रविवासरीय 4.0 : पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान
अविनाश मिश्र
12 अप्रैल 2026
I said to one of my friends, “The reason I have chosen not to speak is that most of the time when one is talking, both good and bad things are said, and the eyes of one’s enemies fall only upon the bad.”
“Better,” he said, “that an enemy not see anything good.”
An inimical person does not pass by a pious man without criticizing him for being a horrid liar.
Virtue, in an enemy’s eyes, is the worst fault. Sa’di is a rose, but in the eyes of enemies he is a thorn.
The world-illuminating brightness of the source of sunlight is ugly in the eyes of a blind mole.
— The Gulistan of Sa’di | Chapter Four | The Benefits of Silence | Story 1
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राजा उदयन की तीन रानियों में मागन्दिय भी एक थी। उसके माता-पिता ने भगवान् बुद्ध का उपदेश सुन अनागामी का फल प्राप्त किया था। मागन्दिय का बाद में उदयन से विवाह हो गया था। एक बार जब भगवान् के कोसम्बी पधारने का समाचार मागन्दिय को ज्ञात हुआ, तब वह बहुत रुष्ट और क्रुद्ध हुई। वह भगवान् से बदला लेने को उतारू थी। उसने बुद्धविरोधी धर्मगुरुओं को, ग़ुंडों-बदमाशों से रुपये-पैसे दे, लालच-प्रलोभन दे... भगवान् और भिक्खुसंघ का आक्रोशन-अपमान करके भगा देने की योजना बनाई।
भगवान् और उनका भिक्खुसंघ जब भिक्खाटन को निकलता, तब लोगों का झुंड का झुंड उनके पीछे हो लेता और उनको भद्दी-भद्दी गालियाँ देता। उनसे कहता कि तुम मूर्ख हो, चोर हो, ऊँट हो, बैल हो, गधे हो, पाशविक हो, नारकीय हो, पागल हो, पतित हो... ऐसे नाना प्रकार के अपशब्दों से उन्होंने भिक्खु और भिक्खुणियों का जीना दूभर कर दिया था। लोगों द्वारा ऐसा आक्रोशन किए जाने पर आनंद थेर ने भगवान् के पास जा वंदना कर कहा, “भंते! ये नगरवासी हम लोगों का आक्रोशन करते हैं, गालियाँ देते हैं। इससे अच्छा है कि हम किसी दूसरी जगह चलें। यह नगर हमारे लिए ठीक नहीं है। भिक्खु परेशान हैं, भिक्खुणियाँ परेशान हैं। झुंड के झुंड हमारे पीछे चलते हैं और अपमानजनक शब्द बोलते हैं, चीख़ते-चिल्लाते हैं। एक तमाशा हो गया है, यहाँ तो जीना ही कठिन हो गया है। आपका आदेश है कि धैर्य रखें, शांति रखें, चुप रहें, लेकिन बातें... शांत होती नज़र नहीं आ रही हैं, अब ये हरकतें असह्य हुई जाती हैं।”
भगवान् ने पूछा, “आनंद, कहाँ चले?” आनंद बोले, “भंते! दूसरे नगर...” भगवान् पुनः बोले, “आनंद, वहाँ भी मनुष्यों ने आक्रोशन किया, तो फिर कहाँ जाओगे?” आनंद बोले, “भंते, वहाँ से भी दूसरे नगर को चलेंगे।” भगवान् बोले, “आनंद! ऐसा नहीं करना चाहिए। जहाँ अधिकरण [विवाद] उत्पन्न हुआ है, वहीं उसके शांत हो जाने पर दूसरे स्थान पर जाना चाहिए।”
