फ़ संतानोत्पत्ति के बहाने दो स्त्रियों के रिश्ते को नकारा नहीं जा सकता। अगर दोनों व्यक्तित्वों के भीतर परिवार की आकांक्षा है तो वे किसी बच्चे को गोद भी ले सकते हैं।
यह उपन्यास नगरों और महानगरों में उच्च मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय युवाओं की जीवन शैली को उद्घाटित करने की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। घर-परिवार से दूर ख़ुद की कमाई के पैसे पर स्वतंत्र, वर्जनाहीन जीवन जी रहे ये युवा गहरे अलगाव के शिकार हैं। काम, सेक्स और नशे में डूबे, परिवार से कटे ये युवा गहरी ऊब, निराशा और निरर्थकता की गिरफ़्त में हैं। परिवार, समाज और देश की चिंताओं से दूर प्रौद्योगिकी संस्थानों से पढ़े-लिखे ये युवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ग़ुलाम की तरह काम करते हैं। इनके काम के घंटे बहुत ज़्यादा हैं। ख़ुद के लिए, मानवीय रिश्तों के लिए, सोच-विचार और चिंतन के लिए, किसी तरह की रचनात्मकता के लिए, इनके पास समय नहीं है। वे एक उथली ज़िंदगी जीते हैं। अपने काम से इन्हें कोई गहरा लगाव और जुड़ाव नहीं है। वह उनकी पहचान का माध्यम नहीं है। अंततः वे अपनी ऊब मिटाने के लिए सेक्स और नशा की एक वैकल्पिक दुनिया में प्रवेश करते हैं। दिव्या काया से कहती है, “घरवाले चाहते थे हम कमाएँ और हम कमा रहे हैं। दिनभर इतना काम करना पड़ता है, थोड़ा तो स्ट्रेस रिलीज़ करने के लिए हमें भी चाहिए। दिमाग़ को न्यूट्रल करने के लिए दो ही चीज़ें बचती हैं... नशा और सेक्स। फ़ीलिंग तो बचती ही नहीं, न अपने पार्टनर के लिए, न फ़ैमिली के लिए और न अपने लिए” (वही, पृष्ठ संख्या : 68)
सेक्स इनके लिए भूख और प्यास की तरह है। शारीरिक ज़रूरतों की पूर्ति का एक माध्यम। इसके पीछे रिश्तों की गहरी समझ, अनुभूति, लगाव और जुड़ाव नहीं है। काया अपनी दोस्त दिव्या से मिलने जब उसके फ़्लैट में जाती है तो साथ रह रहे लोगों में कोई लगाव नहीं है। उसकी दोस्त दिव्या अपने पुरुष मित्र के बारे में कहती है, “मैं पलाश को धमकी देती रहती हूँ, तू नहीं आया तो मैं किसी और के साथ सेक्स कर लूँगी”। इन संबंधों में जब गहरा आकर्षण, लगाव और जुड़ाव नहीं है तो इनका अलग होना भी इनके लिए कोई मायने नहीं रखता। ‘ब्रेकअप’ इनके लिए बहुत हल्का और चलताऊ शब्द है। वह उनके मन, शरीर और आत्मा को मथता नहीं है। दिव्या काया से कहती है, “लड़के-लड़कियों ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं। पार्टनर्स उनके लिए ऐसे हैं, जैसे फ़ास्ट फ़ूड, खाओ, पेट भरो और फेंको। इन्हें न कपड़ों की ज़रूरत है, न मन की, न आत्मा की। सिर्फ़ जिस्म की ज़रूरत है, बाक़ी सब मर गया है। ये पाँच मिनट में कहीं भी सेक्स कर लेते हैं” (वही, पृष्ठ संख्या : 68) ये लक्षण वस्तुतः अमानवीयकरण के हैं।
संबंधहीनता, सारहीनता के शिकार ये खोखले युवा अंततः अपने भीतर के ख़ालीपन को वस्तुओं के अंबार से भरते हैं, लेकिन सुख वस्तुओं में नहीं, मानवीय रिश्तों में है। ये वस्तुएँ हमारे जीवन को सुविधा दे सकती हैं, आनंद और सुख का एहसास नहीं। इसमें दोष माता-पिता का भी है जो बचपन से बच्चों को सारे समाज, परिवार के रिश्तों से काटकर कमाई की मशीन में तब्दील कर देते हैं। ढेर सारी कमाई करने वाला, लग्ज़री फ़्लैट में रहने वाला और गाँजे के नशे का शिकार पार्थ और पूजा, काया और उसकी दोस्त दिव्या से कहते हैं, “सफल बनने की दौड़ तुम्हें जिस रास्ते पर डालती है न, उस रास्ते पर तुम कभी बैठ नहीं सकते, चलते रहना पड़ता है... मैं यह नहीं करना चाहता था, न यह बनना चाहता था। सुविधाओं की भूख यहाँ तक ले आई, मैंने गिवअप कर दिया। तुम सोच रही होगी कि हमें किस चीज़ की कमी है? कमी बाहर नहीं होती डियर, भीतर होती है, बस हम ढूँढ़ते बाहर हैं, फिर उसे भरने ख़ूब सारा सामान ख़रीद कर ले आते हैं। ख़ूब सारा सामान पड़ा हो तो भी कमरा ख़ाली ही दिखाई देता है। दूसरों को ही नहीं, ख़ुद को”। पार्थ बहुत ज़ोर से हँस दिया। पूजा भी। “एक दिन पता चलेगा, बस सामान ही रह गया है, हम अपने घर के बाहर खड़े हैं।” पूजा ने धीरे से कहा और सोफ़े पर लेट गयी…” (वही, पृष्ठ संख्या : 76)
