ज़ुबैर सैफ़ी के बेला
09 जुलाई 2026
ई-रिक्शा : कहाँ जाओगे भाई सा’ब!
तीन का आँकड़ा क्या है? तीन लोग हों, तो भी अर्थी ले जाई जा सकती है, बस एक तरफ़ थोड़ा झुकाव रहेगा। लोक-विश्वास देखें,
क्या आप दिखा रहे हैं, भाषा का तमाशा
वाक्य किसी भी समाज के साहित्य का अभिन्न अंग रहे हैं। इन वाक्यों के बिना कोई हुकूमत नहीं चल सकती थी और आज भी इन वाक्यों क
क़स्बाई ज़िंदगी की तिकड़मों का लुत्फ़
हिंदुस्तान क़स्बों और नगरों से भरा देश है। अगर हिंदुस्तान से क़स्बे निकाल दिए जाएँ, तो बस धूल-खाते, मिलों के शोर से भरे
एक मुसलमान का ‘पाताल लोक’
‘पाताल लोक’ का दूसरा सीज़न पूरा देखा और इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी की ‘हाथी’ जैसी अदाकारी के आगे सारे अदाकार फीके पड़ गए।
उर्फ़ी जावेद के सामने हमारी हैसियत
हिंदी-साहित्य-संसार में गोष्ठी-संगोष्ठी-समारोह-कार्यक्रम-आयोजन-उत्सव-मूर्खताएँ बग़ैर कोई अंतराल लिए संभव होने को बाध्य है
हिंदी के चर्चित घड़ी-प्रसंग की घड़ी बंद होने के बाद...
घड़ी तो सब ही पहनते हैं। कई सौ सालों पहले जब पीटर हेनलेन ने पहली घड़ी ईजाद की होगी, तो उसके बाप ने भी नहीं सोचा होगा
वालिद के नाम एक ख़त
प्यारे अब्बा! मैं जानता हूँ कि मैं इस तहरीर के पहले लफ़्ज़ को आपको पुकारने के लिए इस्तेमाल करने के लायक़ नहीं हूँ। मै