भगवान् ने पूछा, “आनंद! कौन आक्रोशन करते हैं?” आनंद थेर का उत्तर था, “दास-नौकर से लेकर सभी आक्रोशन करते हैं।” भगवान् बोले, “आनंद! ऐसा सभी जगह हो सकता है। इसलिए जैसे संग्राम-भूमि में गया हाथी चारों दिशाओं से आए हुए बाणों को सहता है, उसी प्रकार बहुत से दुश्शीलों द्वारा कही गई बात को सह लेना हमारा कर्त्तव्य है। इसमें ही तुम्हारा कल्याण है; इसे अवसर समझो, निराश मत होवो। बहुत से लोग दुष्ट प्रकृति के होते हैं। इस प्रकृति-प्रवृत्ति को समझकर चलो। सभी जगह ऐसे लोग मिलेंगे; युद्ध में जैसे हाथी चारों तरफ़ से आए हुए बाणों को सहन करता है, वैसे ही चारों दिशाओं से आते हुए बाणरूपी आक्रोशन को सहन करो। दुनिया में अधिक लोग दुष्ट हैं, बुरे हैं। दान्त [प्रशिक्षित हाथी] को युद्ध में ले जाते हैं। दान्त पर राजा चढ़ता है। कितने ही बाण गिरें तो भी हाथी टस से मस नहीं होता है। राजा उस पर सवारी करता है। वह हाथी श्रेष्ठ है। मनुष्यों में भी दान्त श्रेष्ठ है, जो दूसरों के कटु वाक्यों को सहन करता है। मैं कटु वाक्य सहन करूँगा, क्योंकि दुश्शील लोग ही अधिक हैं।
— धम्मपद | गाथा और कथा | पृष्ठ : ३१७-१८
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आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम्॥
[सारा दोष मुँह का है। तोता और मैना अपनी बोली के कारण पिंजड़े में बंद कर दिए जाते हैं, पर कभी मुँह न खोलने वाले बगुले निर्बाध विचरण करते हैं।]
— पञ्चतन्त्रम् | ४. ४६
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• मैं संसार के सर्वाधिक सम्मानित पुस्तकालय के अध्ययन-कक्ष में बैठकर श्रीसूरदासजीविरचित ‘विरह-पदावली’ पढ़ रहा था कि तभी मेरे नंबर पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आई, “मिश्र जी बोल रहे हैं?” मैंने कहा कि नहीं। पर फिर भी मैं उन्हें वही लगा! उन्होंने कहा, “मैं अपनी कुछ कविताएँ छपवाना चाहता हूँ।” मैंने कहा, “भेज दीजिए!” उन्होंने कहा कि जी... और कॉल कटते ही भेज दीं।
मैं अवकाशपसंद व्यक्ति नहीं हूँ, पर आगे अवकाश था। मैं इस अवकाश में किंचित शीतल जल से नहाने के बाद ‘करि गए थोरे दिन की प्रीति...’ वाले पद का रस ले रहा था कि तभी मेरे नंबर पर एक और अज्ञात नंबर से कॉल आई, “भाई सा’ब, मैं सीताराम सूर्यवंशी, अधिवक्ता उच्च न्यायालय, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश... कल बात हुई थी आपसे। वो कविताएँ छाप दीं आपने?” मैंने कहा, “बहुत जल्दी है आपको, पर कविताएँ आपकी प्रकाशित होने योग्य नहीं हैं।” उन्होंने कहा, “क्यों?” मैंने कहा, “आपकी कविताओं में जनपक्षधरता, समय-समीक्षा, प्रतिरोध की परंपरा के साथ ही मानवीय जीवन के सुंदर पक्ष की सृजनशील संभावना नहीं है।” वह बोले, “भाई सा’ब, बस आप शाम तक रुकिए... मैं आपको देता हूँ न वैसी तैयार करके।” मैंने कहा कि ओके!
