वीरेनियत-8 : तारीख़ की गवाही
रजनीश वर्मा
15 अक्तूबर 2026
जीवन को अपनी इच्छा से जीने का रोमांच कितना सुंदर होता है! जीवन के रोमानी बोध मात्र से हृदय खिल उठता है, आस-पास के वातावरण में स्निग्धता घुल जाती है। अनचाहे दृश्य और अनचाहे शोर भी सुंदर लगने लगते हैं। जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई मृत्यु भी उस समय भयावह नहीं लगती। पर क्या हो, जब स्वप्न का यह संसार अचानक बदल जाए? बग़ल का वही अनचाहा शोर चीख़ में बदल जाए, अपना ही देश किसी दूसरे देश-सा लगने लगे, व्यवस्था अपने ही लोगों को कीड़े-मकोड़े समझने लगे और संविधान की आवाज़ को पुलिसिया डंडा ख़ामोश कर दे!
एक रोमानी बोध का अचानक भयावह मंज़र में तब्दील हो जाना कितना ख़ौफ़नाक होता है! पाश याद आते हैं :
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
साहिर लुधियानवी की मशहूर नज़्म की पंक्तियाँ भी याद आती हैं :
ता’मीर के रौशन चेहरे पर
तख़रीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी
हर शहर में जंगल फैल गया
‘वीरेनियत’ के आठवें संस्करण का आयोजन [9 अक्टूबर 2026, जवाहर भवन] दिल्ली में अघोषित आपातकाल के इसी ख़ौफ़नाक मंज़र के साये में हुआ। लेकिन जैसा कि कहा जाता है : कविता अँधेरे में उम्मीद की एक किरण है। सौम्य मालवीय की कविताएँ रायसीना हिल्स को इसी उम्मीद के साथ चुनौती दे रही थीं।
दिल्ली की सड़कें अब हर तारीख़ की गवाह बन रही हैं। रोज़ाना ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा लगाते हुए हज़ारों लोगों को पुलिस बर्बरता के साथ गिरफ़्तार कर रही है। हज़ारों और लोग क़तार लगाकर खड़े हो जाते हैं। वे फिर आते हैं और फिर गिरफ़्तार होते हैं।
इस साल ‘वीरेनियत-8’ भी जेन-ज़ी आंदोलनों को समर्पित रहा। इस कार्यक्रम का आग़ाज़ संचालक आशुतोष कुमार द्वारा इब्बार रब्बी की कविता ‘दिल्ली की बसों में’ के पाठ से हुआ। आशुतोष जब इस कविता का पाठ कर रहे थे, तब हॉल के बाहर हो रहे ज़ुल्म की दास्तान एक तस्वीर की तरह आँखों के सामने से गुज़रने लगी...
सौर से निकलते ही,
पायदान पर खड़ा हो गया;
दिल्ली की इन बसों में,
मैं बूढ़ा हो गया।
जो मुल्क को खचड़े की तरह
दौड़ा रहे हैं,
उनके पाँव का कूड़ा हो गया।
‘वीरेनियत’ जन संस्कृति मंच [जसम], दिल्ली की ओर से कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजित होने वाला वार्षिक काव्य-कार्यक्रम है। इस बार इसमें आठ कवियों को आमंत्रित किया गया जिनमें इब्बार रब्बी, अनामिका, सविता सिंह, आर. चेतनक्रांति, सौम्य मालवीय, पार्वती तिर्की, उसामा और अरबाज़ ख़ान शामिल थे। इब्बार रब्बी आ नहीं सके, इसलिए मंच पर कुल सात कवि उपस्थित रहे।
इस बार आयोजकों ने ‘कोरस’ को शामिल करके एक नया प्रयोग किया। ‘कोरस’ ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘हमारा समाज’ का संगीतात्मक पाठ किया। एक श्रोता के रूप में मुझे लगा कि उन्हें इसके लिए थोड़ा और समय दिया जाना चाहिए था।
इसके बाद आशुतोष कुमार ने अरबाज़ ख़ान को कविता-पाठ के लिए आमंत्रित किया। अरबाज़ ने अपनी दो लंबी कविताओं [‘मस्जिद में चहकते बच्चे’ और ‘एक मिस्त्री की याद’] का पाठ किया। ‘मस्जिद में चहकते बच्चे’ इस्लामी कट्टरपंथ के विरुद्ध बच्चों की एक नई पीढ़ी के प्रतिरोध की कविता है। इसमें एक ऐसे भविष्य की कल्पना है, जब तमाम कट्टरताओं को पार करते हुए छोटे बच्चे अपनी माँओं का हाथ पकड़कर मस्जिद में ले आएँगे :
और यहाँ बाद नमाज़ के
शुरू हो चुकी है दुआ
दुआ में बोले जाने वाले आमीन को
कुछ बच्चे अम्मी समझ बैठे हैं
और इमाम की हर दुआ पर चिल्ला रहे हैं
अम्मी... अम्मी... अम्मी...
