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पंकज प्रखर

1994 | गोपाल गंज, बिहार

नई पीढ़ी के कवि-लेखक।

नई पीढ़ी के कवि-लेखक।

पंकज प्रखर के बेला

18 सितम्बर 2026

सरसरी : ‘हिंदी का उत्सव’ और अंधकार

सरसरी : ‘हिंदी का उत्सव’ और अंधकार

विवादों, विनोदों, गर्वोक्तियों, सूक्तियों और सहकारिताओं से फ़ेसबुक ऊब चुका था। आम का टिकोरा वैशाख तक बीनने के बाद आलोचकों ने दीर्घ प्रवास ले लिया था और बक़ौल अष्टभुजा शुक्ल कविजन फिर से अमराई ढूँढ़ने म

19 अगस्त 2026

प्रियंवद का रचनालोक : जहाँ मनुष्य नैतिक नहीं, मनुष्य है

प्रियंवद का रचनालोक : जहाँ मनुष्य नैतिक नहीं, मनुष्य है

अधिमूल्यन से उत्पन्न बहुप्रशंसा और अतिव्याप्ति से उत्पन्न रुचिशीलता के इस समय में किसी के टेक्स्ट भर से आत्मीय होना, रचना और रचनाकार—दोनों के लिए—किसी पाठक को उदात्तता से भर देता है। देखने-सुनने-जानन

21 जून 2026

‘कल्पना’ जैसा भोजपुरी में होना अब कल्पना ही है

‘कल्पना’ जैसा भोजपुरी में होना अब कल्पना ही है

वह इक्कीसवीं सदी की शुरुआत थी और वह बहुत उदास होकर गा रही थी—घरे छुट्टी लेके अउरी कुछ दिन रही ए बलम जी... और ठीक उसी वक़्त सैलून में बैठे लड़के यह तय कर रहे थे कि उन्हें बंबई नहीं, राजकोट भागकर जाना है

14 मई 2026

क्लचर : बालों से निकलकर

क्लचर : बालों से निकलकर

वैशाख की इस अलस-दुपहरी में जहाँ मैं नहीं हूँ; सोचता हूँ, दाँवरि के बाद वहाँ अलसाने के दिन आ गए होंगे। परदेशियों की याद में ग्राम्यवधुएँ छत पर लत्ते-सी सूख रही होंगी और जम्हाई लेते हुए रसिक मनफेरवट से

25 जुलाई 2025

वाचिक : परंपरा का नवोन्मेष

वाचिक : परंपरा का नवोन्मेष

‘रेख़्ता फ़ाउंडेशन’ का उपक्रम ‘हिन्दवी’—हिंदी-साहित्य-संस्कृति-कला-संसार को समर्पित अपने वार्षिकोत्सव—‘हिन्दवी उत्सव’ के पाँचवें संस्करण का आयोजन करने जा रहा है। यह आयोजन 27 जुलाई 2025, रविवार को नई द

18 जुलाई 2025

वोटिंग-विचार पर कुछ विचार

वोटिंग-विचार पर कुछ विचार

प्रतियोगिताएँ, पुरस्कार और सूचियाँ हमेशा से संदिग्ध रही हैं। प्रतियोगिताओं में कोई भी निर्णय अंतिम निर्णय नहीं होता, बावजूद इसके कोई भी काव्य-प्रतियोगिता इस अर्थ में कविता के हक़ में होती है कि कविता

28 नवम्बर 2024

'गंध ही के भारन बहत मंद-मंद पौन...'

'गंध ही के भारन बहत मंद-मंद पौन...'

वसंत इस कामकाजी शहर का मूड नहीं है। संभवतः जनवरी के बाद ही गर्मियों की तैयारी में यह शहर फ़रवरी के मूड को स्किप कर देता है। इस बीच वसंत का आना भी महज़ हवा में कपूर की तरह ही होता है। उदास बयार की छुअन

06 नवम्बर 2024

फूल की थरिया से छिटकती झनकार की तरह थीं शारदा सिन्हा!

फूल की थरिया से छिटकती झनकार की तरह थीं शारदा सिन्हा!

कहते हैं फूल की थरिया को लोहे की तीली से गर छेड़ दिया जाए तो जो झनकार निकलेगी वह शारदा सिन्हा की आवाज़ है। कोयल कभी बेसुरा हो सकती है लेकिन वह नहीं! कातिक (कार्तिक) में नए धान का चिउड़ा महकता है। शार

08 जुलाई 2024

न सुधा जैसी कोई नायिका हुई, न चंदर जैसा कोई नायक

न सुधा जैसी कोई नायिका हुई, न चंदर जैसा कोई नायक

तीसरी कड़ी से आगे... क्लबहाउस की दुनिया अब प्रौढ़ हो चुकी थी। अपने शुरुआती दिनों की तमाम स्थापनाओं के बाद यहाँ की सभ्यता, नियम-क़ायदों और ज़रूरी रीति-रिवाज़ से अब यहाँ बसने वाले बख़ूबी परिचित हो चुके थे

07 जुलाई 2024

हुस्न को समझने को क्लबहाउस जाइए जानाँ

हुस्न को समझने को क्लबहाउस जाइए जानाँ

दूसरी कड़ी से आगे... समय और क्लबहाउस मैं समय हूँ!—यहाँ यह कहने वाला कोई नहीं, लेकिन फ़ेसबुक के अल्गोरिदम की तरह क्लबहाउस का भी अपना तिया-पाँचा था, जिसे स्पीकर्स जितना जानते थे—सुनने वाले भी उतना

06 जुलाई 2024

इस चर्चा में सब कुछ पुराना होकर भी नया था

इस चर्चा में सब कुछ पुराना होकर भी नया था

पहली कड़ी से आगे... क्लबहाउस की दुनिया को बनाने वालों लोग ग़म-ए-रोज़गार से ऊबे हुए लोग थे—वे अजीब लोग थे! वे इतने अजीब थे कि अब उन्हें एक नॉस्टेल्जिया की तरह याद किया जा सकता है। जो अभिव्यक्ति के नाम

05 जुलाई 2024

आवाज़ की दुनिया के दोस्तो!

आवाज़ की दुनिया के दोस्तो!

कोविड की हाहाकारी लहर के बीच जनजीवन का ख़तरा इतना अबूझ था कि लोग उसे हर संभव जानने-समझने की कोशिश में लगे थे। वे हर किसी की बात सुन रहे थे, गुन रहे थे, धुन रहे थे। उनके लिए आख़िरी और प्रामाणिक सत्य कुछ

22 मई 2024

सौ के साही : कार्यक्रम का यू-ट्यूब देखा हाल

सौ के साही : कार्यक्रम का यू-ट्यूब देखा हाल

वरिष्ठता कभी-कभी बहुत ऊब और थकान महसूस कराती है। कुछ ऐसा ही 1 मई 2024 को दिल्ली विश्वविद्यालय के शहीद भगत सिंह महाविद्यालय हिंदी-विभाग द्वारा आयोजित आग़ाज़-ए-वैखरी के कार्यक्रम से प्रतीत हुआ। यह का

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