अपने काम से, अपने आप से और पूरी दुनिया से अलगाव में जी रहे इन युवाओं के पास एक ही वैकल्पिक रास्ता बचता है, नशा का। जब तक नशा इन पर हावी रहता है, वे अलगाव के एहसास से दूर रहते हैं। नशा जिस्म और आत्मा के अलगाव को भरता है और कुछ समय के लिए एक दूसरी दुनिया में उछाल देता है।
यह सवाल उठाया जा सकता है कि हमारे सभ्य घरों के इन नौजवान लड़के-लड़कियों की जीवन शैली का इस उपन्यास के मूल विषय-वस्तु से क्या संबंध है? समलिंगी स्त्रियों के जिन संबंधों को हमारे परिवार और समाज में अप्राकृतिक, विकृत और उपेक्षणीय समझा जाता है; लेखिका इन महानगरीय युवक-युवतियों के माध्यम से उसका कॉन्ट्रास्ट रचती हैं। जिन स्त्री-पुरुष संबंधों को समाज मान्यता देता है, वहाँ आकर्षण, प्यार, लगाव, जुड़ाव और आत्मीयता के लिए कोई जगह नहीं है पर काया और मालू के संबंधों में ईमानदारी, समर्पण, सघन लगाव और आत्मीय जुड़ाव है, फिर इन संबंधों की समाज में स्वीकृति क्यों नहीं है।
इस उपन्यास में जया जादवानी स्त्री की देह पर उसके अधिकार के सवाल को बहुत ही प्रमुखता और संवेदनशीलता के साथ उठाती हैं। स्त्री सिर्फ़ देह नहीं है। लेकिन अंततः उसे देह ही समझा जाता है। देह से ही बदला लिया जाता है। यातनाएँ देह ही भुगतती हैं और घायल भी देह ही होती है। शरीर के इन जख़्मों के निशान उसकी आत्मा पर भी मौजूद होती है। लेकिन इस देह पर भी स्त्री का अधिकार कहाँ है? उसे अपनी देह के कारागार में ही बंद कर दिया जाता है और पहरा परिवार और समाज का होता है। वह अपनी देह के भीतर बिन पानी मछली की तरह तड़पती है। काया के अपने ही माँ-बाप उसके समलिंगी प्रेम के लिए अंततः यातनाएँ उसकी देह को ही देते हैं। उन्हीं की देख-रेख में उसकी देह को रौंदा जाता है। वह चाहती है कि जिसे वह प्रेम करती है, वही उसकी देह का स्पर्श करे, उसे सहलाये और चूमे। स्त्री जानती है कि उसकी देह उससे अलग नहीं है। लेकिन वह सिर्फ़ देह भी नहीं है। उसकी चाहत, इच्छा और इयत्ता भी हैं, वह चाहती है कि उसी के अनुरूप उसकी देह हरकत करे, सिहरे, नाचे और गाये। स्त्री की देह में ही उसकी इच्छाओं, कामनाओं के फूलों के गुच्छे खिलते हैं। भावना की नदी बहती है और अनुभूतियों का ज्वार उठता है। इसी देह में प्रेम की लहरें भी उठती हैं और स्वप्न जीवन के आकाश में पतंगों की तरह बल खाते हैं। स्त्री देह को, उसकी कामना को, उसकी यौनेच्छा को नियंत्रित करने वाला परिवार और समाज क्या कभी उसकी थाह ले पाएगा! काया के माध्यम से जया सवाल उठाती हैं, “कोई दूसरा कैसे जान सकता है कि किसी की देह उससे क्या चाहती है?... जो हमारे लिए स्वाभाविक है, वह अगर दूसरे के लिए अस्वाभाविक है भी तो हम क्या करें?... देह का यह पाँच-साढ़े पाँच फ़ीट का जंगल, जिसमें हम सारी उम्र भटकते रहते हैं और हमें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता क्योंकि बाहर समाज खड़ा है, परिवार खड़ा है। हम अपनी देह अपने हाथों में लेकर भागते हैं, क्योंकि लोग इस पर भी हमारा नहीं, अपना हक़ मानते हैं।... मैं किसी से भीख नहीं माँग रही। मैं पूरे आत्मविश्वास से कहती हूँ, यह मेरी काया है, इस पर मेरा हक़ है। इसकी बाबत हर फै़सला मैं खु़द करूँगी” (वही, पृष्ठ संख्या : 149, 150)
