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महावीर प्रसाद द्विवेदी

1864 - 1938 | रायबरेली, उत्तर प्रदेश

युगप्रवर्तक साहित्यकार-पत्रकार। ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी नवजागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान।

युगप्रवर्तक साहित्यकार-पत्रकार। ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी नवजागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान।

महावीर प्रसाद द्विवेदी के उद्धरण

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अंतःकरण की वृतियों के चित्र का नाम कविता है।

रस ही कविता का सबसे बड़ा गुण है।

अनुप्रास और यमक आदि शब्दाडंबर कविता के आधार नहीं, जो उनके होने से कविता निर्जीव हो जाए, या उससे कोई अपरिमेय हानि पहुँचे। कविता का अच्छा या बुरा होना विशेषतः, अच्छे अर्थ और रस-बाहूल्य पर अवलंबित है।

कवि का काम तो शिक्षा देना है और दार्शनिक तत्त्वों की व्याख्या करना है। उसके हृदय से तो वह गान उद्गत होना चाहिए, जिससे समस्त मानव-जाति की हृतंत्री में विश्व-वेदना का स्वर बज उठे।

जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना ही अधिक ज्ञान होता है, वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है।

जो काव्य सर्वसाधारण की समझ के बाहर होता है, वह बहुत कम लोकमान्य होता है।

जो कवि अच्छी शब्द-स्थापना करना नहीं जानता; अथवा यों कहिए कि जिसके पास काफ़ी शब्द-समूह नहीं है, उसे कविता करने का परिश्रम ही करना चाहिए।

ज्ञान की ऊर्जितावस्था में ही कला का सबसे अच्छा विकास होता है। हृदय के साथ मस्तिष्क की पुष्टि होने पर भावों की उत्तम अभिव्यक्ति होती है।

सत्कविता की प्राप्ति बड़े पुण्य से होती है। हृदय में कवित्व-बीज होने ही से मनुष्य सत्कवि हो सकता है।

अर्थ-सौरम्य ही कविता का प्राण है। जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं, वह कविता नहीं।

सभ्य समाज की जो भाषा हो, उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।

एक मात्र सूनी शब्द-झंकार ही जिन कवियों की करामात हैं, उन्हें चाहिए कि वे एक दम ही बोलना बंद कर दें।

कविता की भाषा बोलचाल से जितनी ही अधिक दूर जा पड़ती है, उतनी ही उसकी सादगी कम हो जाती है।

हे जगदीश्वर, इस संसार में काले से भी काले कर्म करके जो लोग ललाट पर चंदन का सफ़ेद लेप लीपते हैं, उनकी भी गणना जब हम बड़े-बड़े धार्मिकों में की गई सुनाते हैं, तब हमारे मुँह से हँसी निकल ही जाती है।

भाषा की उन्नति के साथ ही साथ कविता की उन्नति होती है।

जिस भाषा के कवि अपनी कविता में बुरे शब्द और बुरे भाव भरते रहते हैं, उस भाषा की उन्नति तो होती नहीं, उल्टे अवनति होती जाती है।

कविता के लिए उपज चाहिए। नए-नए भावों की उपज जिसके हृदय में नहीं, वह कभी अच्छी कविता नहीं लिख सकता।

जिस समाज के लोग अपनी झूँठी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होते हैं, वह समाज कभी प्रशंसनीय नहीं समझा जाता।

मुहावरा ही भाषा का प्राण है; उसे जिसने नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना। उसकी भाषा कदापि आदरणीय नहीं हो सकती।

अलौकिक कार्य करनेवाले प्रतिभाशाली मनुष्य ही अवतार है। स्वाभाविक कवि भी एक प्रकार के अवतार हैं।

कवि को ऐसी भाषा लिखनी चाहिए, जिसे सब कोई सहज में समझ ले और अर्थ को हृदयंगम कर सकें।

कविता के बिगड़ने और उसकी सीमा परिमित हो जाने से साहित्य पर भारी आघात होता है।

जिस तरह सड़क ज़रा भी ऊँची-नीची होने से बाइसिकल (पैरगाड़ी) के सवार को दचके लगते हैं, उसी तरह कविता की सड़क यदि थोड़ी भी नाहमवार हुई, तो पढ़ने वाले के हृदय पर धक्का लगे बिना नहीं रहता।

कविता एक अपूर्व रसायन है। उसके रस की सिद्धि के लिए बड़ी सावधानी, बड़ी मनोयोगिता और बड़ी चतुराई आवश्यक होती है।

कविता का सत्य दर्शन-शास्त्र या विज्ञान का सत्य नहीं है और उसमें वह सत्य है, जो किसी धर्म अथवा मत विशेष से स्पष्ट किया जाता है। उसमें सत्य का प्रकाश कुछ दूसरी ही रीति से होता है।

कविता लिखते समय कवि के सामने एक ऊँचा उद्देश्य अवश्य रहना चाहिए। केवल कविता ही के लिए कविता करना एक तमाशा है।

कविता का लक्षण जहाँ कहीं भी पाया जाए, चाहे वह गद्य में ही चाहे पद्य—वहीं काव्य है।

कवि कोई ऐसी वैसी चीड़ नहीं। उसे तो एक लोकोत्तर विभूति समझना चाहिए।

हे जगदीश, जो लोग कामिनी जनों की ओर घूरने ही के लिए देवालयों को सबेरे और सायंकाल जाते हैं, उन्हीं की सब कोई यदि प्रशंसा करे तो हाय! हाय! आस्तिकता अस्त हो गई समझनी चाहिए।

ज्ञान कहीं भी मिलता हो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु अपनी ही भाषा और उसी के साहित्य को प्रधानता देना चाहिए, क्योंकि अपना, अपने देश का, अपनी जाति का उपकार और कल्याण अपनी ही भाषा के साहित्य की उन्नति से हो सकता है।

कविता करने ही से कवि पदवी नहीं मिलती। कवि के हृदय को कवि के काव्य-कर्म को जो जान सकते हैं वे भी एक प्रकार के कवि हैं।

स्वभाव, रुचि, अभ्यास, संगति, संप्रदाय और विवेक बुद्धि के न्यूनाधिक विकास के अनुसार सबको सब चीज़ें एक सी हृदयंगम नहीं होतीं।

जिस कविता से जितना ही अधिक आनंद मिले, उसे उतना ही अधिक ऊँचे दरजे़ की समझना चाहिए।

प्रकृत कवि थोड़े ही परिश्रम और परिशीलन से अपनी कवित्व-शक्ति को विकसित कर सकता है। बना हुआ कवि बहुत परिश्रम और परिशीलन से भी, थोड़ा ही कवित्व-शक्ति प्राप्त कर सकता है।

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