ज़रथुस्त्र के उद्धरण
अनुशासन की अनुशासन हीनता पर विजय हो। शांति की अशांति पर विजय हो। उदारता का संकीर्णता पर, श्रद्धा का अश्रद्धा पर, सत्य का असत्य पर आधिपत्य हो। धर्म के शाश्वत नियम का, अधर्म पर पूर्ण रूप से शासन हो।
वही मनुष्य अच्छा है; जो दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार नहीं करता, जो अपने प्रति किया जाना उचित नहीं समझता।
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पूर्णता की पहली भूमि है, शुभ विचार, दूसरी है अच्छे वचन तथा तीसरी है अच्छे कर्म।
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नैतिक तथा धार्मिक वैभव उसे प्राप्त होंगे, जो ईश्वर के लिए संसार में कार्य करता है और उसकी दी हुई शक्ति का ग़रीब मनुष्यों के उद्धार में उपयोग करता है।
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पवित्रता सब अच्छाइयों से बढ़कर है। वस्तुतः वही आदमी सुखी है, जिनके अंदर पूर्ण पवित्रता का निवास है। ईश्वर की इच्छा ही पवित्रता का महान नियम है।
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सभी स्त्री पुरूषों को अच्छे कर्म करने में प्रयत्नशील रहना चाहिए, क्योंकि वह मोक्ष प्रदान करने वाले होते हैं।
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सब प्रकार के अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म स्वर्ग में पहुँचाने वाले हैं। बुरे विचार, बुरे वचन और बुरे कर्म नरक में पहुँचाते हैं। अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म धार्मिक मनुष्य के चिन्ह हैं, जो उसे स्वर्ग ले जाते हैं।
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संसार में अहुरमजदा के प्रति जो प्रेम करना चाहता है, उसे सदाचारी मनुष्य से प्रेम करना चाहिए। सदाचारी मनुष्य अहुरमजदा का ही दूसरा रूप है।
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अपने संबंध और जाति की ऊँचाई का तुम्हें घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंत में तुम्हारे कर्मों पर ही तुम्हारा भविष्य निर्भर करता है।
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संसार के सुखों को प्राप्त कर तुम्हें प्रमत्त नहीं होना चाहिए, क्योंकि संसार के सुख वर्षा के बादलों के समान होते हैं। बहुत धन और ऐश्वर्य पाकर भी प्रसन्न नहीं होना चाहिए, क्योंकि अन्त में तुम्हें सब कुछ छोड़कर जाना होगा।
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तुम्हें परिश्रमी और संयमी होना चाहिए, और अपने परिश्रम से प्राप्त धन का ही उपयोग करना चाहिए।
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लालच तथा लोभ को अपने अंदर मत आने दो। लोभी मनुष्य संसारिक सुख और आध्यात्मिक वैभव प्राप्त नहीं कर पाता।
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उन व्यक्तियों को धनी समझो जो ज्ञान से पूर्ण हैं, जो शरीर से स्वस्थ है और जो निर्भय होकर रहते हैं। जो संतोषी हैं, जिनका भाग्य धर्म पर चलने में सहायक है, जो सज्जन तथा पवित्र आत्माओं से अपने सदाचार के लिए प्रशंसा प्राप्त करते हैं, जो अहुरमजदा के शुद्ध और श्रेष्ठ पद में विश्वास रखते हैं, जो सच्चाई से संपन्न हैं।