जया जादवानी इस उपन्यास में समलिंगी स्त्रियों को अपनी तरह से जीने के अधिकार दिए जाने के पक्ष में आवाज़ उठाती हैं। समलिंगी स्त्रियों की इच्छाएँ, चाहतें, कामनाएँ आम स्त्रियों से भिन्न होती हैं। यह भिन्नता उनमें अपराधबोध जगाता है। अपनी भिन्नता और अन्यता को उन्हें ख़ुद सहजता के साथ स्वीकार करना चाहिए। एक स्वस्थ समाज में सबको अपनी तरह से जीने का हक़ है। यह हक़ और आज़ादी समलिंगी स्त्रियों को भी मिलनी चाहिए। अन्य लोगों को अपनी तरह बनाने की ज़िद को छोड़कर जो लोग जैसे हैं, हमें उन्हें उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए। समस्या वहीं से शुरू होती है, जहाँ हम दूसरों को ख़ुद अपने नज़रिये से देखने लगते हैं और वे हमें ग़लत लगते हैं। ज़रूरत यह है कि हम दूसरों को उसके नज़रिये से देखें। दूसरों को बदलने के लिए दबाव डालने की जगह हमें ख़ुद के नज़रिये और दृष्टिकोण में बदलाव लाने की आवश्यकता है। अगर ऐसा संभव होता तो दुनिया इंसानों के रहने के लिए थोड़ी और बेहतर जगह होती।
‘काया’ क्लासिकल उपन्यास की श्रेणी में न आकर लघु उपन्यास या लंबी कहानी की तरह है। यह वर्णनात्मक न होकर संवादात्मक है। दो चरित्रों की आपसी बातचीत के सहारे उपन्यास में गतिशीलता आती है। संवादों में संक्षिप्तता, आत्मीयता और रिश्तों की नमी है। भाषा अंतर्मन की पीड़ा, चिंता, द्वंद्व और तनाव को अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम है। घटनाओं की अपेक्षा स्थितियों के सूक्ष्म ब्योरे, छोटे-छोटे सटीक संवाद के साथ निर्मम संपादन है। कहीं कुछ भी अतिरिक्त नहीं है। पूरा उपन्यास एक कसी हुई फ़िल्म की तरह छोटे-छोटे दृश्य बिम्बों से आगे बढ़ता है। गहरे जीवनानुभवों की कोख से निकले, मोती जैसे चमकते सूत्रात्मक और अर्थगर्भ वाक्य जया जादवानी की अन्य कहानियों और उपन्यासों की तरह इस उपन्यास में भी बिखरे पड़े हैं, जिनमें जीवन के सूक्ष्म अवलोकन और पर्यवेक्षण से निकले अमूल्य विचार हमें जीने और महसूस करने की नई दृष्टि देते हैं। जीवन को देखने का नया नज़रिया प्रदान करते हैं। मनुष्यता को कुछ और अधिक उर्वर बनाते हैं। ऐसे ही कुछ वाक्य इस उपन्यास में देखे जा सकते हैं। यथा—“ज़िम्मेदारी उठाने वाले प्यार नहीं दे पाते और प्यार करने वाले ज़िम्मेदारी नहीं उठा पाते”, “जब हम प्रेम करते हैं अपने पास वापस आ जाते है”, “बहुत वक़्त साथ रहो तो दुःख से भी दोस्ती हो जाती है”, “दूसरों से प्रेम करना आसान है, ख़ुद से नहीं”; उपन्यास के अंत में लेखिका अपनी ओर से एक-दो पृष्ठों में समलिंगी स्त्रियों के पक्ष में कुछ कहती हैं, जिसकी ज़रूरत नहीं थी। उसके बिना भी उपन्यास के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। इस दृष्टि से पूर्व प्रकाशित ‘ख़रगोश’ का अंत बेहतर था।
समग्रता में ‘काया’ एक स्त्री के अन्य आम स्त्रियों से अलग होने की शर्मिंदगी, पीड़ा, यातना और संघर्ष का मार्मिक आख्यान है। इस उपन्यास में जया जादवानी एक अलग तरह के अनजान, बीहड़ और विरल अनुभवों की दुनिया में प्रवेश करती हैं। उनमें परिवार, समाज, विवाह जैसी स्थापित सत्ताओं और शक्ति केंद्रों की जड़ता के विरूद्ध आवाज़ उठाने का नैतिक साहस है। देह की क्षणभंगुरता और असारता का गुणगान करने वाली हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रत्ख्यान करती हुई, उन्होंने देह की मिट्टी में अंकुरित होती इच्छाओं, कामनाओं की फूटती कोपलों और उसकी टहनियों पर खिलते स्वप्न के फूलों के सौंदर्य का बेहतर और संयमित चित्रण किया है। इस उपन्यास में देह की लय, राग, संगीत की कोमलता, स्पर्श से उठती लहरों और तरंगों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ महसूस किया जा सकता है। अपनी देह पर स्त्री के ख़ुद के अधिकार और उसकी मुक्ति के पक्ष में वे ज़रूरी और तार्किक सवाल उठाती हैं।
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