मैं सबकी तैयारियाँ जानता हूँ। वह तैयार कर नहीं पाए। लेकिन कुछ माह बाद वह एक रोज़ मेरे दफ़्तर में प्रकट हुए और कुछ औपचारिकताओं के बाद बोले, “हिंदी साहित्य में पुरस्कारों की क्या स्थिति है?” मैंने कहा, “हमारी हिंदी के बहुत पुराने और परिश्रमी डेटाकार आदरणीय देश परमार के अनुसार : आज हिंदी में दिए जा रहे पुरस्कारों की संख्या गणनातीत है। दो बड़े पुरस्कारों के नाम भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और इफ़को श्रीलाल शुक्ल स्मृति पुरस्कार हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान से भी भारी मात्रा में बड़ी राशि के पुरस्कार दिए जाते हैं। साहित्य अकादेमी और अन्य अकादमियों के साथ-साथ जन्म से ही गरिमावंचित सरस्वती सम्मान और व्यास सम्मान और बिहारी पुरस्कार और मीरा पुरस्कार भी मौजूद हैं। लखटकिया पुरस्कारों की संख्या पचास से ऊपर है और पचास, पच्चीस, ग्यारह, पाँच हज़ार और इक्कीस सौ रुपये की राशि के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों की संख्या सौ से ऊपर है। इससे नीचे की राशि के पुरस्कारों की संख्या पाँच सौ के आस-पास होगी और ऐसे पुरस्कार तो हज़ारों हैं जो केवल पुरस्कार हैं, उनमें कोई राशि नहीं है।”
यह सुनकर वह बोले, “हिंदी में सबसे बड़ी राशि का पुरस्कार कौन-सा है?” मैंने कहा कि मान लीजिए इक्कीस लाख... वह बोले, “मैं पच्चीस लाख का एक पुरस्कार शुरू कर दूँ, आपकी अनुमति हो तो?” मैंने कहा कि बिल्कुल कीजिए, कौन रोक सकता है आपको!
इसके बाद पहले सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान के लिए एक बिंदुघाटी तैयार हुई।
• सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान हिंदी कविता और उसके कवि को आर्थिक रूप से सबल करने का प्रयत्न है।
• इसमें प्रविष्टि भेजने की प्राथमिक शर्त यह है कि आपकी आयु चालीस वर्ष से कम हो। आपातकालीन परिस्थितियों में एक-दो वर्ष ऊपर भी चल सकता है, जैसा कि भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार [राशि : इक्यावन सौ रुपये] में चलता आया है और चलता रहता है।
• कवि का कम से कम एक कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ होना चाहिए। एक से अधिक हों तो भी कोई समस्या नहीं, जैसा कि...
• प्रविष्टि के रूप में कवि अपने कविता-संग्रह की पीडीएफ़ फ़ाइल अपने जन्म प्रमाणपत्र के साथ ssss@ssss.com भेजें।
• प्रविष्टि भेजने की अंतिम तिथि इस वर्ष का मज़दूर दिवस है।
• पहले सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान से सम्मानित कवि को एक प्रमाण-पत्र, एक स्मृति-चिह्न और पच्चीस लाख रुपये की राशि प्रदान की जाएगी।
• इस वर्ष के सम्मानित कवि को यह सम्मान प्रयागराज में विजयादशमी के अवसर पर दिया जाएगा।
• इस सम्मान के लिए नियमों के अधीन होकर कोई भी प्रविष्टि भेज सकता है।
• यह बिंदुघाटी तैयार करने के बाद सीताराम सूर्यवंशी ने पहले सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान के लिए एक ज्यूरी गठित की। इसके लिए उन्होंने क्षत्रिय जाति की तीन प्रमुख शाखाओं—सूर्यवंश, चंद्रवंश, अग्निवंश—से आनंद साही, वासुदेव चौहान, महान् कुमार सिंह, रूपा रघुवंशी और उज्ज्वला श्रीनेत को निर्णायक मंडल में रखा।
• सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित करती हुई सूचना जैसे ही अपने निर्णायक मंडल के साथ सार्वजनिक हुई—कई ‘सिंह’ इसमें अत्यंत उत्सुक नज़र आए। इनमें से कुछ घोषित सिंह थे, कुछ अघोषित, कुछ न घोषित थे; न अघोषित, कुछ सर्कस के थे, कुछ अरण्य के, कुछ चिड़ियाघर के थे, कुछ अजायबघर के, कुछ लाचार थे, कुछ अधेड़...
