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स्त्री इनके भीतर

स्त्री-केंद्रित पुरुष-रचित

हिन्दी कविताओं से एक चयन। यहाँ स्त्री केवल उपस्थिति नहीं, एक विषय है—अनुभूति में और संवाद में और सरोकार में। पुरुष कवि की दृष्टि उसे देखती है और खोजती है अपने भीतर और अपने समय में। इन कविताओं में स्त्री कभी आकृति बनकर उभरती है, कभी प्रश्न बनकर। यह चयन उन क्षणों का है, जहाँ शब्दों के बीच से ‘स्त्री’ का एक सजीव, स्पंदित बोध आकार ग्रहण करता है।

औरतें

रमाशंकर यादव विद्रोही

प्रेम करती स्त्री

मंगलेश डबराल

सिगरेट पीती हुई औरत

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

स्‍त्री और आग

नवीन रांगियाल

औरतें

उदय प्रकाश

सीलमपुर की लड़कियाँ

आर. चेतनक्रांति

मदर इंडिया

गीत चतुर्वेदी

पिकासो की पुत्रियाँ

केदारनाथ अग्रवाल

रोती हुई औरत

इब्बार रब्बी

हम औरतें

वीरेन डंगवाल

11वीं की छात्रा

अष्टभुजा शुक्‍ल

गृहस्थन होती लड़की

गोविंद माथुर

स्त्री के साथ

चंद्रकांत देवताले

स्त्री

नंद चतुर्वेदी

पाठा की बिटिया

केशव तिवारी

इच्छा

नवीन सागर

बनानी बनर्जी

ज्ञानेंद्रपति

लड़की ने डरना छोड़ दिया

श्यौराज सिंह बेचैन

कैथरकला की औरतें

गोरख पांडेय

नामुराद औरत

असद ज़ैदी

आज की नायिका

राधावल्लभ त्रिपाठी

चौक

आलोकधन्वा

सोनचिरई

जितेंद्र श्रीवास्तव

पहाड़ में औरत

हरीशचंद्र पांडे

दुपहिया चलाती युवतियाँ

महेश चंद्र पुनेठा

औरत

अखिलेश जायसवाल

लड़कियाँ

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

नारी-रहस्य-कथा

विनोद भारद्वाज

बुनकर स्त्रियाँ

स्वप्निल श्रीवास्तव

वृत्त के चारों तरफ़

जगदीश चतुर्वेदी