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एम. एन. राय

1887 - 1954 | आर्बेलिया, पश्चिम बंगाल

क्रांतिकारी, दार्शनिक और राजनीतिक विचारक। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक।

क्रांतिकारी, दार्शनिक और राजनीतिक विचारक। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक।

एम. एन. राय के उद्धरण

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प्रकृति की भौतिक वास्तविकता को नकार देने पर वैज्ञानिक शोध निरर्थक हो जाता है।

हमारे अनुभव में घटमान विश्व केवल हमारी चेतना में अस्तित्ववान है, उस का कोई भौतिक आधार नहीं है।

विश्व के आधार-तत्त्व के बारे में नए ज्ञान का निहितार्थ, पदार्थ की वास्तविकता का निषेध नहीं है।

दर्शन का कार्य एक समग्र के रूप में अस्तित्व की व्याख्या करना है।

सामान्य बोध विचित्रता पर अविश्वास करता है। वह रहस्यों और चमत्कारों से आसानी से नहीं ठगा जा सकता।

विज्ञान का कार्य केवल प्रकृति पर विजय नहीं; बल्कि प्रकृति और उस से अपने संबंधों के साथ-साथ, प्रकृति के ही अंश अन्य मनुष्यों से भी संबंधों को समझने में सहायक होना है।

दर्शन की आधारभूत समस्या ब्रह्मांड के रहस्य को, मात्र वैज्ञानिक ज्ञान की मदद से ही समझा जा सकता है।

विश्व का रहस्यवादी विचार दर्शन का खंडन है। वह दर्शन को समाप्त करता और विश्वास को पुनर्जीवित करता है।

कर्म, मानव-अस्तित्व में अंतर्निहित है।

पदार्थ की नई अवधारणा, पुरानी अवधारणा का परिष्कार मात्र है।

मनुष्य के बौद्धिक विकास के क्रम में तर्क विश्वास का पूर्वगामी है।

विज्ञान सर्वज्ञ नहीं है, लेकिन वह जान पाने के दावे पर दृढ़तापूर्वक अड़ा है।

कारणता का कार्यव्यापार, कारण-कार्य की एक अटूट शृंखला में घटनाओं का उत्तरोतर होना—काल के संवर्ग को हमारी समझ की परिधि में ला देता है।

हम केवल वही परिभाषित कर सकते हैं, जो हम जानते हैं। सुनिश्चित ज्ञान पर्यवेक्षण और प्रयोग से ही प्राप्त किया जा सकता है।

विश्वास का अपना तर्क हाता है, और धार्मिक दर्शन की आलोचना का काम उस तर्क की भ्रामकता का स्पष्ट कर देना है।

परम सत्त्व की केवल अमूर्त कल्पना की जा सकती है।

बुद्धि एक शरीरवैज्ञानिक वृत्ति है, मस्तिष्क विचार का उपकरण है और विचार मस्तिष्क की वृत्ति है।

अनुमान और आगमन अनुभव के ही अंश हैं

मनुष्य के आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य पर विवेकाधीन अंकुश लगाए बिना, दर्शन अनन्तता की अवधारणा से छुटकारा नहीं पा सकता।

विज्ञान द्वारा धर्म की पराजय, धर्म के तर्कबुद्धिवादी बीजकोष का युक्तियुक्त परिणाम है।

विकास की एक विशिष्ट प्रक्रिया एक क्रांति में परिपूर्ण होती है, जो एक नई प्रजाति की उत्पत्ति का संकेत देती है।

आधुनिक वैज्ञानिक दर्शन, किसी भी तरह द्वैतवादी सिद्धांत के निश्चित रूप से विरुद्ध है।

जिस प्रकार जीवन के सिद्धांत में परिवर्तन और पुनः समायोजन जीवन को नष्ट नहीं करते, उसी प्रकार पदार्थ की अवधारणा में समुपस्थित क्रांति; पदार्थ को नष्ट नहीं करती, भौतिकी को पराभौतिकी में नहीं मिला देता।