साबित करते हुए
ये बच्चे हैं
अपनी अम्मियों के बच्चे
तुम मत दो कोई जगह अम्मी को मस्जिद में
लेकिन ये साथ ले ही आएँगे उसे
‘एक मिस्त्री की याद’ कविता पेशे और पेशेवर लोगों के प्रति समाज की सोच को उजागर करती है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हमारे कामों को आसान बनाने वाले लोगों के प्रति हमारी कैसी दृष्टि होती है और जाने-अनजाने हम उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं... यह कविता इस तरह के सवालों से जुड़ी संवेदनशीलता को उकेरती है। इसे सुनते हुए मुझे धूमिल की कविता ‘मोचीराम’ याद आने लगी :
मगर इसका मतलब यह नहीं है
कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है
मुझे हर वक़्त यह ख़याल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं-न-कहीं एक अदद आदमी है
जिस पर टाँके पड़ते हैं
जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट
छाती पर हथौड़े की तरह सहता है
सौम्य मालवीय ने अपने कविता-पाठ में प्रतिरोध के कई स्तरों को छुआ। उनकी कविता ‘नीला कोट’ ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था का प्रतिरोध करती है, जबकि ‘बेटी पर्यायवाची मत पढ़ना’ सामाजिक बंदिशों से मुक्ति की आकांक्षा को तलाशती है। उनकी ‘ख़तरा है’ शीर्षक कविता सत्ता, अधिनायकवाद और फ़ाशीवाद के अंतर्संबंधों पर व्यंग्य करती है।
अभी कुछ ही दिन पहले दिल्ली में मूर्ति-विसर्जन की शोभायात्रा ने एक पूरे इलाक़े को अपनी आस्था से सराबोर कर दिया था। तेज़ आवाज़ में डीजे पर बजते गाने हिंदू-एकता की दलील दे रहे थे। इसी दिल्ली की सड़कों के बारे में सौम्य मालवीय की कविता-पंक्ति याद आती है : ‘सड़क को नमाज़ियों से ख़तरा है’। यहाँ ‘रात-गाड़ी’ वाले वीरेन डंगवाल भी याद आ ही जाते हैं :
संशय ख़ुसरो की बातों में
ख़ुसरो की आँखों में डर है
इसी रात में अपना घर है।
मेरे कई दोस्त इस आयोजन में ख़ास तौर पर इब्बार रब्बी और आर. चेतनक्रांति को सुनने आए थे। इब्बार रब्बी आ नहीं सके और चेतनक्रांति के पाठ से उन्हें निराशा हुई। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी और वह कविता पढ़ने की अपनी परिचित शैली में भी नहीं थे। उन्होंने ‘उन्हें रास्ता दो’ और ‘राज रुदन’ शीर्षक से दो कविताएँ पढ़ीं। उनकी कविताओं में जेन-ज़ी और ‘बुलडोज़र-संस्कृति’ की ओर संकेत थे।
पार्वती तिर्की को मैं दिल्ली में दूसरी बार सुन रहा था। इससे पहले ‘आज’ में उन्हें सुना था। दोनों ही बार मेरे लिए संप्रेषणीयता का संकट रहा, क्योंकि पार्वती की कविताओं में उनकी संस्कृति के स्थानीय शब्द बहुतायत में आते हैं। यह पार्वती से अधिक हमारी अपनी सीमा भी है कि हमने अपने भाषाई व्याकरण को बहुत सीमित रखा है। दूसरी बात, उनके कविता-पाठ का अंदाज़ भी कुछ ऐसा है कि वह मंच पर बेहद सहजता से धीरे-धीरे पढ़ती हैं।
पार्वती अपनी कविताओं के ज़रिये थोड़ी देर के लिए हमें इस महानगरीय संस्कृति से दूर जंगलों और नदियों की ओर ले गईं। वह नदियों से संवाद करती हैं। नदियाँ, जंगल, ज़मीन, पेड़ और पहाड़ उनके ‘सहिया’ यानी मित्र हैं। उनकी कविताओं में स्थानीय शब्द किस तरह आते हैं, यह उनकी कविता ‘सहिया’ की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है :
आज रात्रि करम चाँद अखड़ा पर आने वाला है
अपने संग सरगुजा से मिलने बतियाने
और अपनी कहानी सुनने
अखड़ा पर आने वाला है
[करम—छोटा नागपुर में मनाया जाने वाला लोकपर्व है। इस पर्व में खिलने वाले चाँद को ‘करम चाँद’ कहते हैं। इसी करम के मौसम में सरगुजा के सुनहरे फूल खिलते हैं, जिनसे अखड़ा सजता है...]