पहले सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान के लिए प्राप्त हुई प्रविष्टियों में सबसे दमदार प्रविष्टि निर्णायक मंडल को पवित्र सिंह की प्रतीत हुई; हालाँकि महान् कुमार सिंह और रूपा रघुवंशी—पवित्र सिंह के पक्ष में नहीं थे, वे दोनों यह सम्मान अपूर्वा सिंह को देना चाहते थे। पर उन्हें निर्णायक मंडल के वरिष्ठ ठाकुरों—आनंद साही और वासुदेव चौहान—ने यह कहकर शांत किया कि अपूर्वा सिंह के पास अभी एक वर्ष और है, और जैसा कि... उन्हें अगले वर्ष सम्मानित कर देंगे। इसके बाद पवित्र सिंह को वैचारिक स्पष्टता, प्रतिरोध और नई ज़मीन तोड़ने इत्यादि के लिए पहले सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान से सम्मानित करने की सर्वसम्मति से अनुशंसा करते हुए निर्णायक मंडल को प्रसन्नता अनुभव हुई।
इसके बाद जब सब तरफ़ बधाइयाँ धीमी गति से बहने लगीं—तभी निर्णायक मंडल की एक सदस्य रूपा रघुवंशी एक ‘काव्यात्मक’ प्रकरण के कारण अत्यंत विवादित हो उठीं और इसके बाद पवित्र सिंह को मिल रही बधाइयाँ थम गईं या कहें वे रूपा रघुवंशी के व्यापक समर्थन में बदल गईं।
पवित्र सिंह का प्रचार शुरू होते ही ख़त्म हो गया था, इसलिए अब उन्हें पुनः ताबड़तोड़ बधाइयाँ पाने के लिए जल्द से जल्द एक तस्वीर की आवश्यकता थी—पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान लेते हुए।
इस बीच पवित्र सिंह को सीताराम सूर्यवंशी ने सूचित कर दिया था कि पुरस्कार-राशि के अरेंजमेंट में थोड़ा विलंब हो रहा है; इसलिए आप पहले पुरस्कार ले लीजिए, आयोजन और तस्वीरें हो जाने दीजिए... पुरस्कार-राशि मैं आपको झूसी वाली प्रॉपर्टी का सेटलमेंट होते ही दे दूँगा।
पवित्र सिंह के लिए इस प्रकार के वादे ही नहीं, सब कुछ संदिग्ध था और सीताराम सूर्यवंशी को यह समझ में नहीं आ रहा था कि पवित्र सिंह उनके वचन पर विश्वास क्यों नहीं कर रहा है... क्योंकि बक़ौल रणविजय सिंह, [तिग्मांशु धूलिया कृत ‘हासिल’ वाले] “ठाकुरों के तेवर तो आप जानते हैं, रामचंद्र जी ने सीता जी वापस कर दी थीं।” लेकिन पवित्र सिंह को अविश्वास के बावजूद ग़ुस्सा बिल्कुल नहीं आ रहा था, जबकि बक़ौल रणविजय सिंह, [पुनः तिग्मांशु धूलिया कृत ‘हासिल’ वाले] “ठाकुरों का ख़ून है बाबू जी! ठाकुरों पे जमता है—ग़ुस्सा... जँचता है।”
अंततः वह वक़्त आया जब पवित्र सिंह मंच पर पुरस्कार लेने के लिए आए और तस्वीरें बनने और रीलें कटने लगीं कि तभी सीताराम सूर्यवंशी समेत समस्त निर्णायक मंडल ने पाया कि सम्मानित कवि क्षत्रिय जाति की किसी भी शाखा से कोई भी संबंध नहीं रखता है। पवित्र सिंह ने बहुत गर्व से अपनी जाति—निर्णायक मंडल के वरिष्ठ ठाकुरों को—बताने से साफ़ इनकार कर दिया। बाद इसके सब तरफ़ इस प्रकार की फुसफुसाहटें शुरू हुईं कि पवित्र सिंह यादव हैं कि कुर्मी! वासुदेव चौहान ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ दलित भी अपने नाम के साथ सिंह लिखते हैं।
बहरहाल, इस तरह की संकीर्ण कुलबुलाहटें मंच पर सम्मानित हो चुके पवित्र सिंह को प्राप्त हो रही बधाइयों का कुछ नहीं बिगाड़ पाईं और न ही वे आज तक यह पता लगा पाईं कि पवित्र सिंह की जाति क्या है!
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