दिन पर कविताएँ

सूर्योदय से सूर्यास्त

के बीच के समय को दिन कहा जाता है। यह समय, काल, वक़्त का भी अर्थ देता है। दिन समय-संबंधी ही नहीं, जीवन-संबंधी भी है जो रोज़मर्रा के जीवन का हिसाब करता है और इस अर्थ में भाषा द्वारा तलब किया जाता रहता है। इस चयन में प्रस्तुत है—दिन विषयक कविताओं का एक अपूर्व संकलन।

एक अजीब दिन

कुँवर नारायण

एक दिन

अखिलेश सिंह

बीते हुए दिन

राजेंद्र धोड़पकर

अगले सबेरे

विष्णु खरे

सात दिन का सफ़र

मंगलेश डबराल

लंबी छुट्टियाँ

प्रदीप्त प्रीत

सारा दिन

मृगतृष्णा

एक धुँधला दिन

सौरभ अनंत

6 दिसंबर, 2006

व्योमेश शुक्ल

गुर्जरी तोड़ी

यतींद्र मिश्र

पुराना दिन

महेश वर्मा

रोज़मर्रा

व्योमेश शुक्ल

इन दुर्दिनों में भी

ऋतु कुमार ऋतु

इतवार की तरह

अंकुश कुमार

शून्य

दर्पण साह

स्तंभ

अविनाश

रविवार

महेश वर्मा

वह दिन

सुरजीत पातर

आज का दिन

रमाशंकर सिंह

दिन कोई जंगल है

पारुल पुखराज

कितने अच्छे दिन

नंद चतुर्वेदी

ये दिन

अच्युतानंद मिश्र

प्यार भरे बेलौस दिन

प्रदीप्त प्रीत

आज का सपना

नवीन सागर

आज का दिन

महेश आलोक

क्रमशः

कीर्ति चौधरी

दुःख के दिन

नंद चतुर्वेदी

वे कैसे दिन थे

कीर्ति चौधरी

रोज़ सुबह

नवल शुक्ल

एक दिन

स्मृति प्रशा

देखना, एक दिन

श्रीनरेश मेहता

एक दिन

प्रेम रंजन अनिमेष

अच्छे-बुरे दिन

नंद चतुर्वेदी

ग़नीमत है

शशिभूषण

पुल की तरह खुला है दिन

वंशी माहेश्वरी

एक दिन

डॉ. अजित

अनुपस्थिति

कीर्ति चौधरी

वे दिन

गोविंद माथुर

अंतिम दिन की अनुभूति

चंद्रकांत देवताले

अच्छे दिन

गोविंद माथुर

अच्छे दिन नहीं आते

नंद चतुर्वेदी

एक टूटा दिन हमारे पास

नंद चतुर्वेदी

एक दिन

विजय शंकर

चौदह फ़रवरी

पारुल पुखराज

उस एक दिन

निधीश त्यागी
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