उसामा ने बिना किसी शीर्षक के एक लंबी नज़्म सुनाई। उन्हें सुनते हुए लगा कि उनकी कविता को बेहद धैर्य से सुना जाना चाहिए, लेकिन उन्हें भी धैर्य के साथ सुनाना चाहिए। अव्वल तो उनकी भाषा सीधी और सरल नहीं है; दूसरी बात कि लंबी कविता के लिए जिस कसाव की ज़रूरत होती है, वह भी यहाँ कम दिखाई दिया।
सविता सिंह की कविताएँ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों तथा उनके अंतर्संबंधों की गहरी समझ के साथ लिखी गई हैं। स्त्रियाँ उनके लिए सौंदर्य और आश्चर्य का एक लोक हैं। वह देश को बाज़ार में तब्दील होते देख रही हैं। देश का मानचित्र उनके लिए देह है और इस देह की पीड़ा उन्हें उदास करती है। वह देश की अनचाही इच्छाओं, यानी राष्ट्रवाद, के प्रति आगाह करती हैं। उनकी ये कविता-पंक्तियाँ देखिए :
कुछ कम उदास करो मुझे मेरे देश
कुछ कम चाहो मुझसे
कितने बदहाल यहाँ के लोग
कितने कम लोगों की ख़ुशी के लिए
फ़ाक़ाज़दा दिन और वैसी ही रातें
कितने थोड़े भरे पेटों के लिए
जंगल के जंगल कारतूस और बंदूक़ों से लैस अब
रात भर जगे रहते हैं पेड़
कुछ बच नहीं पा रहा
न मर्द, न औरतें, न बच्चे
न रात, न उसका रहस्य।
सविता सिंह की कविताओं में प्रकृति का रोमानी बोध है, तो जीवन की कटु सच्चाइयाँ भी। इसके बावजूद यह कहना ज़रूरी है कि उनका कविता-पाठ आकर्षक नहीं रहा। ऐसा लगा, जैसे वह किसी जल्दबाज़ी में पढ़ रही हों। उनकी आवाज़ भी धीरे-धीरे आ रही थी, जिससे कविता का प्रभाव कुछ कम हुआ।
सबसे आख़िर में अनामिका जी ने कविता-पाठ किया। साहित्य के आलोचकीय मंचों पर वह जितना उदास करती हैं, कविता पढ़ते हुए उतना ही प्रभावित करती हैं। ऐसा लगता है कि जैसे उनकी वाणी कविताओं को पढ़ने के लिए ही बनी हो। उनकी ‘तलाशी’ स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा की कविता है। स्त्री को धरती मानकर वह कहती हैं :
कान लगाकर सुनो
धरती की छाती में क्या बज रहा है!
क्या कोई छुपा हुआ सोता है?
‘कमरधनियाँ’ कविता का उन्होंने बहुत सुंदर पाठ किया। ‘अनब्याही औरतें’ का पाठ बेहद मार्मिक था। यह कविता उन लड़कियों का स्वर है जो बिना विवाह के जीवन जीना चाहती हैं, लेकिन अपनी इस इच्छा को कहें तो कैसे! अनामिका अपने ख़ास लहजे में कहती हैं :
माई री,
मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की,
माई री!
अंततः जसम का यह आयोजन सफल रहा। दिल्ली मेट्रो बंद होने की ख़बर से लोग बहुत जल्दी में थे। सबके चेहरों पर हल्का-सा डर था और एक सवाल : कल क्या होगा? ‘वीरेनियत’ ने ख़तरे के प्रति साहस और ख़तरे से होने वाले नुक़सान दोनों के प्रति आगाह किया था।
वैसे ‘वीरेनियत’ के इस आयोजन की तुलना इसके पिछले संस्करणों से करें तो यह पिछली बार की अपेक्षा थोड़ा कमज़ोर रहा। कौन-सी कमी कहाँ रह गई, इसका आकलन ‘वीरेनियत’ की टीम ही बेहतर ढंग से कर सकेगी। उम्मीद है कि इन कमियों से सीखकर वह ‘प्रतिरोध का कलावाद’ की इस शृंखला को एक बार फिर उसके पुराने अंदाज़ और तेवर के साथ आगे बढ़ाएगी।
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