एक बार वास्तविक समझ ली जाने पर भ्रांतियाँ अनुभव की अवहेलना करने लग जाती हैं।

डार्विनवाद ने प्रकृति में मनुष्य की स्थिति को, हमेशा के लिए और सुनिश्चित रूप से परिभाषित कर दिया।

सत्य कभी जाना नहीं जा सकता, वह प्रकट होता है।

पूर्ण समत्व की अवस्था, एक विशुद्ध अमूर्त अवधारणा है।

प्रकृति में चमत्कारों के लिए कोई स्थान नहीं है।

चेतना ही एक मात्र वास्तविकता है।

भौतिक विश्व का अस्तित्व है। उसे मनुष्य के मन द्वारा नहीं रचा जाना है। वह है जिसे जाँचना, व्याख्या करना, जानना और समझना है—यह विज्ञान की वृत्ति है।

तात्कालिक परिणाम अनभ्यस्त बढ़िया खाने से उत्पन्न अपच जैसा ही है।

परिवर्तनीय संरचना वाली कोई वस्तु अविभाज्य नहीं हो सकती।

विज्ञान का कार्य वर्णन करना है और दर्शन का व्याख्या करना। इसलिए दर्शन को विज्ञानों का विज्ञान कहा जाता है।

जब तक भविष्यकथन हो सकते हैं और घटनाएँ लगभग उसी प्रकार घटित होती हैं, तब तक भौतिक नियतत्ववाद का सिद्धांत खरा रहेगा।

काल का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह दिक् के साथ मिश्रित है।

आलोचना हमारे ज्ञान की अनिश्चितता के ज्ञान के विषय में गुप्त स्थानांतर की अनुमति नहीं देती।

किसी दार्शनिक उद्देश्य की पूर्ति करने तक धर्म भी एक बौद्धिक और नैतिक आवश्यकता है।

दिक् से मुक्त काल अस्तित्व में नहीं सकता। प्रकृति ने उसे दिक् से संयुक्त कर दिया है।

संपूर्ण प्राकृतिक व्यापार के बारे में, संपूर्ण ज्ञान के बिना कोई सिद्धांत संभव नहीं है कि हम सब कुछ जाने बिना कुछ भी नहीं जान सकते।

वास्तविकता को अभौतिक मानने का सिद्धांत ज्ञान की सीमा बाँध देता है।

दर्शन धर्म से पुराना है। वह उतना ही पुराना है, जितना प्राज्ञ मानव।

पूर्व में उपलब्ध ज्ञान से सज्जित वैज्ञानिक की बुद्धि; जब तक प्रेक्षित तथ्यों के कच्चे माल पर काम नहीं करती, तब तक नए वैज्ञानिक सिद्धांतों का जन्म नहीं हो सकता।

विश्व कोई स्थितिशील सत्ता नहीं है, वह संभवन की एक प्रक्रिया है।

ज्ञान का अंतर, ज्ञान की वस्तु की एकरूपता को प्रभावित नहीं करता।

रहस्यवाद अज्ञान का परिणाम है। वह अज्ञान को एक गुण बना देता है। वह जान पाने के दाव के समर्पण का प्रतिनिधित्व करता है। वह जान पाने की संभावना पर संदेह करता है। वास्तव में, रहस्यवाद का निहितार्थ पराजय का स्वीकार है।

ऊर्जा पदार्थ का एक रूप है और पदार्थ स्पंदनशील सार-तत्त्व है।

सत्ता अपने को संभवन में चरितार्थ करती है।

पदार्थ का अस्तित्व बहुसंख्यक आकारों में उस के रूपांतरण में ही सिद्ध होता है।

ज्ञान जितना अधिक है, संभाव्यता भी उतनी ही अधिक है।

हमारे ज्ञान की अनिश्चितता की अवस्थाएँ, संभाव्यता की पदावली में अभिव्यक्त होती हैं।

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